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    Home»स्पेशल»उत्तराखंड के जंगलों में आग… आखिर हर साल एक जैसी कहानी क्यों?
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    उत्तराखंड के जंगलों में आग… आखिर हर साल एक जैसी कहानी क्यों?

    2019 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के विश्लेषण से पता चलता है कि देश में 36 प्रतिशत जंगलों पर आग का खतरा मंडरा रहा है। इनमें से एक तिहाई ज्यादा संवेदनशील हैं।
    teerandajBy teerandajApril 26, 2024Updated:May 2, 2024No Comments
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    उत्तराखंड के जंगलों में आग
    उत्तराखंड के जंगलों में आग
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    हर साल की भांति इस बार भी उत्तराखंड के जंगल धधक रहे हैं। धूएं के गुबार पहाड़ों को ढक ले रहे हैं। सुंदरता की जगह यहां भय व्याप्त है। चीड़ के पेड़ जो बहुत जल्दी आग पकड़ते हैं वो तो जल ही रहे हैं, साथ में दूसरे पेड़ भी जल रहे हैं। इसका मतलब है कि हालात बहुत गंभीर हैं। उत्तराखंड के जंगलों में आग कई किलोमीटर दूर से देखी जा सकती है। नैनीताल के आसपास के इलाकों में आग बुझाने के लिए वायुसेना के हेलिकॉप्टरों की मदद ली जा रही है। हालत इतने विकराल होते जा रहे हैं इंसानों के साथ-साथ वन्यजीवों का भी सांस लेना दूभर हो गया है। जंगलों की आग गांवों की आबादी के पास तक पहुंच चुकी है।

    22 अप्रैल को एक ओर विश्वभर में जहां पृथ्वी दिवस मनाया जा रहा था वहीं, दूसरी ओर उत्तराखंड के जंगल में आग लगने की घटनाएं तेज हो चुकी थी। 26 अप्रैल तक इसने विकराल रूप धारण कर लिया। बृहस्पतिवार को 24 घंटे के भीतर 54 जगह आग लगने की घटनाएं दर्ज की गईं। यह आंकड़ा और बढ़ सकता है। बताया जा रहा है कि 75 हेक्टेयर वन क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचा है। इस सीजन की गर्मी में अब तक वनाग्नि की 544 घटनाओं में 657 हेक्टेयर वन क्षेत्र जल चुका है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के डाटा के मुताबिक पिछले साल में इसी समयसीमा के दौरान जंगल में आग लगने की 85 घटनाएं सामने आईं थीं। इसमें 300 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। यह आंकड़ें वन संपदा को हुए नुकसान बताने के लिए काफी हैं।

    शुक्रवार को भी जंगलों की आग फैलती रही। हालत गंभीर होते देख वायुसेना के हेलिकॉप्टर कुमाऊं के जंगलों में लगी आग को बुझाने में जुट गए हैं। शनिवार को भीमताल झील से पानी भरकर नैनीताल के जंगलों डाला। वन क्षेत्राधिकारी विजय मेलकानी ने बताया कि वन विभाग के कर्मचारी भी आग बुझाने में जुटे हैं। आग से भीमताल, पाइंस, रानीबाग, सातताल, बेतालघाट और रामगढ़ के जंगलों की वन संपदा को काफी नुकसान पहुंचा है।

    बिजली के तार पर गिरा जलता पेड़, सैकड़ों गांवों की आपूर्ति ठप

    जंगलों की आग से बिजली आपूर्ति प्रभावित हो रही है। शनिवार को पिथौरागढ़ में आग से जला चीड़ का पेड़ बिजली की 33 केवी लाइन पर गिर गया। इस कारण आसपास के 125 गांवों की बिजली आपूर्ति ठप हो गई। रविवार को आपूर्ति बहाल होने की उम्मीद है।

    उत्तराखंड के जंगलों में आग

    उत्तराखंड के जंगलों में आग

    जंगल के नजदीक बसावट भी एक वजह

    राज्य में 38 हजार स्क्वैयर किलोमीटर का फॉरेस्ट एरिया है। यह राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 71 फीसदी है। वन विभाग के मुताबिक जंगल के पास इंसानों की बढ़ती बसावट भी एक वजह है। आग की घटनाओं से वन्यजीव और बायोडायवर्सिटी पर भी बुरा असर पड़ रहा है। अभी हाल में ही देवप्रयाग पौड़ी रोड पर भी जंगल में आग लग गई थी। इसे बुझाने में वनकर्मियों को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी।
    आग की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शनिवार को मुख्यमंत्री आवास में प्रभागीय वन अधिकारियों के साथ इन घटनाओं की रोकथाम के संबंध में वर्चुअल बैठक भी की थी। इसके बाद वन विभाग ने आग की घटनाओं को रोकने व सूचना देने के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किया था।

    जंगलों में बढ़ रहीं आग लगने की घटनाएं

    जलवायु परिवर्तन का असर पहाड़ों पर साफ दिखने लगा है। अप्रैल की चटख धूप के बीच उत्तराखंड के जंगलों में आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। नई टिहरी, रानीखेत, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत, नरेंद्रनगर, उत्तरकाशी, तराई पूर्वी, लैंसडौन, हल्द्वानी, रामनगर, रुद्रप्रयाग, केदारनाथ वन प्रभाग, कालागढ़ टाइगर रिजर्व और राजाजी टाइगर रिजर्व व नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क में जंगल की आग की घटनाएं दर्ज की गई हैं। लाख प्रयासों के बावजूद जंगल की आग पर काबू पाने में वनकर्मियों के हाथ-पांव फूल रहे हैं। खासकर रिहायशी क्षेत्रों के आसपास फायर ब्रिगेड की भी मदद ली जा रही है।

    क्यों धधक रहे जंगल

    जब गर्मी बढ़ जाती है तब पूरे जंगल को अपने आगोश में लेने के लिए एक हल्की चिनगारी काफी होती है। ये चिनगारी जंगलों से गुजरने वाली ट्रेनों के पहियों से निकल सकती है या फिर टहनियों की रगड़ से। सूरज की तेज किरणें भी आग को बढ़ावा देती है। हालांकि, अधिकतर घटनाएं मानवीय लापरवाही के कारण होती हैं। जैसे कैंप फायर, सिगरेट का जलता टुकड़ा फेंकना, पटाखें और माचिस की तिल्लियां आदि। हवा की गति अगर तेज है तो आग तेजी से फैलती है। गर्मी में पेड़ों की टहनियां और शाखाएं सूख जाती हैं और ये आसानी से आग पकड़ लेती हैं। जंगल में अगर ढलान है तो आग और तेजी से फैलती है। पहले सूखे घास में अगा लगती है। फिर पेड़ों को अपनी गिरफ्त में ले लेती है।

    उत्तराखंड के जंगलों में आग

    देश के 36 प्रतिशत जंगलों पर आग का खतरा

    राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने जंगलों की आग को प्राकृतिक खतरा नहीं माना है। एनडीएमए ने अपनी वेबसाइट पर सिर्फ़ चक्रवात, सूनामी, हीटवेव, भूस्खलन, बाढ़ और भूकंपों को ही इस श्रेणी में रखा है। 2019 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के विश्लेषण से पता चलता है कि देश में 36 प्रतिशत जंगलों पर आग का खतरा मंडरा रहा है। इनमें से एक तिहाई ज्यादा संवेदनशील हैं। एनडीएमए के एक सदस्य बताते हैं, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने जंगल की आग को प्राकृतिक खतरों की सूची में नहीं रखा है। क्योंकि, देश में जंगल की अधिकतर आग जान बूझकर कृषि से जुड़ी वजह के लिए लगाई जातीं हैं। यह एक मानवनिर्मित खतरा है। हालांकि, यह वन्यजीवों के साथ ही इंसानों पर भी बुरा असर डाल रहा है।

    कुछ वर्षों पहले गठित स्टैंडिंग फायर एडवायजरी कमिटी की रिपोर्ट में देश की अग्निशमन सेवाओं की गंभीर खामियों को सामने लाया जा चुका है। समिति ने अपनी जांच में पाया था कि देश में अग्निशमन दलों में शामिल 80 प्रतिशत वाहन फिट नहीं हैं। देश में जरूरत के हिसाब से अग्निशमनकर्मियों की संख्या 96 फीसदी कम है। हालांकि, इस रिपोर्ट के बाद सुधार किए गए हैं लेकिन यह अपर्याप्त हैं। कुमाऊं जिले के पर्यावरण कार्यकर्ता अनिरुद्ध जडेजा बताते हैं कि जंगल की आग पहले से अधिक गंभीर होती जा रही है लेकिन प्रशासन की तैयारी नजर नहीं आती है। हमारे जंगल बहुत बड़े हैं और वन विभाग के कर्मचारियों की संख्या बहुत कम है।

    आग बुझाने में स्थानीय सहयोग नहीं

    विशेषज्ञ कहते हैं कि जंगलों में रहने वाले लोग आग बुझाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। इसकी एक बड़ी वजह स्थानीय लोगों और वन विभागों के बीच विश्वास की कमी है। समुदाय चाहते हैं कि जंगलों पर उनके अधिकारों की रक्षा की जाए। इस वजह से उनके और वन विभाग के बीच तनाव का माहौल बना रहता है।

    जंगल की आग जरूरी, लेकिन कितनी?

    धरती पर जंगलों की आग का इतिहास बहुत पुराना है। कहा जाता है कि जंगल की आग आवश्यक भी है। दरअसल, जंगलों में पेड़-पौधों की सैकड़ों ऐसी कई प्रजातियां होती हैं जिनके बीजों को अंकुरित होने के लिए धुएं की जरूरत होती है। अगर जंगलों में आग न लगे तो वो बीज अंकुरित नहीं होंगे और यह प्रजातियां लुप्त हो जाएंगी। साथ ही जंगलों में सूखे पत्ते भी जमा हो जाते हैं। नए पौधों उगने के लिए जगह की जरूरत भी होती है। लेकिन, सवाल यह है कि जितनी घटनाएं हो रही हैं क्या वह जरूरी हैं। इसका जवाब न में है। मतलब जरूरत से बहुत ज्यादा आग लगने की घटनाएं हो रही हैं।

    सूचना देने के लिए नंबर भी जारी

    वन विभाग की ओर से मुख्यालय में कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है। साथ ही जंगल की आग की सूचना देने के लिए नंबर भी जारी किए गए हैं। लोग 18001804141, 01352744558 पर फोन कर सकते हैं। साथ ही 9389337488 व 7668304788 पर व्हाट्सएप के माध्यम से भी सूचित कर सकते हैं। इसके अलावा राज्य आपदा कंट्रोल रूम देहरादून को भी 9557444486 और हेल्पलाइन 112 पर भी आग की घटना की सूचना दे सकते हैं।

    उत्तराखंड के जंगल में आग उत्तराखंड न्यूज
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