समुद्र तल से करीब 2100 मीटर ऊंचाई पर पहुंचने के बाद Maa Kalinka Dham के दर्शन होते हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए गढ़वाल और कुमाऊं से कई रास्ते हैं। गढ़वाल के विकासखंड बीरोंखाल और अल्मोड़ा जिले के स्याल्दे विकासखंड की सीमाओं के बीचों-बीचे ऊंचे पहाड़ की चोटी पर स्थित मंदिर का इतिहास 18वीं शताब्दी का है।
गढ़वाल के आठ व कुमाऊं के सात गांवों में बसे बडियार परिवार के वंशज मां कालिंका की पूजा करते हैं। आसपास के क्षेत्रों के अलावा देश के अलग-अलग राज्यों से भी बहुत से लोग मां के दर्शन के लिए आते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से जो भी मन्नत मांगी जाती है मां उसे पूरी करती हैं। पिछले कुछ वर्षों में मंदिर को आधुनिक रूप दे दिया गया है। दुर्गम चोटियों पर होने के बाद भी श्रद्धालुओं को काफी सुविधाएं मिल जाती हैं।

अद्भुत मेला… कालिंका जटाडा
मंदिर ट्रस्ट के सदस्य कैप्टन मनबार सिंह रावत बताते हैं कि इस मंदिर के प्रति लोगों की अपार श्रद्धा है। मां काली स्थानीय लोगों के बीच बहुत पूजनीय हैं। तीन वर्ष में यहां एक विशाल मेला लगाया जाता है इसे स्थानीय भाषा में कालिंका जटाडा कहते हैं। इसमें हजारों लोग शामिल होते हैं। मेले से पहले एक गढ़वाल के 14 दिवसीय यात्रा निकाली जाती है। इसमें आसपास के लोग शामिल होते हैं। यह हमारे लिए विशेष महत्व की होती है। वी काली स्थानीय लोगों के बीच बहुत पूजनीय हैं और यह मंदिर सामाजिक कार्यक्रमों और धार्मिक त्योहारों के दौरान एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। एक मेला, जिसे स्थानीय रूप से कालिंका जटोडा के नाम से जाना जाता है, सर्दियों में यहां आयोजित किया जाता है जो हजारों स्थानीय लोगों और बाहरी लोगों को आकर्षित करता है। मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां मां काली खुद आपकी मनोकामना बतातीं हैं। साथ ही मौके पर उसका समाधान भी करती हैं।

पूज्य बूबा जी ने बनवाया था मंदिर
कैप्टन मंदिर के इतिहास पर बात करते हुए बताते हैं, हमारे बडियारी वंशज के पूर्वज लैली थे। हमारा ठिकाना गढ़वाल के प्रसिद्ध बावन बढ़ में था। पूज्य बूबा जी का जन्म 17वीं शताब्दी में हुआ था। 18वीं शताब्दी की शुरुआत में नेपाल की गोरखा सेना ने गढ़वाल पर आक्रमण कर अपना राज्य स्थापित कर लिया था। गोरखा सेना की क्रूरता और अत्याचारों से तंग आकर लोग उनसे लड़ते-बचते अपने गांवों को छोड़कर जंगल की गुफाओं में विस्थापित हो गए। माना जाता है कि एक दिन मां काली ने स्वप्न में दर्शन दे कर किसी उच्च स्थान पर मंदिर बनाने की प्रेरणा दी। तब बूबा जी ने मंदिर बनाया। कैप्टन के मुताबिक, अंग्रेजों का शासन आने के बाद मां की प्रेरणा से मंदिर के स्थान में परिवर्तन हुआ है।
दर्शन संग सैर सपाटा भी
चूंकि, मां कालिंका ऐसी जगह विराजी हैं जहां, प्राकृतिक सौंदर्य हर किसी को मनमोहित कर देता है। यही वजह है कि दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की यात्रा किसी एडवेंचर से कम नहीं होती। मंदिर से हिमालय की चोटियों का नजारा अद्भुत दिखाई देता है। यहां से उत्तर-पूर्वी गढ़वाली चोटियां, हाथी-घोड़ी चोटियां, केदारनाथ चोटी, चौखंभके मुकुट के आकार की चोटी, कामेट पर्वत, मध्य गढ़वाल की हिमालय की चोटियां, द्रोणागिरि पार्वती, नंदा घुटी, मृगथुनी, त्रिशूल, पंचचूली पर्वत और पश्चिमी नेपाल में स्थित जेठी बहुरानी चोटी दिखाई देती है। यहां का मौसम ऐसा है कि कभी भी बर्फबारी होने लगती है। रात का तापमान शून्य से नीचे भी पहुंच जाता है। तमाम युवा यहां के नजदीकी गांवों से पैदल ट्रैक कर मंदिर पहुंचते हैं। कुल मिलाकर यह पर्यटन के नजरिये से भी यह क्षेत्र आकर्षित करने वाला है।








