गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर के रसायन विज्ञान विभाग की टीम ने बायो-एथेनॉल निर्माण की नई राह खोल दी है। अब तक देश में अल्कोहल मुख्य रूप से गन्ने के रस और शीरे (मोलासेस) से तैयार किया जाता रहा है। इसमें सबसे बड़ी दिक्कत यह सामने आती है कि कच्चा माल समय से नहीं मिल पाता है। यानी, उसकी उपलब्धता सीमित है। बढ़ती मांग के कारण वह महंगा भी होता है। ऐसे में कृषि और वानिकी अपशिष्ट से अल्कोहल उत्पादन की यह तकनीक गेमचेंजर साबित हो सकती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार गन्ने का बगास, पॉपुलर और यूकेलिप्टस जैसी लकड़ी में सेल्यूलोज प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है। यही सेल्यूलोज अल्कोहल उत्पादन की आधारशिला है। नई प्रक्रिया में पहले बायोमास का विशेष प्री-ट्रीटमेंट किया जाता है, जिससे उसकी संरचना ढीली होती है। इसके बाद एंजाइम की मदद से जटिल सेल्यूलोज को साधारण शर्करा में बदला जाता है। अंततः किण्वन प्रक्रिया के जरिए यही शर्करा अल्कोहल में परिवर्तित हो जाती है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी लागत-प्रभावशीलता बताई जा रही है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इससे 10 से 12 प्रतिशत तक बेहतर रिकवरी मिल सकती है जो औद्योगिक स्तर पर इसे व्यावहारिक और लाभकारी बनाती है। साथ ही, यह प्रक्रिया पर्यावरण के लिहाज से भी उपयोगी है क्योंकि कृषि और लकड़ी के अवशेषों को जलाने की प्रवृत्ति कम होगी और प्रदूषण घटेगा।

देश में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति के चलते एथेनॉल की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में वैकल्पिक स्रोतों से उत्पादन बढ़ाना जरूरी हो गया है। पंतनगर की यह तकनीक न केवल एथेनॉल उत्पादन को नया आधार दे सकती है। विदेशी मुद्रा की बचत में भी योगदान कर सकती है। विश्वविद्यालय अब इस तकनीक को व्यावसायिक रूप देने और उद्योगों तक पहुंचाने की दिशा में पहल कर रहा है। यदि बड़े पैमाने पर इसे अपनाया गया तो चीनी मिलों और लकड़ी आधारित उद्योगों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलेगा। कृषि विश्वविद्यालय में रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. एमपी जैन मीडिया से बातचीत में नए शोध की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि उनकी टीम ने गन्ने के बगास, पॉपुलर और यूकेलिप्टस जैसे बायोमास से अल्कोहल उत्पादन की किफायती तकनीक विकसित की है। इस प्रक्रिया में विशेष प्री-ट्रीटमेंट और एंजाइम की मदद से सेल्यूलोज को सरल शर्करा में बदला जाता है जिसे बाद में किंवन के जरिये एथेनॉल में परिवर्तित किया जाता है। इससे 10 से 12 प्रतिशत तक बेहतर रिकवरी संभव है। यह तकनीक औद्योगिक स्तर पर लागू होने के लिए तैयार है और इससे आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।
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