Uttarakhand के सरकारी स्कूलों में हाईटेक शिक्षा के चमकदार दावे अब हकीकत की कसौटी पर फेल हो रहे हैं। शिक्षा विभाग कंप्यूटर लैब्स और डिजिटल क्लासरूम की बातें तो करता है लेकिन राज्यभर के हजारों बच्चे आज भी बिजली, पीने के पानी और फर्नीचर जैसी बुनियादी सुविधाओं से महरूम हैं। शिक्षा विभाग की हालिया रिपोर्ट ने इस बदहाली को बेनकाब कर दिया है जिससे शिक्षा व्यवस्था की नींव हिल गई है। पहाड़ी इलाकों में स्थिति सबसे खराब है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार 275 सरकारी स्कूलों में बिजली का कनेक्शन नहीं पहुंचा। 191 स्कूलों में बच्चों को साफ पीने का पानी तक नसीब नहीं। सर्द हवाओं वाले मौसम में 6800 से अधिक छात्र डेस्क-बेंच के अभाव में जमीन पर बैठकर पढ़ाई करने को विवश हैं। एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि 40 से ज्यादा स्कूल केवल एक ही शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। इससे न सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा होना मुश्किल हो रहा बल्कि शिक्षा का स्तर भी गिरता जा रहा है।
जर्जर भवनों से मंडराया खतरा
बुनियादी ढांचे की कमी यहीं नहीं थमती। पिछले मानसून में दर्जनों स्कूलों की छतें टपकने लगीं, दीवारों में गहरी दरारें पड़ गईं और क्षतिग्रस्त बिजली तारों से दुर्घटना का खतरा बढ़ गया। बागेश्वर जिले में 16 स्कूलों और 20 आंगनबाड़ी केंद्रों को गंभीर रूप से जर्जर घोषित कर स्थानांतरित करना पड़ा। शिक्षक अस्थायी शेडों या खुले में कक्षाएं चला रहे हैं। एक स्थानीय शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि बच्चों की जान जोखिम में है लेकिन मरम्मत के नाम पर सिर्फ कागजी कार्रवाई की जा रही है।
शिक्षामंत्री ने किया था स्वीकार

शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने विधानसभा में स्वीकार किया था कि कुछ स्कूलों में बुनियादी ढांचे की कमी चिंता का विषय है। विभाग ने सभी स्कूलों में सुधार के लिए दो साल की समयसीमा तय की है। जिसके लिए 800 करोड़ रुपये की जरूरत बताई। क्लस्टर स्कूल योजना के तहत 559 माध्यमिक और 679 प्राथमिक स्कूलों को बेहतर सुविधाओं से जोड़ा जाएगा। उद्योगपतियों और पूर्व छात्रों के साथ स्कूल गोद लेने के एमओयू साइन हो चुके हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये कदम नाकाफी हैं। शिक्षा के अधिकार कानून (आरटीई) के तहत अनिवार्य सुविधाओं की कमी सरकारी स्कूलों से छात्रों का पलायन बढ़ा रही निजी संस्थानों को फायदा हो रहा।








