जलवायु परिवर्तन का असर अब Uttarakhand की पहचान बन चुकी मुनस्यारी की मशहूर राजमा पर साफ दिखने लगा है। कभी 1450 से 1800 मीटर की ऊंचाई पर लहलहाने वाली यह फसल अब 2400 मीटर से अधिक ऊंचे इलाकों की ओर जा रही है। तीन विश्वविद्यालयों के संयुक्त अध्ययन में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है जिसने पहाड़ी खेती के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल, गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर और जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के वैज्ञानिकों ने सीमांत क्षेत्र मुनस्यारी और आसपास के 28 गांवों में अध्ययन किया। शोध में पाया गया कि वर्ष 2010 के बाद तापमान, वर्षा और बर्फबारी के पैटर्न में आए बदलावों ने राजमा की पारंपरिक खेती को प्रभावित किया है। निचले इलाकों में जहां पहले भरपूर पैदावार होती थी वहां अब उत्पादन घट रहा है और रोगों का खतरा बढ़ गया है। अध्ययन के अनुसार, पहले मुनस्यारी क्षेत्र में राजमा की खेती 1800 से 2000 मीटर तक सफल मानी जाती थी, लेकिन अब किसान 2200 से 2400 मीटर और उससे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इसकी खेती कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ता तापमान और असमय बारिश फसल के विकास चक्र को बिगाड़ रही है, जबकि सर्दियों में बर्फबारी की कमी से मिट्टी की नमी पर भी असर पड़ा है।

मुनस्यारी की राजमा अपने खास स्वाद, रंग और बड़े दानों के लिए जानी जाती है लेकिन बदलते मौसम ने इसकी गुणवत्ता को भी चुनौती दी है। शोध में यह भी सामने आया कि ऊंचाई बदलने से दाने के आकार और स्वाद में अंतर आ रहा है जिससे बाजार में इसकी पहचान और कीमत प्रभावित हो सकती है। स्थानीय किसानों के अनुभव इस वैज्ञानिक अध्ययन से मेल खाते हैं। किसानों का कहना है कि निचले गांवों में अब राजमा की खेती जोखिम भरी हो गई है। बेहतर पैदावार के लिए उन्हें ऊंचे और दुर्गम इलाकों में जमीन तलाशनी पड़ रही है, जिससे लागत बढ़ रही है। कई किसानों ने नुकसान से बचने के लिए पारंपरिक राजमा के साथ अन्य फसलों को अपनाना शुरू कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल मुनस्यारी तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में कृषि का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। जलवायु परिवर्तन के चलते पारंपरिक फसलों का दायरा सिमट रहा है। वैज्ञानिकों ने सरकार से पहाड़ी क्षेत्रों के लिए जलवायु अनुकूल कृषि नीति, उन्नत बीज और तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराने की सिफारिश की है। अध्ययन चेतावनी देता है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो मुनस्यारी की मशहूर राजमा जैसी पारंपरिक फसलें अपने मूल इलाकों से लुप्त हो सकती हैं। ऐसे में बदलते मौसम के साथ तालमेल बिठाना अब पहाड़ी खेती की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।








