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    कवर स्टोरी

    बदलाव का एक वर्ष… कसौटी पर यूसीसी

    27 जनवरी 2025 का वह ऐतिहासिक सवेरा जब उत्तराखंड के राजपत्र में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के लागू होने की अधिसूचना प्रकाशित हुई, यह केवल एक कानून का लागू होना नहीं था बल्कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक नए अध्याय का आरंभ था। उत्तराखंड स्वतंत्र भारत का पहला राज्य बना जिसने अपनी विधानसभा के माध्यम से एक राष्ट्र, एक विधान के सपने को धरातल पर उतारा। अब, इस कानून के लागू होने के एक वर्ष बाद, आंकड़ों के आधार पर इसकी प्रभावशीलता और सामाजिक बदलाव को कसौटी पर कसना न केवल प्रासंगिक है, बल्कि आवश्यक भी है।
    teerandajBy teerandajFebruary 12, 2026No Comments
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    • अतुल्य उत्तराखंड ब्यूरो

    साल 2025 में उत्तराखंड ने एक अनूठी मिसाल पेश करते हुए दो दिनों तक गणतंत्र का उत्सव मनाया। 26 जनवरी को तो गणतंत्र दिवस पूरे देश के साथ मनाया ही गया लेकिन उत्तराखंड में 27 जनवरी का दिन भी उसी उत्साह के साथ मनाया गया। इसका कारण था-संविधान निर्माताओं के एक सपने का साकार होना यानी, देश में सभी नागरिकों को समान अधिकार मिले। संविधान के अनुच्छेद 44 में इसे नीति निदेशक तत्वों में शामिल किया था। आजादी के 78 साल बाद उत्तराखंड में उस अधूरे सपनों को हकीकत में बदला गया।

    मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड में यूसीसी लागू होते समय अपने ऐतिहासिक संबोधन में कहा था ‘यूसीसी नाम की इस गंगा को लाने में देवभूमि की जनता का अमूल्य योगदान रहा। जिस तरह मां गंगा उत्तराखंड से निकल कर देश के हर हिस्से को लाभान्वित करती है, उसी तरह अब यूसीसी की धारा भी यही से शुरू हुई है। इसका अनुसरण देश के अन्य राज्य भी करेंगे।’ गुजरात, असम और राजस्थान जैसे राज्यों में जिस तरह उत्तराखंड के ड्राफ्ट का अध्ययन हो रहा है, वह बताता है कि आने वाले समय में यह कानून राष्ट्रीय स्तर पर एक मानक स्थापित करेगा। यानी हमारा यूसीसी देश के लिए मॉडल बन गया है। हम एक करोड़ लोग देश की 140 करोड़ से अधिक आबादी को इस मामले में पथ प्रदर्शक बन चुके हैं। उत्तराखंड अब केवल पर्यटन या तीर्थाटन का केंद्र नहीं बल्कि प्रगतिशील वैधानिक सुधारों का भी केंद्र बन गया है।

    अक्सर बड़े सुधारों का विरोध होता है लेकिन उत्तराखंड ने यह दिखाया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनता के सहयोग से समान नागरिक संहिता जैसे जटिल विषय को भी धरातल पर उतारा जा सकता है। यह कानून केवल विवाह, तलाक या संपत्ति की बात नहीं करता बल्कि यह एक देश, एक विधान के सपने की दिशा में एक सशक्त कदम है। सवाल उठाने वालों ने बहुत सी कमियां गिनाई थीं। तब जवाब में कहा गया था जैसे संविधान में सुधार के लिए, समय की मांग के अनुरूप सैकड़ों संशोधन किए जा चुके हैं वैसे इसमें भी किए जा सकते हैं। एक वर्ष पूरे होने के ठीक एक दिन पहले राज्य सरकार ने महत्वपूर्ण संशोधन कर यह भी स्पष्ट कर दिया कि हमारे संविधान के तरह यह भी लचीला है। मूल उद्देश्य को छेड़े बिना समय, परिस्थिति के अनुसार इसमें संशोधन किया जा सकता है।

     

    उत्तराखंड में यूसीसी की बुनियाद 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान पड़ी थी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे अपना प्रमुख चुनावी वादा बनाया। सत्ता में लौटने के बाद सरकार ने 27 मई 2022 को सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की। समिति ने सितंबर और अक्टूबर 2022 के बीच राज्य के विभिन्न हिस्सों का दौरा किया और सरकार के अनुसार 2.3 लाख से अधिक लिखित सुझाव प्राप्त किए। सार्वजनिक बैठकों और संवाद कार्यक्रमों के जरिये यह संदेश दिया गया कि कानून को ऊपर से थोपने के बजाय सामाजिक सहमति के साथ तैयार किया गया है हालांकि, विपक्ष इस दावे से लगातार असहमत रहा। संवैधानिक दृष्टि से सरकार का तर्क है कि अनुच्छेद 44 राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने का निर्देश देता है और व्यक्तिगत कानून समवर्ती सूची में होने के कारण राज्य को कानून बनाने का अधिकार है।

     

    सुप्रीम कोर्ट के शाह बानो और सरला मुद्गल जैसे फैसलों में भी यूसीसी की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। इसके बावजूद उत्तराखंड हाईकोर्ट में कानून के खिलाफ कई याचिकाएं लंबित हैं। जिनमें लिव इन पंजीकरण, निजता और समानता से जुड़े प्रश्न उठाए गए हैं। माना जा रहा है कि मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेगा।राजनीतिक रूप से यूसीसी भाजपा के लिए वैचारिक और चुनावी दोनों स्तरों पर अहम उपलब्धि बन चुका है। विपक्ष, खासकर कांग्रेस कानून का विरोध तो कर रहा है लेकिन कोई स्पष्ट वैकल्पिक मॉडल पेश नहीं कर पाया है। कई विपक्षी नेता निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि असहमति कानून से कम और उसकी प्रक्रिया से ज्यादा है। एक वर्ष बाद यह स्पष्ट है कि उत्तराखंड का यूसीसी न तो पूरी तरह निर्विवाद है और न ही केवल कागजी सुधार। इसने समाज के भीतर अधिकार, समानता और राज्य की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उत्तराखंड ने समान नागरिक संहिता को विचार के स्तर से निकालकर व्यवहार की जमीन पर रख दिया है। अब यह देखना शेष है कि यह प्रयोग अन्य राज्यों और अंततः राष्ट्रीय नीति की दिशा किस तरह तय करता है।

    सबसे बड़ा लाभ महिलाओं को
    सरकार का दावा है कि यूसीसी का सबसे बड़ा लाभ महिलाओं को मिला है। विरासत में पुत्र और पुत्री के बीच का कानूनी अंतर समाप्त हो गया है। अब संपत्ति का अधिकार धर्म के आधार पर नहीं बल्कि नागरिकता के आधार पर तय होता है। मुस्लिम महिलाओं को भी पहली बार पैतृक संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिला है। इसके साथ ही अभिभावकत्व के मामलों में माताओं को पिता के समान कानूनी अधिकार दिए गए हैं। महिला आयोग के पास आने वाली शिकायतों के स्वरूप में भी बदलाव देखा जा रहा है। घरेलू हिंसा के साथ-साथ अब संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े विवाद बढ़े हैं। विशेषज्ञ इसे अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता का संकेत मानते हैं। यूसीसी के तहत बहुविवाह को पूरी तरह अवैध घोषित कर दिया गया है। सरकार इसे महिलाओं की गरिमा और समानता से जोड़कर देखती है। आलोचक इसे धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप बताते हैं। इसी तरह इद्दत जैसी प्रथाओं को कानूनी मान्यता न देने का फैसला मुस्लिम समाज के एक हिस्से में असंतोष का कारण बना हालांकि, शहरी मुस्लिम महिलाओं के बीच इसे लेकर समर्थन भी सामने आया है।

    सबसे विवादित पहलू
    कानून का सबसे विवादित प्रावधान लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण रहा। सरकार का तर्क है कि इसका उद्देश्य नैतिक पुलिसिंग नहीं बल्कि महिलाओं और बच्चों को कानूनी सुरक्षा देना है। अब तक 68 जोड़ों ने अपने लिव इन संबंधों को पंजीकृत कराया है। जबकि दो मामलों में आधिकारिक रूप से संबंध समाप्त करने का प्रमाणपत्र जारी किया गया है। लिव इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं को भरण पोषण का अधिकार और ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों को वैधता तथा संपत्ति में अधिकार दिए गए हैं। इसके बावजूद विपक्ष और नागरिक अधिकार समूह इसे निजता के अधिकार का उल्लंघन मानते हैं और पुट्टास्वामी फैसले का हवाला देते हुए राज्य के हस्तक्षेप पर सवाल उठा रहे हैं। यूसीसी की एक अहम विशेषता यह है कि इसे राज्य की अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं किया गया है। जौनसारी, थारू, बोक्सा जैसी जनजातियों की पारंपरिक व्यवस्थाओं को संविधान के तहत संरक्षण देते हुए बाहर रखा गया है। सरकार इसे सांस्कृतिक संवेदनशीलता का उदाहरण बताती है जबकि विपक्ष इसे चयनात्मक समानता करार देता है और सवाल उठाता है कि यदि कानून समान है तो इसमें अपवाद क्यों हैं।

     

    कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी…
    जमीनी स्तर पर कानून के क्रियान्वयन में व्यावहारिक चुनौतियां भी सामने आई हैं। पहाड़ी जिलों में इंटरनेट कनेक्टिविटी, बुजुर्गों की तकनीकी झिझक और डिजिटल प्रक्रिया की जटिलता के कारण पंजीकरण में दिक्कतें आईं। सरकार ने कॉमन सर्विस सेंटर, पंचायत स्तर पर सहायता और मोबाइल पंजीकरण इकाइयों के जरिए इन समस्याओं से निपटने की कोशिश की है।

    पक्ष में तर्क
    लैंगिक समानता: महिलाओं को विरासत और तलाक में बराबरी का हक।
    राष्ट्रीय एकता: एक राष्ट्र-एक कानून’ की भावना से अखंडता मजबूत होगी।
    कानूनी सरलता: अलग-अलग जटिल धार्मिक कानूनों की जगह एक सरल संहिता।
    युवा वर्ग की सुरक्षा: लिव-इन पंजीकरण जैसे प्रावधानों से अपराधों में कमी।

    विपक्ष की चिंताएं
    सांस्कृतिक विविधता: समुदायों को अपनी विशिष्ट पहचान खोने का डर।
    धार्मिक स्वतंत्रता: अनुच्छेद 25 के उल्लंघन का खतरा।
    जनजातीय चिंता: विशेष परंपराओं पर प्रभाव पड़ने की आशंका (उत्तराखंड ने इन्हें बाहर रखा।)
    निजी जीवन में दखल: लिव-इन पंजीकरण को कुछ लोग निजता का हनन मानते हैं।

    क्या आप जानते हैं?
    गोवा: 1961 में भारत का हिस्सा बनने के बाद भी पुर्तगाली सिविल कोड को बनाए रखा।
    लिव-इन रिलेशनशिप: उत्तराखंड यूसीसी के तहत यदि कोई जोड़ा 1 महीने से अधिक समय तक बिना पंजीकरण के लिव-इन में रहता है तो उसे 3 महीने तक की जेल हो सकती है।
    अवैध संतान: यूसीसी के तहत लिव-इन से पैदा हुए बच्चों को वैध माना जाएगा और उन्हें संपत्ति में पूर्ण अधिकार मिलेगा।

    यूसीसी किसी धर्म के खिलाफ नहीं… समरसता स्थापित करने का प्रयास

    आज का दिन उत्तराखंड के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय के रूप में अंकित रहेगा। इसी दिन राज्य में समान नागरिक संहिता लागू हुई। जिससे सामाजिक न्याय, समानता और सांविधानिक मूल्य स्थापित हुए। सनातन संस्कृति हमेशा से समरसता की प्रतीक रही है और भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में उपदेश दिया है। समोऽहम् सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः, जिसका अर्थ है कि सभी प्राणियों के प्रति समान भाव होना चाहिए। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर सहित संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद-44 में समान नागरिक संहिता को इसीलिए स्थान दिया था ताकि सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में हमने 2022 के चुनावी दृष्टिपत्र में यूसीसी का संकल्प लिया था और देवभूमि की जनता ने हमें इसके लिए अपार समर्थन दिया। मेरे लिए यह व्यक्तिगत रूप से गर्व का विषय है कि हमने घोषणा से लेकर धरातल पर प्रभावी क्रियान्वयन तक की यह यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की। उत्तराखंड की मुस्लिम बहनों-बेटियों को हलाला, इद्दत, बहुविवाह, बाल विवाह और तीन तलाक जैसी कुप्रथाओं से मुक्ति मिली है। यह संतोष का विषय है कि यूसीसी लागू होने के बाद राज्य में एक भी हलाला या बहुविवाह का मामला सामने नहीं आया है। यूसीसी किसी धर्म के खिलाफ नहीं है बल्कि यह कुप्रथाओं को मिटाकर समानता से समरसता स्थापित करने का हमारा एक प्रयास है। अब विवाह, तलाक और उत्तराधिकार में सभी के लिए एकसमान नियम हैं। संपत्ति के बंटवारे में पत्नी, बच्चे और माता-पिता को समान अधिकार दिए गए हैं और बच्चों में भी कोई भेदभाव नहीं रखा गया है। इसके साथ ही लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है ताकि सुरक्षा सुनिश्चित हो और ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों को समाज में पूर्ण कानूनी अधिकार मिल सकें।
    पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री, उत्तराखंड
    (यूसीसी लागू होने की पहली वर्षगांठ पर)

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