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    Home»एडीटर स्पेशल»किताब कौथिग … जगा रहा रचनात्मकता और साहित्य की अलख
    एडीटर स्पेशल

    किताब कौथिग … जगा रहा रचनात्मकता और साहित्य की अलख

    किताब कौथिग सिर्फ किताबों का मेला नहीं है, ये साहित्य, संस्कृति, शिक्षा और स्थानीय पर्यटन का उत्सव है। यह किताबों के साथ-साथ स्थानीय लोगों, खासतौर से बच्चों को हस्तशिल्प, लोकसंगीत, खगोलशास्त्र, विज्ञान-गणित के खेल, प्रकृति भ्रमण, करियर काउंसलिंग जैसे बहुआयामी जानकारियों से जुड़ने का मौका देता है।
    teerandajBy teerandajApril 1, 2025Updated:April 2, 2025No Comments
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    पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के दूरस्थ इलाकों में इंटरनेट और अन्य संसाधनों की सीमित पहुंच के कारण यहां के बच्चे अब भी किताबों और न्यूज पेपर की नजर से ही दुनिया को देख-समझ रहे हैं। दुनियाभर में इंटरनेट और सोशल मीडिया केबढ़ते प्रभाव से समाचारपत्र, पत्रिकाएं और पुस्तक पढ़ने की आदत काफी हद तक कम हो गई है लेकिन हिमालय की तलहटी में बसे छोटे शहरों और कस्बों में ‘किताब कौथिग अभियान’ किताबों को वापस लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने का काम शानदार तरीके से कर रहा है। 2 साल से भी कम समय में उत्तराखंड के ऐतिहासिक शहरों में 12 सफल पुस्तक मेले आयोजित हो चुके हैं, इसने रचनात्मकता और साहित्य की एक नई अलख जगाने का काम किया है, जनसहयोग के कारण यह अभियान लगातार आगे बढ़ रहा है।

    सन 2004 में, दिल्ली में कुछ उत्साही युवाओं ने ‘क्रिएटिव उत्तराखंड – म्योर पहाड़’ नाम का संगठन बनाया और विभिन्न क्षेत्र में अर्जित अनुभवों का फायदा उत्तराखंड तक पहुंचाने का लक्ष्य बनाया। इसी टीम ने कोरोना काल में पहाड़ के लोगों को जोड़ने के लिए हमने ‘म्योर पहाड़, मेरि पछ्यांण’ नाम से एक ऑनलाइन इंटरव्यू कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्यक्रम से एक विचार निकला कि पहाड़ के बच्चों के लिए कुछ ऑन ग्राउंड काम करने की जरूरत है। यहीं से ‘किताब कौथिग अभियान’ की शुरुआत हुई।

    दिसंबर 2022 में टनकपुर में पहला किताब कौतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रसिद्ध साहित्यकार और प्रकाशकों की उपस्थिति के बीच इस छोटे से कस्बे के हजारों लोगों ने उत्साहपूर्वक शिरकत की। उत्तराखंड के लोगों को ‘किताब कौथिग’ का विचार बहुत पसंद आया। टनकपुर के बाद बैजनाथ, चंपावत, पिथौरागढ़, द्वाराहाट, भीमताल, नानकमत्ता, हल्द्वानी, रानीखेत, नई टिहरी और पंतनगर में यह आयोजन हो चुका है। ‘किताब कौथिग’ करने के लिए ऐसे छोटे और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण शहरों को चुना जाता है जो अक्सर हमारी नजर में नहीं आ पाते। इस अभियान का उद्देश्य उत्तराखंड के लोगों को साहित्य के साथ साथ इन शहरों के इतिहास, संस्कृति और पर्यटन से जोड़ना है। इन आयोजनों की सफलता बेची गई किताबों की संख्या से नहीं, बल्कि बच्चों, अभिवावकों और अतिथियों से मिली सकारात्मक प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट होती है।

    ‘किताबें इंसान की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं।’ वे हमारी ऐसी साथी हैं जो ज्ञान देती हैं और मनोरंजन भी करती हैं। किताब कौथिग साहित्य, रचनात्मकता और हमारी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को उत्तराखंड के दूरस्थ इलाकों तक ले जाने की सोच है। ‘पढ़ने लिखने की संस्कृति’ को समाज के बीच बढ़ाने की पहल है – किताब कौथिग। इसका लक्ष्य ऐसा माहौल बनाना है जहां हर उम्र के लोग साहित्यिक चर्चाओं में शामिल होकर लेखकों से मिलते हैं, कार्यशालाओं में भाग लेकर कुछ नया सीखते हैं। विज्ञान, खगोलशास्त्र और नेचर वॉक का हिस्सा बनकर प्रकृति को समझमें नई दृष्टि विकसित होती है। इस अभियान के माध्यम से दुर्गम गांव के लोगों तक ड्रोन टेक्नोलॉजी, 3डी प्रिटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक चीजों को जोड़ा जा रहा है। किताब कौथिग एक ऐसा मंच है, जहां विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी विशेषज्ञों से जुड़कर नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी के अनुभवों को सीखने-समझने का मौका मिलता है।

    किताब कौथिग में किताबों के अलावा भी बहुत कुछ है – यह रचनात्मकता के अवसर पैदा करने का एक शक्तिशाली मंच बन चुका है। छोटे शहरों के बच्चों को विज्ञान, कला, साहित्य और प्रकृति जैसे विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञों को करियर काउंसिलिंग से जोड़कर, उन्हें संभावनाओं की दुनिया से परिचित कराता है। स्वरोजगार, खेल, विज्ञान, लेखन, पत्रकारिता, समाज सेवा के जानकार युवा पीढ़ी से संवाद करते हैं। दूरस्थ इलाकों के बच्चों के भविष्य को आकार देने में यह जानकारियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    यह मेला छोटे-छोटे बच्चों को किताबें पढ़ने के साथ-साथ खुद की किताबें लिखने को भी प्रेरित कर रहा है। 5 दिन की बाल लेखन कार्यशाला के माध्यम से हर किताब कौथिग से पहले उदय किरौला से सीखकर शहर के अलग-अलग स्कूलों के बच्चे लगभग 20 पेज की हस्तलिखित किताब , बाल कवि सम्मेलन और नुक्कड़ नाटक तैयार करते हैं और इनका प्रदर्शन किताब कौथिग में किया जाता है। दुनियाभर के प्रसिद्ध लेखकों की हजारों किताबों के बीच अपने शहर के छोटे छोटे बच्चों की हस्तलिखित किताबों को देखकर अभिवावकों को और नागरिकों को कितनी ख़ुशी होती होगी। नाटक और कविता -कहानी, चित्र से सजी, अपनी खुद की किताब लिखने से बच्चों को अपने मन के विचारों को अभिव्यक्त करने का अवसर मिलता है, और इससे पैदा होने वाला आत्मविश्वास उनको जिंदगीभर काम आता है।
    इसके अलावा किताब कौथिग इन दूरस्थ इलाकों में अंगदान जागरूकता, प्रकृति संरक्षण, स्थानीय भाषा और वैज्ञानिक सोच जैसे सामाजिक मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की कोशिश भी करता है।

    यह भी पढ़ें :  जायका पहाड़ का… भांग की चटनी

    टीम किताब कौथिग अभियान के अंतर्गत चंपावत और पिथौरागढ़ जिले के सरकारी स्कूलों के बच्चों से उनके लेख, कविताएं, संस्मरण, चित्र आदि एकत्र करके ‘न्यौली कलम’ के नाम से दो किताबें प्रकाशित की गई और ये किताब हर उस बच्चे को दी गई, जिसकी रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। दुर्गम इलाके के गांव में रहने वाले सरकारी स्कूल के बच्चों में अदभुद लेखन प्रतिभा है। छोटी उम्र में अपनी रचनाएं किताब में छपी देखकर इन बच्चों की लेखन प्रतिभा को जरूर एक व्यापक सोच मिली और हम उम्मीद करते हैं कि इन सैकड़ों बच्चों में से भविष्य में हमको कुछ शानदार लेखक देखने को मिलेंगे।

    हस्तशिल्प, गायन, लेखन और स्वरोजगार से जुड़ी कई छुपी हुई प्रतिभाओं को किताब कौतिक अभियान मंच के माध्यम से एक बड़ा प्लेटफॉर्म मिला है। युवा पीढ़ी के कई उभरते हुए कलाकार इस अभियान से जुड़कर अनुभव प्राप्त कर रहे हैं। किताब कौथिग व्यापक पहुंच वाला एक साहित्यिक आंदोलन बन गया है और इसका प्रभाव उत्तराखंड के बाहर भी फैल रहा है। इसकी चर्चा अब पूरे देश में होने लगी है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2024 में डायरेक्टर्स मीट में किताब कौथिग के अनुभवों पर बात की गई, जिसमें 13 अलग-अलग देशों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। इस मीट में शामिल विदेशी प्रतिनिधियों ने भी किताब कौथिग को एक अनूठी पहल बताया और जेएलएफ आयोजक मंडल द्वारा इस विचार की विशेष सराहना की गई। अब नेपाल और देश के कई राज्यों के लोग इस मॉडल से प्रेरित होकर अपने इलाके में इसी तरह के किताबों के मेले आयोजित करने में रुचि दिखा रहे हैं। उत्तराखंड में यह अभियान अब पुस्तक आंदोलन का आकार ले रहा है, और उम्मीद है कि यह इसी तरह आगे बढ़ता रहेगा। साहित्य के माध्यम से बहुमुखी रचनात्मकता को आगे बढ़ाने के छोटे विचार से शुरु हुआ यह अभियान अब पूरे देश में चर्चित हो चुका है।

    यह भी पढ़ें :  हर रोज मर रही कोई न कोई बोली!

    इंटरनेट और तकनीक के इस दौर में जब हमारी दिनचर्या गैजट्स पर निर्भर हो गई है, किताब कौथिग अभियान दूरस्थ इलाकों में मल्टी डायरेक्शनल अप्रोच से सीखने और सिखाने का काम कर रहा है। खासतौर से बच्चों तक पहुंचकर उनको दुनिया की नई जानकारियों से जोड़ रहा है। यह न केवल स्कूलों में, घरों में, बल्कि अब लोगों के दिलों तक जगह बना चुका है। किताब कौतिक दूरस्थ इल के लोगों को उनकी क्षमताओं को निखारने औरसशक्त बनकर भविष्य में सामाजिक योगदान देने के लिए प्रेरित कर रहा है। यह लंबी यात्रा की शुरुआत भर है। किताब कौतिक अभियान लगातार आगे बढ़ रहा है, नए कस्बों और शहरों तक पहुंच रहा है। इस शानदार पहल को आगे बढ़ाने के लिए हम आपके समर्थन और सहयोग की उम्मीद करते हैं।

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