कहां 400 पार का नारा और कहां अब सहयोगियों का सहारा। यही लोकतंत्र है, जिसमें जनता का फैसला सबसे ऊपर होता है। BJP की अगुवाई वाले NDA के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 400 पार की हुंकार भरी थी, उन्होंने भाजपा के भी अपने दम पर 370 सीटें जीतने की बात कही थी, लेकिन यूपी और बंगाल से BJP को इतना बड़ा झटका मिलेगा, इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।
एग्रेसिव कैंपेन के बावजूद यूपी की जनता ने अखिलेश यादव की सोशल इंजीनियरिंग को तरजीह दी। बसपा की अपने वोटरों पर पकड़ खत्म हो गई है, इस लोकसभा चुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया। जिस यूपी को विकास और लॉ एंड ऑर्डर का मॉडल बनाकर पेश किया गया, वहीं भाजपा को सबसे बड़ा झटका लगा। सहयोगियों के साथ 2019 के चुनाव में 65 सीटें जीतने वाली भाजपा धड़ाम से 34 पर आकर ठहर गई। इंडिया गठबंधन ने 43 सीटों के साथ धमाकेदार जीत दर्ज की है। यहां तक की कांग्रेस को यूपी में नई संजीवनी मिल गई है। रायबरेली और अमेठी दोनों जगह से पार्टी जीती है। 2019 में राहुल गांधी को हराकर उलटफेर करने वाली स्मृति ईरानी बुरी तरह हार गई हैं। यहां तक कि अयोध्या में भी BJP हार रही है, जहां राम मंदिर को लेकर एक बड़ा माहौल खड़ा करने की कोशिश की गई।
पश्चिम बंगाल में BJP को दूसरी बड़ा झटका लगा है। पार्टी को उम्मीद थी कि बंगाल की जनता इस बार उसे 2019 से ज्यादा सीटें देगी, लेकिन ममता बनर्जी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह अपने राज्य को अमित शाह और BJP के रणनीतिकारों से बेहतर समझती हैं। तभी तो न विधानसभा चुनाव में ‘अबकी बार 200 पार’ का नारा चल पाया था, न ही इस बार भाजपा की मुराद पूरी हुई, उलटे 18 सीट जीतने वाली भाजपा इस बार 12 पर आकर सिमट गई है।