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    Home»उत्तराखंड 360»अश्वघोष स्मरण काव्यांजलि …तुम क्या गए नखत गीतों के असमय शब्द गए, एक-एक आखर गीतों के लकवाग्रस्त हुए
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    अश्वघोष स्मरण काव्यांजलि …तुम क्या गए नखत गीतों के असमय शब्द गए, एक-एक आखर गीतों के लकवाग्रस्त हुए

    सुप्रसिद्ध गीतकार डा. बुद्धिनाथ मिश्र ने अश्वघोष स्मरण काव्यांजलि में कहा, काव्य मंचों पर डा. अश्वघोष के गीतों विशेषकर ‘अम्मा का खत’ और ‘अबकी हमने आम न खाए’ की बार-बार मांग होती थी। सुप्रसिद्ध ग़जलकार विज्ञान व्रत ने कहा, वह एक जनवादी गीतकार एवं गजलकार थे। उन्होंने अपनी गजलों में जीवन की विसंगतियों को उकेरा।
    teerandajBy teerandajOctober 27, 2025Updated:October 27, 2025No Comments
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    ‘…अश्वघोष जी का बस्ता जरूर उनसे भारी था मगर उनकी रचनाएं उससे भी भारी थी।’ हिंदी के मूर्धन्य कवि, साहित्यकार डा. ओम प्रकाश शर्मा ‘अश्वघोष’ को उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर ‘अश्वघोष स्मरण काव्यांजलि’ के जरिये कुछ यूं ही याद किया गया। देहरादनू के ओएनजीसी ऑफिसर्स क्लब में आयोजित इस कार्यक्रम में उनकी साहित्यत्यिक साधना के प्रेमी जुटे और अपने-अपने अंदाज में डा. अश्वघोष को श्रद्धासुमन अर्पित किए।

    कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सुप्रसिद्ध ग़जलकार, चित्रकार विज्ञान व्रत ने कहा, मैंने अश्वघोष जी को बहुत करीब से देखा। मैंने कभी भी उनको नैराश्य से आच्छादित नहीं देखा। अश्वघोष मूलतः एक जनवादी गीतकार एवं गजलकार थे। उन्होंने अपनी गजलों में जीवन की विसंगतियों को उकेरा है। उनकी रचनाएं नए रचनाकारों के लिए प्रेरणास्पद हैं। कविता, गजल के क्षेत्र में वह एक प्रकाश-स्तम्भ की भांति हैं।

    सुप्रसिद्ध गीतकार और इस कार्यक्रम के संयोजक डा. बुद्धिनाथ मिश्र ने अश्वघोष को याद करते हुए कहा कि वह मुझसे छह साल बड़े थे लेकिन कद्र ऐसी करते थे, जैसे मैं ही उनसे जेष्ठ हूं। काव्य मंचों पर उनके गीतों को श्रोताओं द्वारा बेहद पसंद किया जाता था, विशेषकर ‘अम्मा का खत’ और ‘अबकी हमने आम न खाए’ गीतों की बार-बार मांग होती थी। वह लेखन में भी इतने सक्रिय थे कि हिंदी की लघु पत्रिकाओं से लेकर बड़ी पत्रिकाओं तक उनकी रचनाएं नियमित रूप से छपती थीं। उनके सृजन की सुगंध चारों ओर फैली रहेगी। उन्होंने अपनी काव्य श्रद्धांजलि देते हुए कहा – ‘तुम क्या गए नखत गीतों के असमय शब्द गए, एक-एक आखर गीतों के लकवाग्रस्त हुए।’

    डॉ. अश्वघोष जी।

    ‘शीतल वाणी’ के संपादक डा. वीरेंद्र आजम ने कहा कि अश्वघोष नवगीतों के पुरोधा एवं अप्रतिम गजलकार थे। पिछले साल अप्रैल में मेरी उनसे अत्यंत आत्मीय भेंट हुई थी। शीतलवाणी ने उन पर विशेषांक प्रकाशित किया है। उन्होंने कहा, डा. अश्वघोष गजलों के गाजी रहे। वह बड़े रचनाकार होने के साथ साथ जमीन से जुड़े लेखक और कवि थे। उन्होंने डा. अश्वघोष की रचना ‘अम्मा का खत’ नामक कविता का पाठन किया, और खूब तालियां बटोरी।

    साहित्यकार डा. इंद्रजीत सिंह ने डा. अश्वघोष के बाल साहित्य पर प्रकाश ड़ालते हुए कहा कि उनको सम्मान तो बहुत मिले लेकिन सरकारी स्तर पर उन्हें बड़े पुरस्कार नहीं मिले। निराला जी बड़ा कौन साहित्यकार है, उन्हें भी बड़े पुरस्कार नहीं मिले। डा. अश्वघोष ने खंड काव्य लिखा है, 9 काव्य ग्रंथ हैं। कुल मिलाकर उन्होंने लगभग 50 किताबों का सृजन किया। बाल साहित्य में उनकी रचना ‘बस्ता मुझसे भारी’ अद्भुत रही है।

    ‘बुलंद प्रभा’ के मुख्य संपादक रमेश प्रसून ने कहा कि डा. अश्वघोष के बडे़ भाई जगदीश चंद्र ‘इन्दु’ डीएवी इंटर कॉलेज, बुलंदशहर में मेरे हिंदी विषय के शिक्षक हुआ करते थे। अश्वघोष भी बुलन्दप्रवाह के लिए हमें अपनी रचनाएं भेजा करते थे तथा उनसे ‘बुलन्दप्रभा’ को अपार संबल मिलता था। सहारनपुर की साहित्यिक संस्था ‘समन्वय’ के सचिव एवं साहित्यकार डा. आरपी सारस्वत ने कहा कि कीर्तिशेष डा. अश्वघोष जी का समन्वय संस्था के साथ अत्यन्त आत्मीय जुड़ाव था तथा वह जब तक जीवित रहे, इस संस्था को अपना योगदान देते रहे। वह अपने अनूठे नवगीतों के साथ ‘समन्वय’ संस्था के अभिन्न सहयात्री थे। डा. अनूप सिंह ने कहा कि वर्ष 2014 में डा. अश्वघोष के बुलंदशहर प्रवास के दौरान मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। मैंने उनकी कई काव्य-पुस्तकों के साथ-साथ उनका कहानी संग्रह ‘अपने-अपने हाशिये’ भी पढ़ा है। वह जितने प्रभावशाली गीतकार एवं गजलकार थे, उतने ही सशक्त कथाकार भी थे। उनकी सभी कहानियां मौलिकता की दृष्टि से खरी और अपने कथ्य का सफल निर्वाह करती हुई रोचक और पठनीय हैं। उनके हृदय में भारतीय संस्कृति वास करती थी। वह मूलतः अंतश्चेतना के कवि थे।

    ‘बुलंद प्रभा’ के डा. अश्वघोष विशेषांक के अतिथि संपादक युवा कवि मुकेश निर्विकार ने कहा कि दद्दा अश्वघोष के साथ उनका अत्यंत आत्मीय रिश्ता था। वह मेरे लिए कई-कई किरदारों में थे-मित्रवत्, पितृवत्, साहित्यिक मार्ग-दर्शक, एक ज़िंदादिल बुजुर्ग! दद्दा की स्मृतियां मेरे अंतःकरण में संचित हैं। अश्वघोष के कवि रूप पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि अश्वघोष एक संपूर्ण कवि थे, वह जन्मजात काव्य-चेतना लेकर पैदा हुए थे तथा उनकी चेतना हर समय काव्य-सृजन की टहनी से लगी रहती थी। कविता जैसे उनकी आत्मा में व्याप्त थी। कविता के बिना वह अपना या इस संसार का कहीं कोई अस्तित्व नहीं देखते थे। एक तरह से कविता उनके लिए इस संसार को देखने का इकलौता माध्यम थी। ‘डा. अश्वघोष श्रद्धांजलि विशेषांक’ के विषय में उन्होंने कहा कि बुलंद प्रभा का डा. अश्वघोष श्रद्धांजलि विशेषांक’ बुलंद प्रभा परिवार की ओर से यानि डा. अश्वघोष के अपने गृह जनपद बुलंदशहर वासियों की ओर से दद्दा अश्वघोष के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को सहेजने की एक आत्मीय कोशिश है।

    यह भी पढ़ें : उत्तराखंड के साइलेंट हीरो : डा. हेमंत कुमार पांडेय

    मुजफ्फरनगर के युवा साहित्यकार परमेंद्र सिंह ने कहा कि दद्दा अश्वघोष का जाना मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। मुझे उनके साथ कई वर्षों का साहचर्य मिला। उनके जैसा प्रतिबद्ध कलमकार आज के समय में होना दुर्लभ है। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध कवि देवेंद्र देव ‘मिर्जापुरी’ ने अपने छंदों के माध्यम से डा. अश्वघोष को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

    इस्हाक अली सुंदर ने कहा कि अश्वघोष ने नवगीतकार एवं गजलकार के रूप में जनपद बुलंदशहर का नाम रोशन किया। उनकी काव्य-साधना के लिए उनको हमेशा याद किया जाता रहेगा। पीयूष निगम द्वारा डा. अश्वघोष की गजल ‘ बार-बार क्यों दोहराते हो, एक बार की भूल को’ को गजल के अंदाज में गाकर सुनाया। अरुण भट्ट ने भी डा. अश्वघोष की गजल से उन्हें काव्यांजलि दी।

    कवि और साहित्यकार ओम प्रकाश ‘अंबर’ ने डा. अश्वघोष को याद करते हुए कहा कि आज जो 50 ग़जलें लिख लेता उसे बड़ा गीतकार मान लिया जाता है, उन्होंने जितना लिखा उससे कही ज्यादा फाड़कर फेंक दिया। वह अक्सर ऐसा करते थे। इसके बावजूद उनका रचना संग्रह बहुत बड़ा है।

    अश्वघोष की पुत्री नमिता सिंह ने अपने पिता को समर्पित करती हुई अपनी कविता ‘पापा की यादें’ की पंक्तियां ‘शब्दों की उस गहराई में आज भी आपकी छाप है’ सुनाई। इस अवसर पर अश्वघोष के सुपुत्रों–आशीष वशिष्ठ एवं राहुल वशिष्ठ ने कार्यक्रम में पधारे अतिथियों एवं साहित्य-प्रेमियों का स्वागत एवं आभार व्यक्त किया।

    कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों के साहित्यकारों ने प्रतिभाग किया। इस दौरान यूपी के बुलंदशहर से प्रकाशित हिंदी त्रै-मासिक पत्रिका ‘बुलंद प्रभा’ के ‘डा. अश्वघोष श्रद्धांजलि विशेषांक’ का विमोचन हुआ। राहुल वशिष्ठ ‘उद्घोष’ ने अपने पिताजी पर रचित कविता ‘अश्वघोष’ का वाचन कर सबका मन मुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का संचालन डा. बसंती मठपाल द्वारा किया गया। इस दौरान कार्यक्रम में लेखिका भारती पांडे, श्रीमती कुसुम भट्ट, डा. मनोज आर्या, साहित्य अकादमी की देहरादून चैप्टर की संयोजक मीरा नवेली,  मुकेश नौटियाल, हलधर जी, मुकेश अग्रवाल, वरिष्ठ पत्रकार सुनील गुप्ता, डा. मोहन भुलानी, हिमालयन लीफ के निदेशक हरीश सनवाल, हिमांतर के निदेशक शशि मोहन, हिंदू फाउंडेशन के निदेशक इंद्र सिंह नेगी, समेत कई वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यप्रेमी मौजूद रहे।

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