उत्तराखंड उन राज्यों की सूची में शामिल हो गया है जहां ग्रीन सेस या कहें पर्यावरण टैक्स लिया जा रहा है। राज्य में बाहर से आने वाले सभी वाहनों पर ग्रीन टैक्स लागू होगा। इसे पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। सवाल यह है कि इससे क्या सचमुच देवभूमि के लोगों को जाम से मुक्ति मिलेगी? लोगों को दमघोंटू वाहनों के धूएं वाली हवा से निजात मिलेगी? या सिर्फ ग्रीन सेस से हरियाली सिर्फ सरकारी खजाने में ही आएगी? क्योंकि अनुमान लगाया जा रहा है कि सौ से डेढ़ सौ करोड़ रुपये सरकारी खजाने में आएंगे। अब यह देखना है कि ग्रीन सेस से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कितनी मदद मिलती है।

पुष्कर सिंह धामी सरकार ने जब ग्रीन सेस की अधिसूचना जारी की तो कहा गया कि इस कदम का उद्देश्य हिमालय के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करना और देहरादून, मसूरी, नैनीताल और ऋषिकेश जैसे लोकप्रिय पर्वतीय स्थलों में वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करना है। लेकिन, विशेषज्ञ इस पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि जो लोग हजारों रुपये खर्च कर यहां आने का प्लान बनाते हैं उनके लिए दो-चार सौ रुपये और खर्च करना बड़ी बात नहीं होगी। दूसरा पहलू, अगर कवायद सरकारी खजाना भरने की है तो उन रुपयों का इस्तेमाल पर्यावरण संरक्षण, यातायात व्यवस्था सुधारने की दिशा में ही हो, यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। गौर करने वाली बात यह है कि हमारे पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश के मनाली में वर्ष 2004 से ही ग्रीन सेस लेने की शुरुआत हो गई थी। उत्तराखंड सरकार ने पिछले साल यानी 2024 में भी ग्रीन सेस लगाने का ऐलान किया था। लेकिन, शुल्क तय नहीं हो पाने के कारण ये लागू हो पाया था। इस बार प्रदेश सरकार ने व्यवस्था को लागू करने की पूरी तैयारी कर ली है।

खास बात यह है कि यह कर पूरी तरह से स्वचालित डिजिटल प्रणाली के माध्यम से वसूला जाएगा। यह संग्रह प्रक्रिया पूरी तरह से स्वचालित होगी और इसमें स्वचालित नंबर प्लेट पहचान (एएनपीआर) कैमरे लगाए जाएंगे, जिन्हें 37 राज्य प्रवेश बिंदुओं पर लगाया जा रहा है। चूंकि वाहनों से होने वाला उत्सर्जन शहरी और पहाड़ी क्षेत्रों में प्रदूषण का एक प्रमुख कारण बना हुआ है, इसलिए वास्तविक समय निगरानी और प्रत्यक्ष भुगतान कटौती का यह मॉडल भारत के अन्य पहाड़ी या पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील राज्यों के लिए एक आदर्श बन सकता है। रजत जयंती वार्षिकोत्सव के मौके पर हुई घोषणा के मुताबिक, 1 दिसंबर से ग्रीन सेस वसूला जाना था। लेकिन, तकनीकी कारणों से प्रक्रिया धरातल पर नहीं उतर पाई। बताया जा रहा है कि ग्रीन सेस कलेक्शन के लिए तैयार सॉफ्टवेयर का अभी तक एनपीसीआई (नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया) और भारत सरकार की वाहन डेटा बेस से इंटीग्रेशन नहीं हो पाया है। संभावना जताई जा रही है कि नए साल से पहले ग्रीन सेस कलेक्शन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
देखते हैं क्या होता है आगे
सस्टेनेबल डेवलपमेंट और पर्यावरण पर कार्य करने वाली सार्वजनिक-हित संस्था सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज (एसडीसी) फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल कहते हैं, कागजों पर यह पहल काफी अच्छी दिखती है। योजना पर अमल कितना होता है? योजना पर अमल होने के बाद नतीजे क्या आते हैं? यह देखना दिलचस्प रहेगा। सरकार कई योजनाओं की घोषणा जोश में कर देती है लेकिन उसपर ढंग से अमल नहीं होता। देहरादून में बनी मल्टीलेवल पार्किंग का उदाहरण लें, एक दिन हमारे मित्र वहां घंटों फंसे रहे। कारण, गाड़ियों को लिफ्ट करने वाली मशीन काम नहीं कर रही थी। इसी तरह इस योजना को लेकर मन में कई सवाल है।

उत्तराखंड में एंट्री के कई प्वाइंट हैं। कहां-कहां टोल नाका बनाएंगे। दूसरी बात, टोल प्लाजा पर ट्रैफिक कंट्रोल के लिए क्या कोई व्यवस्था की गई है? ये सारी चीजें बहुत पहले क्लीयर हो जानी चाहिए थी। जैसा अनुमान लगाया जा रहा है कि सरकार को सालाना 100 से 150 करोड़ रुपये की आय होगी। उसका इस्तेमाल कहां होगा? इसपर पारदर्शिता होनी चाहिए। एक अगस्त को बड़े जोरशोर के साथ मसूरी में पंजीकरण की व्यवस्था की गई थी। यानी मसूरी जाने वाले पर्यटकों के लिए पंजीकरण अनिवार्य किया गया था। लेकिन, यह व्यवस्था स्वत: समाप्त हो गई।
पर्यटन पर कितना असर
ग्रीन सेस लगाने की घोषणा के बाद कहा जाने लगा है कि इससे पर्यटन पर असर पड़ेगा। हालांकि, एसडीसी फाउंडेशन के अनूप नौटियाल कहते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कोई दिल्ली, जयपुर या अन्य शहरों से अपनी गाड़ी में आ रहा है तो उसके लिए 100-200 रुपये और खर्च करना कोई बड़ी बात नहीं है। वह यह भी कहते हैं कि इससे पर्यावरण पर भी कोई असर नहीं पड़ने वाला है। मेरी चिंता यह है कि इससे शहर की ट्रैफिक व्यवस्था और गड़बड़ा न जाए। खैर, सरकार की इस पहल का नतीजा भी कुछ दिनों में दिखने लगेगा।








