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    Home»कवर स्टोरी»उम्मीदों पर कितनी खरी नई श्रम संहिता ! जानिए सबकुछ
    कवर स्टोरी

    उम्मीदों पर कितनी खरी नई श्रम संहिता ! जानिए सबकुछ

    संगठित क्षेत्रों में काम करने वालों को समय पर तनख्वाह, नौकरी बची रहने की थोड़ी सी गारंटी इसके अलावा कुछ अधिक नहीं चाहिए होता है। वहीं, असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले भी समय पर और मजूदरी के अनुरूप मेहनताना चाहते हैं। क्या इन आकांक्षाओं पर खरी उतरेगी नई श्रम संहिता? निजी क्षेत्र में काम करने वाले अधिकांश लोग पूरा जीवन डर-डर के नौकरी करते हैं। हर समय उनको आशंका घेरे रहती है कि कहीं उनको नौकरी से निकाल न दिया जाए। नए श्रम कानूनों में क्या उनकी शंकाओं का समाधान किया गया है? सबसे बड़ा सवाल यही है। क्योंकि आधी से अधिक आबादी निजी क्षेत्रों में काम करते हैं। आइए, जानते हैं कैसे हैं नए श्रम कानून....
    teerandajBy teerandajDecember 14, 2025Updated:December 14, 2025No Comments
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    किसी सरकारी विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के लिए कोई पद निकलता है। पीएचडी, एमबीए, पोस्ट ग्रेजुएट जैसे लोग आवेदन कर देते हैं। देश में सरकारी नौकरी को लेकर इतनी बेताबी क्यों है? निजी क्षेत्र में भी बहुत लोग ऐसे हैं जो अच्छा पैसा कमा रहे हैं। तो इसकी क्या वजह एक ही है- नौकरी की गारंटी। प्राइवेट सेक्टर में कितनी भी अच्छी कंपनी क्यों न हो, वहां काम करने वाले लोगों में असुरक्षा की भावना होती है। नए श्रम कानून लागू होने के बाद लोगों की दिलचस्पी यह जानने में है कि उनकी नौकरी कितनी सुरक्षित रहेगी। नए श्रम कानून के बारे में सरकार का दावा है कि इससे 40 करोड़ कर्मचारियों को लाभ होगा। देश में असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों का दायरा काफी बड़ा है। उनकी सुरक्षा का बंदोबस्त किया गया है। क्योंकि पुराने कानून अब प्रासंगिक नहीं रह गए इसलिए 29 पुराने कानूनों को चार संहिताओं में समाहित किया गया है।

    केंद्र सरकार का दावा है कि यह कानून कर्मचारियों के हित में है, क्योंकि पुराने कई श्रम कानून स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-उत्तर काल (1930-1950) में बने थे। जब अर्थव्यवस्था और रोजगार की प्रकृति आज से बिल्कुल अलग थी। इन पुराने कानूनों के कारण श्रमिकों और उद्योगों दोनों को अनुपालन में कठिनाई होती थी। अधिकांश देश पहले ही अपने श्रम नियमों को आधुनिक बना चुकी हैं, जबकि देश में पुराने कानून के मुताबिक ही काम किया जा रहा था। केंद्र सरकार का दावा है कि वेतन संहिता 2019, औद्योगिक संबंध संहिता 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 और व्यावसायिक संहिता 2020 के दायरे में 40 करोड़ श्रमिक आएंगे। पहली बार गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को भी शामिल किया गया है। नियुक्ति पत्र देना अनिवार्य कर दिया गया है। ग्रेच्युटी की सीमा घटाकर एक वर्ष कर दी गई है। न्यूनतम वेतन का दायरा बढ़ाया गया है। सरकार का मानना है कि इससे रोजगार और औद्योगिक व्यवस्था में सुधार होगा। नए लेबर लॉ में समय पर वेतन देने का नियम है। सरकार ने तर्क है कि नए कानूनों से रोजगार की शर्तों की पारदर्शिता बढ़ेगी। देशभर में न्यूनतम वेतन लागू होगा। खास बात यह है कि हर पांच साल में कानूनों की समीक्षा की व्यवस्था की गई है। यानी, इसे संशोधित किया जा सकेगा। सरकार इसे आजादी के बाद मजदूरों के लिए सबसे बड़े प्रगतिशील सुधारों में से एक मान रही है।

    यह तो हो गया सरकार का दावा अब कुछ बातें नए श्रम कानून के विरोधियों की भी कर लेते हैं। कई मजदूर संगठनों ने इसे मजदूर विरोधी और उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने वाला बता रहे हैं। 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियन, किसान संगठन संयुक्त किसान मोर्चा और ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के सदस्यों के एक संयुक्त मंच ने 26 नवंबर को चार लेबर कोड के खिलाफ पूरे देश में प्रदर्शन किया। दरअसल, सरकार ने ‘कोड ऑन वेज’ यानी मजदूरी से जुड़ा कोड साल 2019 में ही संसद से पारित करा लिया था। इसके बाद साल 2020 में संसद के दोनों सदनों में तीन लेबर कोड को पारित किया गया। विरोध के कारण इसे लागू नहीं किया। लेकिन, केंद्र सरकार ने 21 नवंबर को कई ट्रेड यूनियन की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए चार लेबर कोड को नोटिफाई कर दिया। कई मजदूर संगठनों का मानना है कि नए लेबर कोड से कामगारों का शोषण बढ़ेगा और इसे पूंजीपतियों के दबाव में तैयार किया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को दिए गए ज्ञापन में मजदूर संगठनों के संयुक्त मंच ने कहा कि नए कानून हड़ताल करने के उनके अधिकार को खत्म करती हैं। इसके लागू होने के बाद यूनियन के रजिस्ट्रेशन में दिक्कत आएगी और यूनियनों की मान्यता रद्द करना आसान हो जाएगा। क्योंकि रजिस्ट्रारों को यूनियन का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की शक्ति मिल गई है। कोड में लेबर कोर्ट को बंद करके मजदूरों के लिए ट्रिब्यूनल बनाने का प्रावधान है। मजदूर संगठनों के मुताबिक इससे मजदूरों के न्याय पाने की प्रकिया बेहद मुश्किल हो जाएगी।

    45 दिनों में जारी होंगे नियम
    नई श्रम संहिताएं लागू होने के बाद इसके तहत नियम तय किए जाने हैं। इसके तहत अगले 45 दिनों में एक-एक कर दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। श्रम कानून केंद्र और राज्य का साझा मुद्दा है। इसलिए केंद्र और राज्यों को इसे लेकर नियम और कानून बनाने होंगे। पश्चिम बंगाल को छोड़कर ज्यादातर राज्य बीते कुछ वर्षों में श्रम कानूनों में बदलाव कर चुके हैं।

    नए श्रम कानून की खास बातें

    • अब सभी कर्मचारियों के लिए न्यूनतम मजदूरी तय की जाएगी। इसमें असंगठित क्षेत्र के मजदूर भी शामिल होंगे।
    • सरकार एक ‘स्टैच्यूटरी फ्लोर वेज’ यानी न्यूनतम मजदूरी की सीमा तय करेगी। यह सीमा लोगों के रहने के लिए जरूरी न्यूनतम खर्च के आधार पर तय होगी। राज्यों को अपनी न्यूनतम मजदूरी इस फ्लोर वेज से ऊपर ही रखनी होगी।
    • कामगारों में ईएसआईसी के तहत कवर और स्वास्थ्य लाभ देशभर में मिलेगा। जिन प्रतिष्ठानों में 10 से कम कर्मचारी होंगे, उनके पास भी इसे चुनने का विकल्प होगा, लेकिन खतरनाक कामों से प्रतिष्ठानों में इसे एक कर्मचारी होने पर भी अनिवार्य किया गया है।
    • फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों को भी अब ग्रेच्युटी मिलेगी। उन्हें पांच साल पूरे करने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा, बल्कि काम के हिसाब से प्रो-राटा आधार पर ग्रेच्युटी मिल जाएगी।
    • मजदूरी की परिभाषा को भी बदला गया है। अब इसमें बेसिक पे, महंगाई भत्ता और रिटेनिंग अलाउंस शामिल होंगे। खास बात यह है कि कुल कमाई का कम से कम 50% हिस्सा बेसिक पे होना चाहिए। इससे यह पक्का होगा कि कंपनियां सिर्फ भत्ते बढ़ाकर मजदूरों की कुल कमाई को ज्यादा न दिखाएं।
    • महिलाओं के लिए लैंगिक समानता पर जोर दिया गया है। अब समान काम के लिए भर्ती और सेवा शर्तों में लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। यानी महिला और पुरुष को एक जैसे काम के लिए बराबर वेतन मिलेगा।
    • सभी कर्मचारियों को समय पर तनख्वाह मिले, इसके लिए ‘यूनिवर्सल वेज पेमेंट कवरेज’ लाया गया है। यह उन सभी कर्मचारियों पर लागू होगा जो हर महीने 24,000 रुपये तक कमाते हैं।
    • ओवरटाइम करने पर अब मजदूरों को सामान्य मजदूरी से कम से कम दोगुना पैसा मिलेगा।
    • कंपनियों के लिए छंटनी, रिट्रेंचमेंट या बंद करने के लिए अब ज्यादा बड़े पैमाने पर मजदूरों को प्रभावित करना होगा। पहले जहां 100 मजदूरों पर मंजूरी लेनी पड़ती थी, अब यह सीमा बढ़ाकर 300 कर दी गई है। राज्य सरकारें चाहें तो इसे और भी बढ़ा सकती हैं।
    • वर्क-फ्रॉम-होम को अब सर्विस सेक्टर में बढ़ावा दिया जाएगा। इसमें कंपनी और कर्मचारी आपसी सहमति से काम करने के तरीके तय कर सकेंगे।
    • काम से जुड़े विवादों को जल्दी सुलझाने के लिए अब दो सदस्यों वाली ट्रिब्यूनल बनाई जाएगी। इससे फैसले जल्दी होंगे और काम रुकेगा नहीं।
    • गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स, जैसे कि डिलीवरी बॉय या कैब ड्राइवर, को भी अब सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलेगा। इसके लिए एग्रीगेटर्स को अपने टर्नओवर का 1-2% टैक्स देना होगा, जिससे इन वर्कर्स के लिए सोशल सिक्योरिटी स्कीम चलाई जाएंगी।
    • अब ‘इंस्पेक्टर-कम-फैसिलिटेटर’ सिस्टम लागू होगा। यानी अब इंस्पेक्शन रैंडम तरीके से और कंप्यूटर के जरिए होंगे। इससे अधिकारियों द्वारा परेशान करने की गुंजाइश कम होगी।
    • कंपाउंडिंग ऑफ ऑफेंसेस के तहत कुछ अपराधों के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने की बजाय सीधे जुर्माना भरकर मामला सुलझाया जा सकेगा। इससे अदालतों का बोझ कम होगा।
    • सभी तरह के लाइसेंस, रजिस्टर और रिटर्न फाइलिंग का काम अब ऑनलाइन हो जाएगा। इससे कंपनियों को बार-बार दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
    • अब वन लाइसेंस, वन रजिस्ट्रेशन का नियम होगा। यानी अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं होगी। सब कुछ एक जगह सेंट्रलाइज्ड होगा, जिससे कंपनियों का काम आसान होगा।
    • इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, ऑडियो-वीडियो कर्मियों को भी वर्किंग जर्नलिस्ट व सिने वर्कर की परिभाषा में शामिल किया गया। 500 से ज्यादा कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों में सुरक्षा समिति अनिवार्य।
    • मुख्य नियोक्ता को स्वास्थ्य लाभ और सामाजिक सुरक्षा देना अनिवार्य। निवारक स्वास्थ्य सेवा को बढ़ावा, सभी कर्मचारियों को फ्री वार्षिक स्वास्थ्य जांच।
    • सभी कर्मचारियों के लिए, यहां तक कि असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए भी, अब अपॉइंटमेंट लेटर लेना अनिवार्य होगा। इससे उनके काम और शर्तों का लिखित प्रमाण रहेगा।
    • अब महिलाओं को रात की शिफ्ट में काम करने की इजाजत मिल गई है। लेकिन इसके लिए उनकी सहमति और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम जरूरी होंगे।
    • फैक्ट्री के लिए थ्रेशोल्ड बढ़ा दिया गया है। पावर वाले मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के लिए यह 10 से बढ़ाकर 20 वर्कर और बिना पावर वाले यूनिट्स के लिए 20 से बढ़ाकर 40 वर्कर कर दिया गया है।
    • काम के घंटे हफ्ते में 48 घंटे ही रहेंगे। हालांकि, रोज के काम के घंटे बढ़ाए जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए ओवरटाइम का भुगतान दोगुनी दर से करना होगा।
    • इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों, डबिंग आर्टिस्ट और स्टंट पर्सन समेत डिजिटल, ऑडियो-विजुअल कामगारों को इन कानूनों का लाभ मिलेगा।

    जानिए, बदलाव कितने अहम!

    भूमिगत खनन और भारी मशीनरी उद्योगों में भी काम कर सकेंगी महिलाएं : महिलाओं को भूमिगत खनन और भारी मशीनरी जैसे उद्योगों में काम करने की इजाजत भी शामिल है। इसके लिए उनकी अनुमति जरूरी है। इस कदम से सभी के लिए रोजगार के समान अवसर सुनिश्चित होंगे। हर कार्यस्थल पर सुरक्षा निगरानी के लिए जरूरी सुरक्षा समिति और खतरनाक रसायनों की सुरक्षित देखरेख सुनिश्चित करना जरूरी होगा। शिकायत निवारण समितियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया। महिला कर्मचारियों के परिवार परिभाषा में सास-ससुर को जोड़ने का प्रावधान, डिपेंडेंट कवरेज को बढ़ाना और समावेशिता को पक्का करना भी शामिल है।

    ईएसआईसी कवरेज का दायरा बढ़ा : आधार-लिंक्ड यूनिवर्सल अकाउंट नंबर से लाभ आसानी से हासिल होंगे। प्रवास संबंधी किसी बाधा के बिना सभी राज्यों में लाभ मिलेंगे। अनुबंध कर्मचारी को रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। ऐसे कर्मी एक साल की लगातार सेवा के बाद ग्रेच्युटी के हकदार होंगे। स्वास्थ्य लाभ और सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलेगा।

    सामाजिक सुरक्षा में देना होगा योगदान : स्वीगी, अर्बन कंपनी, उबर, जमैटो जैसे एग्रीगेटर्स को सालाना टर्नओवर का 1-2 फीसदी सामाजिक सुरक्षा योगदान के रूप में देना होगा, यह 5 फीसदी तक होगा। अनिवार्य नियुक्ति पत्र में कर्मचारी का पदनाम, वेतन और सामाजिक सुरक्षा के अधिकार स्पष्ट लिखने होंगे। श्रम कानूनों में पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को परिभाषित किया है। एकल खिड़की पंजीकरण, लाइसेंस व रिटर्न, कई ओवरलैपिंग फाइलिंग की जगह लेंगे। राष्ट्रीय व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य (ओएसएच) बोर्ड सभी क्षेत्रों में समान सुरक्षा व सेहत संबंधी मानदंड तय करेगा। 500 से अधिक कामगारों के कार्यस्थल पर सुरक्षा समितियां होंगी, जिससे जवाबदेही बेहतर होगी।

    कार्रवाई के बजाय जागरूकता : नई संहिताओं में सजा देने वाली कार्रवाई के बजाय दिशा-निर्देश, जागरूकता व अनुपालन पर जोर है। अनुमान-योग्य विवाद का शीघ्र समाधान किया जा सकेगा। इसके लिए दो सदस्यों वाले औद्योगिक ट्रिब्यूनल होंगे और सुलह के बाद सीधे ट्रिब्यूनल में जाने का विकल्प होगा।

    खतरनाक उद्योगों में यदि एक भी श्रमिक, तो ईपीएफओ के दायरे में
    अब काम के घंटों से लेकर वेतन तक के नियम हैं। इससे उद्यमों पर अनुपालन का बोझ होगा। सामाजिक सुरक्षा का विस्तार होगा। खतरनाक उद्योगों में एक भी श्रमिक काम करता है, तो ईपीएफओ के दायरे में आएगा। पहले की तरह 10 श्रमिकों की अनिवार्यता नए कानून में नहीं है।

    फिक्स टर्म वाले कर्मचारियों को लाभ
    निश्चित अवधि वाले कर्मचारियों को भी स्थायी कर्मियों की तरह सामाजिक सुरक्षा कवर, चिकित्सा, सवेतन अवकाश, ग्रेच्युटी की पात्रता पांच साल के बजाय एक साल में मिलेगी। काम के घंटे 8 से 12 होंगे। ओवरटाइम में दोगुना वेतन और अधिक घंटों के लिए लिखित सहमति जरूरी।

    कंपनियों के लिए छंटनी आसान
    नए लेबर कोड ने कंपनियों की राह भी आसान कर दी है। अब उन्हें छंटनी करने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी होगी। नियोक्ताओं को कई सहूलियतें दी गई हैं। साथ ही, कामगारों से ज्यादा घंटे काम कराया जा सकेगा। फैक्ट्रियों में श्रम कानून लागू होने का लिए कामगारों की सीमा को बढ़ाया गया है, जिससे छोटे उद्यमों के लिए नियामकीय बोझ कम होगा। नई संहिताओं में किसी कंपनी को बंद करने और कर्मचारियों की छंटनी के लिए सरकारी मंजूरी की न्यूनतम सीमा को बढ़ा दिया गया है। अब तक 100 या उससे अधिक कामगारों वाली कंपनी को इस तरह का कदम उठाने से पहले सरकार की मंजूरी लेनी अनिवार्य थी, लेकिन नई संहिताओं में इस सीमा को बढ़ाकर 300 कामगार कर दिया गया है। साथ ही, फैक्टरी में काम के घंटों को 9 से बढ़ाकर 12 किया गया है, जबकि दुकानों और अन्य प्रतिष्ठानों में कामगार मौजूदा नौ की बजाय दस घंटे काम कर सकेंगे।

    नए श्रम कानून से पैदा होंगी 77 लाख नौकरियांः एसबीआई
    श्रम कानून लागू होने के बाद एसबीआई की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इससे 77 लाख नए रोजगार सृजित होंगे। रिपोर्ट ने यह भी जोर देकर कहा कि चारों लेबर कोड लागू होने से मजदूरों और उद्योगों दोनों को मजबूत आधार मिलेगा। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नए लेबर कोड से बेरोजगारी में 1.3 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। यह आकलन 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के व्यक्तियों की वर्तमान श्रम बल भागीदारी दर 60.1 प्रतिशत व ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में औसत कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या 70.7 प्रतिशत पर आधारित है।
    रिपोर्ट के अनुसार, नए लेबर कोड्स के कार्यान्वयन से श्रम बल में स्थायी कर्मियों की हिस्सेदारी कम से कम 15 प्रतिशत बढ़ जाएगी। इससे कुल औपचारिक श्रमिकों की हिस्सेदारी वर्तमान अनुमानित हिस्सेदारी 60.4 प्रतिशत से बढ़कर 75.5 प्रतिशत हो जाएगी, जैसा कि पीएलएफएस डेटा में बताया गया है।
    एसबीआई ने बताया कि भारत में लगभग 44 करोड़ लोग वर्तमान में असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इनमें से लगभग 31 करोड़ श्रमिक ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत हैं। अगर इनमें से 20 प्रतिशत श्रमिक अनौपचारिक वेतन-सूची से औपचारिक वेतन-सूची में जाते हैं, तो लगभग 10 करोड़ व्यक्तियों को नौकरी की बेहतर सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और औपचारिक रोजगार से जुड़ी सुविधाओं का प्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है। इस बदलाव से अगले दो से तीन वर्षों में भारत का सामाजिक सुरक्षा कवरेज 80-85 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है।

    कर्मचारियों के टेक होम वेतन पर पड़ेगा असर

    मजदूरी की नई परिभाषा के अनुसार, भत्ते कुल मुआवजे के 50 प्रतिशत तक सीमित होंगे। इसका मतलब है कि मूल वेतन बढ़ेगा, जिससे भविष्य निधि (पीएफ) और ग्रेच्युटी अंशदान में वृद्धि होगी। टेक-होम वेतन में थोड़ी कमी आ सकती है, लेकिन सेवानिवृत्ति लाभों में वृद्धि होगी। वर्तमान समय में अधिकतर नियोक्ता सैलरी तो लाखों में दे देते हैं। लेकिन, मूल वेतन कम रखते हैं। कई तरह के भत्ते देते हैं।

    वेतन की परिभाषा में बड़ा बदलाव

    कोड्स में शामिल ‘वेजेज’ की नई परिभाषा को एक बड़ा बदलाव बताया है। नई परिभाषा के तहत वेतन के सभी मौद्रिक घटक शामिल होंगे, जबकि कन्वेंस, एचआरए, बोनस और ओवरटाइम जैसे तत्व एक्सक्लूजन कैटेगरी में रहेंगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि एक्सक्लूजन कुल वेतन के 50% से अधिक नहीं हो सकते। इसका सीधा मतलब है कि बेसिक वेज कुल सैलरी का कम से कम आधा हिस्सा होना चाहिए।

    विरोध करने वाले कर्मचारी संगठनों के तर्क
    कंपनियों को मनमानी की छूट :  पहले 100 से ज्यादा कर्मचारियों वाली कंपनियों को बंद करने या छंटनी के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। अब ये संख्या 300 कर दी गई है। यानी 1 से 299 कर्मचारियों वाली कंपनियों पर ताला लगाने के लिए कोई अनुमति नहीं लेनी होगी। ये कंपनियां अपने कर्मचारियों की संख्या में बदलाव के लिए भी पूरी तरह से स्वतंत्र होंगी।

    विरोध की आजादी पर रोक : मजदूर संगठन सीटू के बिहार उपाध्यक्ष अरुण मिश्रा कहते हैं कि पहले जरूरी काम में लगे कर्मचारियों को हड़ताल के लिए 15 दिन पहले नोटिस देना होता था और फिर वे हड़ताल पर जाते थे। अब सभी तरह के कर्मचारियों को हड़ताल करने से पहले 60 दिन का नोटिस देना होगा। उन्होंने बताया कि नए लेबर कोड के तहत अब जिन यूनियनों के पास किसी फैक्ट्री में काम कर रहे 51 फीसदी मजदूरों का समर्थन होगा सरकार सिर्फ उसी यूनियन को मान्यता देगी। दूसरी किसी यूनियन से वो किसी तरह की बातचीत नहीं करेगी। जिन औद्योगिक प्रतिष्ठानों (फैक्ट्री) में किसी यूनियन को 51 फीसदी वोट नहीं मिलते तो श्रमिकों की बात रखने के लिए सरकार ट्रेड यूनियंस की नेगोसिएटिंग काउंसिल बनाएगी। इसमें सरकार अपनी मनमानी करेगी और अपने पसंद की यूनियनों को जगह देगी।

    स्थायी नौकरी को फिक्स्ड टर्म नौकरी से रिप्लेस करने की साजिश : निश्चित अवधि (फिक्सड टर्म) के लिए काम कर रहे कर्मचारियों के लिए नए लेबर कोड में नियमित कर्मचारियों के समान सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान किया गया है। नी उनको भी प्रोविडेंट फंड (पीएफ) और मेडिकल जैसी सुविधाएं मिलेंगी। मजदूर संगठनों की आपत्ति है कि सरकार इस प्रावधान के बहाने स्थायी नौकरी को खत्म करना चाहती है।

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