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    Home»स्पेशल»जुगनू … गांव की जमीन पर अब नही उतरते ये नन्हे सितारे
    स्पेशल

    जुगनू … गांव की जमीन पर अब नही उतरते ये नन्हे सितारे

    पर्यावरण व प्रकाश प्रदूषण इनके वजूद के लिए बना संकट, आत्म प्रकाश और आकर्षण के प्रतीक माने जाते हैं जुगनू
    teerandajBy teerandajNovember 2, 2025No Comments
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    जब टूटने लगे हौंसला तो इतना याद रखना,कि बिना मेहनत के तख़्त-ओ-ताज हासिल नहीं होते, ढूंढ लेते हैं जुगनू अंधेरो में भी मंजिल,क्यूंकि वो कभी रौशनी के मोहताज नहीं होते’…..शायर मेराज फैजाबादी की उक्त पंक्तियां हमें यह भी सिखाती है कि सच्ची लगन और मेहनत से हम किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं और अपने सपनों को पूरा कर सकते हैं,…जी हां हम बात कर रहे हैं जुगनू की,गांवो में अब जुगनुओं की टिमटिमाहट पहले जैसी नही दिखती। पर्यावरण प्रदूषण,कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग तथा प्रकाश प्रदूषण के कारण इनकी संख्या। में लगातार कमी आ रही है। जुगनू, जिन्हें आत्म- प्रकाश, आकर्षक और आत्म जागरूकता का प्रतीक माना जाता है, अब यदाकदा ही अपनी चमक बिखेरते नजर आते हैं।

    जुगनुओं की घटती संख्या का मुख्य कारण मानवीय गतिविधियां हैं। पर्यावरण में बढ़ता प्रदूषण, खेतों में कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल और रात के समय कृत्रिम रोशनी का बढ़ता चलन इनके अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन गया है। इन कारकों के चलते जुगनू अब पहले की तरह दिखाई नहीं देते। प्राचीन काल में जुगनुओं को सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। इन्हें दिव्य संदेशवाहक के रूप में देखा जाता था। नवरात्र जैसे पवित्र पर्वों पर इन्हें इच्छाएं मां तक पहुंचाने का माध्यम समझा जाता था। कुछ संस्कृतियों में इन्हें सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है और घरों में इनका आना शुभ संकेत माना जाता रहा है।

    कभी हर गांव की चौखट पर टिमटिमाने वाले ये जीव अब केवल किसी दुर्लभ रात में ही दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के कीट विज्ञानी नरेंद्र मौर्या बताते हैं कि जुगनू कीटों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके विलुप्त होने से कीटों की आबादी बढ़ सकती है, जिससे फसलों और वनस्पतियों को नुकसान हो सकता है। इनके विलुप्त होने से पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ता है। जिससे अन्य प्रजातियों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। यही नहीं जुगनू कई अन्य प्रजातियों के लिए भोजन का स्रोत भी है। उनके विलुप्त होने से इन प्रजातियों की आबादी पर बुरा असर पड़ रहा है। जानकारों का कहना है कि जुगनू जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    रात के समय कृत्रिम रोशनी का बढ़ता उपयोग विशेष रूप से जुगनूओं जैसे जीव-जंतुओं को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। जुगनू प्रकाश संकेतों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं और उनकी प्रजनन गतिविधियां एक विशेष समय तक सीमित होती हैं। कृत्रिम प्रकाश के कारण वे भटक जाते हैं, जिससे उनके अंधे होने का खतरा भी बना रहता है। पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में इन छोटे कीटों का अहम योगदान होता है। इनकी संख्या में कमी पारिस्थितिकी असंतुलन को बढ़ा सकती है। आधुनिक प्रकाश स्रोत जीव जंतुओं की दृष्टि पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं,जिससे प्रकृति का यह अनमोल हिस्सा धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है।

    कवि व शायरों ने अपनी रचनाओं में भी जुगनू को दिया है महत्व

    जुगनू को लेकर कई कवि और शायर अपनी रचनाओं में अक्कासी की है, जिनमें से एक प्रसिद्ध कविता हरिवंशराय बच्चन की “जुगनू” है। इस कविता में, बच्चन साहब ने जुगनू को एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया है, जो अंधेरे में भी रोशनी फैलाता है और आशा की किरण बनता है।

    इस कविता में, हरिवंशराय बच्चन साहब कहते हैं

    “अंधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
    उठी ऐसी घटा नभ में, छिपे सब चांद-व-तारे,
    उठा तूफान वह नभ में, गए बुझ दीप भी सारे,
    मगर इस रात में भी लौ लगाए कौन बैठा है?”

    यह कविता हमें इस बात की सीख देती है कि अंधेरे में भी एक छोटी सी रोशनी बहुत मायने रखती है, और हमें हमेशा आशा की किरण बनने का प्रयास करना चाहिए।

    जुगनू चमकते क्यों हैं
    जुगनू में ल्यूसिफेरिन नामक एक रासायनिक पदार्थ होता है। जब यह ऑक्सीजन के संपर्क में आता है, तो यह एक रासायनिक प्रतिक्रिया करता है जिससे प्रकाश उत्पन्न होता है। कीट विज्ञानी बताते हैं कि कीटनाशकों का कम उपयोग, प्लास्टिक और अन्य कचरा कम करना और प्रकाश प्रदूषण को नियंत्रित कर हम जुगनुओं को विलुप्त होने से बचा सकते हैं। जुगनू मानव जीवन में कई तरह से महत्वपूर्ण है।जुगनू के लार्वा हानिकारक कीड़ों का शिकार करते हैं। वैज्ञानिक रूप से इनकी जैव-प्रकाश क्षमता का उपयोग कैंसर अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में भी किया जा रहा है।

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