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    उरख्याली-गंज्याली से सूने हुए आंगन

    वैज्ञानिक आविष्कारों से जिंदगी आसान हुई है। इस दौर को मनुष्य के लिए अब तक का सबसे आरामदायक समय कहा जा रहा है। यानी, हर चीजें आसानी से उपलब्ध हैं। पिछले दशक में हुई डिजिटल क्रांति ने तो सामाजिक ताना-बाना ही बदल कर रख दिया है। इन सबके बीच हमारे कुछ पारंपरिक घरेलू उपकरण, जिनका कभी बहुत महत्व हुआ करता था, वह भी घरों से गायब हो गए। कभी पहाड़ी घरों की शान समझी जाने वाली ओखली-मूसल (उरख्याली-गंज्याली) भी इनमें से एक है। जिस घर के आंगन में ओखली होती थी, उसे गांव के समृद्धशाली परिवारों में गिना जाता था। अब वह कुछ एक घरों के आंगन में ही दिखाई देती है।
    teerandajBy teerandajDecember 21, 2024Updated:December 21, 2024No Comments
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    ओखली (उरख्याली-गंज्याली) पत्थर और कही लकड़ी की बनाई जाती थी और मूसल बाज की लकड़ी से बनाया जाता था। मूसल के वजन का विशेष ध्यान रखा जाता था। इसकी लबाई दो से ढाई मीटर होती थी। मूसल के नीचे लोहे का एक छल्ला लगाकर उसे रंगोली से सजाया भी जाता था। धान कूटने का यह उपकरण बेहद पवित्र माना जाता था। इसे लांघा नहीं जाता था। लेकिन, अब लगता है कि आने वाली पीढ़ियां इसको भूल जाएगी। वजह है, धान कूटने की मशीनों ने पहाड़ों पर कब्जा जमा लिया है। इससे आराम तो मिला हैं लेकिन सदियों पुरानी परंपरा को हम भूल गए हैं।

    सामाजिक विज्ञानी कहते हैं, उरख्याली यानी ओखल में धान कूटते समय महिलाएं, जमा होती थीं, उनमें खूब बातचीत होती थी। दुख-सुख साझा किया जाता था। यहां पर समस्याएं बताई जाती थीं तो समाधान भी यहीं निकलता था। जिनके घरों में ओखली नहीं होती थी, वह दूसरे घरों में जाता था। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इससे सामाजिकता बढ़ती थी। अब अधिकांशतः लोगों के पास मशीन हैं। इस वजह से महिलाएं एक दूसरे से उतनी बातचीत नहीं करती है, जितनी पहले हो जाया करती थीं। स्मार्ट फोन आने के बाद से मेलजोल एकदम कम हो गया है। एक घर में रहने वाले भी कभी-कभार आपस में बातचीत नहीं करते हैं।

    उरख्याली-गंज्याली से धान कूटने के अलावा मंडुवा भी कूटा जाता था. जिसको मंड्या फवण भी कहते हैं। ओखली में मुख्यतः धान, मंडुवा और च्यूड़े. कूटे जाते थे। धान कूटने और मंडुवा कूटने की प्रक्रिया में अंतर होता था। धान को मूसल की फछ की तरफ से कूटा जाता है ताकि उसका छिलका अलग हो सके जिसे भूस कहते हैं। वहीं, मंडुवा या तो हल्के हाथों से या मूसल उल्टा करके फूटा जाता था। धान को दो महिलाएं दोमुसई करके भी फूटती थीं। दोमुसई से तात्पर्य है दो मूसलों से। ओखली से धान कूटना इतना भी आसान नहीं है। इसके लिए एक विशेष प्रकार की दक्षता की जरूरत होती थी। इसने काफी मेहनत लगती थी। पहले की महिलाएं इसमें पारंगत होती थीं।

    दो मुसई करते समय महिलाओं में गजब की ट्यूनिंग होती थी। मूसल जब ओखली में पढ़ता था उससे जो आवाज आती थी वह किसी संगीत से कम नहीं थी। आप किसी बुजुर्ग पहाड़ी महिला से इस बारे में बात करेंगे तो आपको पता चलेगा कि वह दौर कितना सुहाना था। शारीरिक श्रम जरूर था लेकिन वह अखरता नहीं था। दोमुसई के समय महिलाएं बारी-बारी से कुछ सेकेंड के अंतर में मूसल से चोट करती थीं। मूसल को ओखली में पटकते समय जोर का ध्यान रखा जाता था। ताकि, चावल टूटे नहीं। इसमें अनुभव काम आता था। एक महिला पैर से थोड़े बिखर रहे चावलों को पैर से बीच में करती रहती थीं। इसके लिए कभी-कभी एक अन्य महिला भी सहयोग करती थी।

    यह भी पढ़ें: एक खेत…प्रसाद के रूप में बंटती है जिसकी घास

    जो छोटी कूची यानी झाड़ (घास का) से चावल अंदर को धकेलती रहती है, जिसे बटोवण (बटोरना) कहते थे। धान कूटने वाली को कूटनेर और बटोरने वाली को बटनेर कहते थे। ओखली बड़े काम की बीज हैं। पहले इससे च्यूड़े (पोहा या चिवड़े जैसे) भी फूटे जाते थे। खुशबूदार स्वादिष्ट धान को भिगोकर फिर भूनकर फूटा जाता था। इसको एक कूटनेर कूटती है एक बटनेर उल्टे पण्यूल (भात या चावल निकालने की पोनी) से खोदती सी रहती है ताकि भीगे कच्चे धान आपस में चिपके नहीं और बराबर कुट जाएं। अब यह काम मशीनों से होता है। पुराने लोगों को आप अक्सर यह कहते हुए सुनते होंगे कि च्यूड़े में पहले जैसा स्वाद नहीं रहा। इसको लेकर पहाड़ पर कहावतें भी बनी थीं। इनमें से एक है-‘सान क पौण ओखवसार बाम्।’

    इसके लिए पलायन एक बड़ी वजह है। नए युवक-युवतियों पहाड़ पर रहना नहीं चाहती हैं और इस पारंपरिक उपकरण को चलाने में ताकत की जरूरत होती है। यह बुजुर्ग महिलाओं की बस की बात नहीं है। जब घर में रहने वाले लोगों की संख्या कम हो गई तो लोग मशीनों का सहारा लेने लगे।
    खास बात यह कि शादी-ब्याह के मौके पर हल्दी हाथ को रस्म भी ओखली में कूटी गई कच्ची हल्दी से ही पूरी होती थी। पहले त्योहारों के मौके पर ओखली में कूटे गए चावल से ही अरसा जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाते थे। रिश्तेदारों को भी समौण (यादगार) के तौर पर ओखली में कुटे चावल के अरसे या रोट ही दिए जाते थे। ओखली में धान कूटकर निकाले गए चावल को ही नौ ग्रहों की पूजा के लिए प्रयोग किया जाता था। परंपरा के अनुसार पूर्व में जिन क्षेत्रों में धान नहीं होते थे, वहां के लोग ग्रामीण क्षेत्रों से ओखली में कूटे गए चावलों को मंगाते थे।

    शुभ कार्यों में इन्हीं का प्रयोग करते थे। इस चावल में लक्ष्मी का वास माना जाता था। अब यह रवाचत लगभग खत्म हो गई। आन गांवों के चुनिंदा आंगनों में ही ओखली नजर आती है। हालांकि, यह परंपरा आज भी कुछ जगहों पर कायम है। दरअसल, अब लोगों के पास समय नहीं है। शादी-ब्याह में घर के लोग भी रिश्तेदारों की तरह पहुंचते हैं। ऐसे में कौन धान कूटने के लिए ओखली का इस्तेमाल करेगा। सहूलियत के लिए लोग मशीन में ही धान की कुटाई करा लेते हैं। गांवों के लोगों को जोड़ने वाली उरख्याली-गंज्याली विलुप्त होती जा रही है।

    उत्तराखंड 360 परंपरा
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