- अतुल्य उत्तराखंड ब्यूरो
हाल ही में उत्तराखंड के पुरोला में सर बडियार क्षेत्र के बिगाड़ी गांव में कुछ पुराने कुठारों के अवशेष देखने को मिले, जो इस बात की याद दिलाते हैं कि पहाड़ी समाज में अनाज भंडारण कितनी बुद्धिमानी और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से किया जाता था। ये कुठार मुख्य रूप से देवदार, चीड़ या अन्य स्थानीय लकड़ियों से बने विशाल बक्सानुमा ढांचे होते हैं। कभी-कभी बांस की पट्टियों और लकड़ी के संयोजन से भी तैयार किए जाते थे। इनमें अलग-अलग अनाजों के लिए अलग-अलग कम्पार्टमेंट या ‘गांजे’ बनाए जाते थे, जहां धान, गेहूं, जौ, मक्का, मड़ुआ, कोदो, झंगोरा, चौलाई और दालें सालों तक सुरक्षित रह सकती थीं।
पहाड़ के कोल्ड स्टोरेज
कुठार की सबसे खास बात यह थी कि ये प्राकृतिक ‘कोल्ड स्टोरेज’ की तरह काम करते थे। देवदार की लकड़ी में प्राकृतिक एंटी-सेप्टिक गुण होते हैं, जो कीटों, बैक्टीरिया और फंगस को दूर रखते थे। संरचना को जमीन से ऊंचा बनाया जाता था ताकि नमी और चूहों से बचाव हो सके। कई जगहों पर इसे घर के आंगन या ऊंचे चबूतरे पर बनाया जाता था, जिससे वर्षा और सीलन का खतरा कम हो जाता था। कुठार में रखा अनाज नमी से प्रभावित नहीं होता था और कीड़े-मकोड़े भी आसानी से नहीं पहुंच पाते थे। विशेषज्ञों का मानना है कि इनमें रखा अनाज दशकों तक खराब नहीं होता था, जो आधुनिक गोदामों से भी बेहतर था। पारंपरिक रूप से कुठार बनाना एक कला थी। शिल्पकार इसे हाथ से तैयार करते थे, जिसमें लकड़ी की पट्टियां जोड़कर मजबूत ढांचा बनाया जाता था।
लकड़ी पर नक्काशी का बेजोड़ नमूना
कुठार दूर से दिखने में एक अलग मकान जैसा ही होता है। बाहर से दिखने पर लगेगा कि छोटा-सा है पर अंदर जाकर ही इसकी भंडारण क्षमता का पता लगता है। कुठार में हर अन्न के लिए अलग-अलग खाने यानी सांचे बने होते थे, उसका माप दूण या या बोरी के हिसाब से होता था। इसके बाहरी सजावट की जाए तो ये रवांई-जौनपुर में स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं। इसके आगे के खंभों पर बारीकी से नक्काशी दार,बेल, बूटे की आकृतियां बनी हुई होती है जो इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देती हैं। दरवाजा छोटा-सा होता है। ताला खोलने के लिए एक लंबी छड़नुमा आकर की चाबी होती है और इसका ताला खोलना हर किसी की आसान नहीं होता। कुठार के दरवाजे से मुख्य घर से एक सांगल यानी चेन बंधी रहती थी और उसमे बीच-बीच में घंटियां भी बंधी रहती थी ताकि यदि कोई चोरी करने के इरादे से कुठार में घुसने की कोशिश करे तो घर के लोगों को पता चल जाए। फसल कटाई के बाद नए अनाज को कुठार में भरना एक उत्सव जैसा होता था। कई परिवारों में इसे शुभ मानकर पूजा भी की जाती थी। कुठार न केवल भंडारण का साधन था, बल्कि परिवार की समृद्धि का प्रतीक भी। कहा जाता था कि जिस घर में जितने बड़े या जितने अधिक कुठार होते थे, वह उतना ही समृद्ध माना जाता था। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है।

कुठार को मॉडर्न तरीकों से मिल रही चुनौती
आधुनिक भंडारण तकनीकों का प्रसार: आज सरकारी गोदाम, धातु के साइलो, प्लास्टिक ड्रम और कंटेनर आसानी से उपलब्ध हो गए हैं। ये सस्ते, टिकाऊ और आसानी से साफ होने वाले होते हैं।
कच्चे मकानों में कमी: पहले कच्चे मकान और बड़े आंगन होते थे, जहां कुठार आसानी से बनाए जा सकते थे। अब पक्के मकानों में जगह की कमी है और आधुनिक डिजाइन में ऐसी संरचनाओं के लिए प्रावधान नहीं होता।
जीवनशैली में बदलाव: अधिकांश किसान अब फसल कटाई के बाद अनाज सीधे मंडी में बेच देते हैं। घरेलू भंडारण की आवश्यकता घट गई है। बाजार से ताजा अनाज खरीदना आसान हो गया है।
कारीगरों की कमी: पारंपरिक कुठार बनाने वाले शिल्पकार अब अन्य रोजगारों जैसे मजदूरी, पर्यटन या शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। नई पीढ़ी इस कला को सीखने में रुचि नहीं ले रही।

उत्तराखंड के उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ और अन्य पहाड़ी जिलों में अब भी कुछ गांवों में पुराने कुठार देखे जा सकते हैं, लेकिन इनकी संख्या तेजी से घट रही है। ग्रामीण स्तर पर काम कर रहे विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इनका संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां इन्हें केवल पुरानी तस्वीरों, वीडियो या संग्रहालयों में ही देख पाएंगी।
कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं, स्थानीय समूह और सांस्कृतिक संगठन अब पारंपरिक भंडारण तकनीकों को पुनर्जीवित करने के प्रयास कर रहे हैं। वे इसे कम लागत वाला, पर्यावरण-अनुकूल और रासायनिक मुक्त विकल्प बताते हैं। विशेषकर जलवायु परिवर्तन के दौर में, जहां नमी और कीटों का खतरा बढ़ रहा है, कुठार जैसी संरचनाएं फिर से उपयोगी साबित हो सकती हैं। कुछ जगहों पर इन्हें पर्यटन स्थल के रूप में भी प्रचारित किया जा रहा है, ताकि लोग इनकी उपयोगिता समझ सकें। आज तकनीक की प्रगति का दौर है, आधुनिकता अपनाना जरूरी है, लेकिन पारंपरिक ज्ञान को त्यागना उतना ही हानिकारक है। कुठार केवल अन्न भंडार नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर, आत्मनिर्भरता और पर्यावरणीय समझ का जीवंत प्रमाण है।

इनके संरक्षण के लिए योजनाएं बनाने की जरूरत है। शिल्पकारों को प्रोत्साहन, जागरूकता अभियान और कुछ गांवों में संरक्षित कुठारों को सांस्कृतिक स्थल घोषित कर इसकी शुरुआत की जा सकती है। समाज की भी जिम्मेदारी है कि इन परंपराओं को जीवित रखे, बच्चों को इनकी कहानी सुनाए और जहां संभव हो, छोटे स्तर पर इन्हें अपनाए। बिगाड़ी गांव के इन पुराने कुठारों को देखकर लगता है कि समय अभी बाकी है। यदि हम अब जागे तो यह विरासत विलुप्त नहीं होगी, बल्कि नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनेगी। कुठार हमें सिखाता है कि सादगी में कितनी ताकत होती है और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीवन कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है।










