- अतुल्य उत्तराखंड के लिए चारू तिवारी
अस्सी-नब्बे का दशक उत्तराखंड राज्य आंदोलन का रहा। उत्तराखंड राज्य आंदोलन की यह ताप कई आंदोलनों और लोगों की आकांक्षाओं के चलते और तेज हो रही थी। सत्तर के शुरुआती दौर से ही यहां वन आंदोलन तेज हो गया था। गढ़वाल और कुमाऊं विश्वविद्यालय के आंदोलनों ने यहां के युवाओं में नई राजनीतिक चेतना का संचार किया। आपातकाल के प्रतिकार में भी युवाओं की भागीदारी रही। ‘नशा नहीं रोजगार दो’ से लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चली। शराब के खिलाफ महिलाएं सड़क में उतरीं। रोजगार का मुद्दा था। जल, जंगल और जमीन की लड़ाइयां तेज हुईं। कई संगठन और युवा नई ऊर्जा के साथ इनमें शामिल हुए, जिन्होंने बाद में उत्तराखंड राज्य आंदोलन में केंद्रीय भूमिका निभाई। इनमें से एक प्रमुख नाम दिवाकर भट्ट का था, जो कई आंदोलनों से होकर बाद में उत्तराखंड राज्य आंदोलन का बड़ा चेहरा बने। उनके निधन से आंदोलनों के एक युग की समाप्ति हो गई।

आप दिवाकर भट्ट से असहमति रख सकते थे, लेकिन उनको खारिज नहीं कर सकते। उन्होंने उत्तराखंड के कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। एक लड़ाकू और मुद्दों के प्रति जिद्दीपन उनके स्वभाव में था। दिवाकर भट्ट को लोग जिस रूप में देखते रहे हैं, उसकी पृष्ठभूमि भी बहुत गहरी थी। वह टिहरी के बडियारगढ़ की उस जमीन में 1944 में पैदा हुए जहां कभी टिहरी रियासत के दमनकारी शासन के खिलाफ आवाज उठी। सत्तर के दशक में वन आंदोलन का केंद्र भी यह क्षेत्र रहा है। एक तरह से यह आंदोलनों की जमीन रही है। दिवाकर भट्ट का जन्म भी उसी दौर में हुआ जब टिहरी रियासत के खिलाफ आंदोलन करते 1944 में श्रीदेव सुमन ने अपनी शहादत दी थी। वह उस क्षेत्र में जन्मे, जहां नागेंद्र सकलानी और मोलू भरदारी की शहादत हुई। उनका राजनीतिक कार्य क्षेत्र भी कीर्तिनगर ही रहा। आजादी के प्रति सपने और उसकी हकीकत के बीच दिवाकर भट्ट जी की पीढ़ी बढ़ रही थी। यही वजह है उनमें इस सबका प्रभाव पड़ा और वह 19 वर्ष की बहुत छोटी उम्र में आंदोलनों में शामिल होने लगे।
उत्तराखंड राज्य की मांग को पहली बार दिल्ली की सड़कों पर लाने का काम ऋषि बल्लभ सुंदरियाल के नेतृत्व में 1968 में हुआ था। तब दिल्ली के बोट क्लब में विशाल रैली में भाग लिया। बाद में 1972 सांसद त्रेपन सिंह नेगी के नेतृत्व में हुई रैली में वह शामिल हुए। वर्ष 1977 में वह ‘उत्तराखंड युवा मोर्चा’ के अध्यक्ष रहे। जब 1978 में त्रेपन सिंह नेगी और प्रताप सिंह नेगी के नेतृत्व में दिल्ली के बोट क्लब पर रैली हुई तो दिवाकर भट्ट उन युवाओं में शामिल थे, जिन्होंने बद्रीनाथ से दिल्ली तक पैदल यात्रा की थी। इसमें आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी हुई और तिहाड़ जेल में रहना पड़ा। दिवाकर भट्ट ने अपनी आईटीआई की पढ़ाई के बाद हरिद्वार के बीएचईएल में कर्मचारी नेता के रूप में अपनी विशेष जगह बनाई। उन्होंने 1970 में ‘तरुण हिमालय ‘ नाम से संस्था बनाई इसके माध्यम से रामलीला जैसे सांस्कृतिक और एक स्कूल की स्थापना कर शिक्षा के क्षेत्र मे भी काम किया। दिवाकर भट्ट ने 1971 में चले गढ़वाल विश्वविद्यालय आंदोलन में भी भागीदारी की। उनके तेवर उस जमाने में भी ऐसे थे कि बद्रीनाथ के कपाट खुलने के समय शांति व्यवस्था भंग होने की आशंका से उन्हें उनके साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया था।
दिवाकर भट्ट 1979 में बनी उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापकों में से थे। उन्हें पार्टी का संस्थापक उपाध्यक्ष बनाया गया था। उत्तराखंड राज्य आंदोलन में उनकी भूमिका पर जितना कहा जाए वह कम है। उत्तराखंड क्रांति दल बनने से पहले से ही वह इसमें शामिल रहे। उक्रांद की स्थापना के बाद लगातार राज्य की मांग को सड़क पर लड़ने में उनकी अग्रणी और केंद्रीय भूमिका रही है। उक्रांद के नेतृत्व में कुमाऊं-गढवाल मंडलों का घेराव, दिल्ली में 1987 की ऐतिहासिक रैली, समय-समय पर किए उत्तराखंड बंद में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। 1988 में वन अधिनियम के चलते रुके विकास कार्यों को पूरा करने के लिए बड़ा आंदोलन हुआ, जिसमें भट्ट जी की गिरफ्तारी हुई। जब 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन की ज्वाला भड़की तो दिवाकर इस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक थे। जब 1994 के बाद आंदोलन ढीला पड़ा तो उन्होंने नवंबर, 1995 में श्रीयंत्र टापू और दिसंबर, 1995 में खैट पर्वत पर अपना आमरण अनशन किया। श्रीयंत्र टापू में यशोधर बैंजवाल और राजेश रावत शहीद हुए।

राजनीति में सक्रिय रहते हुए वह 1982 से लेकर 1996 तक तीन बार कीर्तिनगर के ब्लॉक प्रमुख रहे। उन्होंने जितने भी विधानसभा चुनाव लड़े उन्हें हमेशा भारी वोट मिला। वर्ष 2007 में विधायक और मंत्री भी बने। यह भी एक पहलू है कि दिवाकर भट्ट ने भाजपा सरकार के साथ मिलकर मंत्री पद पाया। वह 2017 और 2022 का चुनाव भी हारे। वर्ष 2012 का चुनाव उन्होंने भाजपा के समर्थन से लड़ा था। इसमें उनकी हार हुई। दिवाकर भट्ट 1999 और 2017 में उक्रांद के केंद्रीय अध्यक्ष रहे।
दिवाकर भट्ट के राजनीतिक-सामाजिक जीवन में कई विवाद और मिथक अपने आप जुड़ जाते हैं। उनके बारे में कहा जाता है उन्होंने राजनीति में आक्रामक शैली को अपना आधार बनाया। राज्य आंदोलन में उनकी उग्रता के किस्से लोग चटकारे लेकर सुनाते हैं। उनकी पार्टी उक्रांद की नई पीढ़ी के लोग उनके मुंबई में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से मिलने और उनसे आंदोलन के लिए 25 लाख रुपये लाने की बात प्रमुखता से प्रचारित कर रहे हैं… और बता रहे हैं कि कैसे वह ठाकरे की मदद से पहाड़ी अस्मिता को बचाने का यत्न कर रहे थे। लेकिन सच यह है कि उनके इस कार्य पर उक्रांद ने भारी नाराजगी व्यक्त की थी। उक्रांद ने कभी भी बाल ठाकरे वाले प्रकरण को अपनी पार्टी की नीति नहीं बताई। उनके आंदोलनों के तौर-तरीकों से भी पार्टी में भारी असहमति रहती थी। यही वजह थी कि पार्टी में समय-समय पर टूट भी होती रही। दिवाकर भट्ट जी को लोग एक जीवट आंदोलनकारी के रूप में जानते हैं। यह भी कि वह लड़ना जानते हैं, जीतना भी। लोग उम्मीद कर रहे थे कि दिवाकर अपनी जीवटता से अपनी बीमारी से भी लड़ेंगे और जीतेंगे भी। वह आखिरी सांस तक लड़ते भी रहे।
फील्ड मार्शल की उपाधि
उत्तराखंड के गांधी कहे जाने वाले इंद्रमणि बडोनी ने 1993 में श्रीनगर में हुए उत्तराखंड क्रांति दल के अधिवेशन में दिवाकर भट्ट के तेवर देखकर उन्हें फील्ड मार्शल बताया था। इसके बाद यह उनका उपनाम हो गया।घेरा डालो, डेरा डालो…
फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट को लेकर कई कहानियां हैं। ‘घेरा डालो, डेरा डालो’ तो राज्य आंदोलन के समय नारा बन गया था। वह अक्सर इसे दोहराते थे। युवा भी इससे काफी प्रभावित होते थे। दरअसल, 1994 में जुलाई माह में भट्ट ने नैनीताल और पौड़ी में बड़े आंदोलन खड़े किए थे। जिसमें उत्तराखंड राज्य निर्माण, वन कानूनों में संशोधन, पंचायतों का परिसीमन क्षेत्रफल के आधार पर करने, केंद्रीय सेवाओं में पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को 2 प्रतिशत आरक्षण लागू करने, पर्वतीय क्षेत्र में जाति के बजाय क्षेत्रफल के आधार पर आरक्षण देने और हिल कैडर को सख्ती से लागू करने की पांच सूत्री मांग प्रमुख थी। तब उन्होंने ‘घेरा डालो-डेरा डालो’ का नारा दिया था।








