महाराष्ट्र निकाय चुनाव : महाराष्ट्र की 29 महानगरपालिकाओं में से 23 पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके सहयोगियों ने जीत का परचम लहराया है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में भाजपा का करीब 45 साल पुराना सपना साकार होने जा रहा है। मुंबई नगर निगम (बीएमसी) पिछले तीन दशकों से अधिक समय से ठाकरे परिवार और शिवसेना का अभेद्य किला रहा है। हालांकि, इस बार के नतीजों ने ठाकरे की बादशाहत को खत्म कर दिया है। 227 सदस्यीय सदन में भाजपा-शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) गठबंधन ने बहुमत का जादुई आंकड़ा 114 पार कर लिया है। खबर के अनुसार, भाजपा बीएमसी में 87 सीटें हासिल कर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। वहीं उनके सहयोगी दल शिवसेना (शिंदे) को 27 सीटें मिली हैं। दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) को 67 सीटों पर संतोष करना पड़ा है। इस चुनाव में चचेरे भाइयों, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के एक साथ आने की अटकलों और प्रयासों का भी कोई विशेष लाभ मिलता नहीं दिखा। राज ठाकरे की पार्टी मनसे (MNS) मात्र 10 सीटों पर सिमट गई।
पूरे महाराष्ट्र की बात करें तो 29 में से 23 महानगरपालिकाओं में भाजपा ने निर्णायक बढ़त बनाई है। पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ में भाजपा ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (पवार परिवार) के गढ़ को ढहा दिया है। दशकों से इन क्षेत्रों में पवार परिवार का दबदबा था जिसे इस बार भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने मात दी है। नासिक और ठाणे में भी भाजपा और शिंदे गुट के गठबंधन को बड़ी सफलता मिली है।

कांग्रेस का प्रदर्शन
कांग्रेस को लातूर, चंद्रपुर और भिवंडी-निजामपुर में थोड़ी राहत मिली है। लातूर में कांग्रेस ने 70 सदस्यीय निकाय में 43 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। वहीं, भिवंडी-निजामपुर में कांग्रेस 30 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी है।
क्यों खास है यह जीत
यह जीत भाजपा के लिए एक मनोवैज्ञानिक बढ़त भी है। मुंबई में पहली बार भाजपा का महापौर बनना राज्य की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है। बीएमसी का बजट कई छोटे राज्यों के बजट से भी अधिक होता है ऐसे में यहां का नियंत्रण भाजपा के लिए सत्ता के विकेंद्रीकरण जैसा है। चुनाव परिणामों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि विपक्षी एकता (महाविकास अघाड़ी के विभिन्न गुटों) के बावजूद भाजपा का सुशासन कार्ड जनता के बीच प्रभावी रहा। पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ जैसे इलाकों में शरद पवार और अजीत पवार के संयुक्त प्रभाव को कम करना भाजपा की संगठनात्मक शक्ति को दर्शाता है।

जीत के पांच बड़े कारण
डबल इंजन और सुशासन का नैरेटिव : भाजपा डबल इंजन के फायदे के नैरेटिव को जनता को समझाने में सफल रहा। केंद्र और राज्य में एक ही गठबंधन की सरकार होने का लाभ मतदाताओं को आकर्षित करने में सफल रहा। मुंबई के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (जैसे मेट्रो और कोस्टल रोड) का श्रेय भाजपा ने बखूबी भुनाया।
हिंदुत्व के वोट बैंक का ध्रुवीकरण : उद्धव ठाकरे द्वारा कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन करने के बाद पारंपरिक हिंदुत्ववादी मतदाता दुविधा में था। एकनाथ शिंदे और भाजपा ने इस मुद्दे को अपना हथियार बनाया। नतीजों से स्पष्ट है कि शिवसेना का पारंपरिक कोर-वोटर अब शिंदे-भाजपा गठबंधन को असली हिंदुत्व का वाहक मान रहा है।
ठाकरे परिवार की आंतरिक फूट : राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे का अलग-अलग लड़ना और शिवसेना के दो फाड़ होने का सीधा फायदा भाजपा को मिला। वोटों के बिखराव ने भाजपा को कई सीटों पर कम अंतर से जीत दिला दी, जहां पहले अविभाजित शिवसेना का एकतरफा राज होता था।
शहरी मतदाताओं की बदलती प्राथमिकताएं : मुंबई, पुणे और नासिक जैसे शहरों का मतदाता अब पहचान की राजनीति के बजाय विकास और नागरिक सुविधाओं को प्राथमिकता दे रहा है। बीएमसी में भ्रष्टाचार के आरोपों और जलजमाव जैसी समस्याओं ने उद्धव गुट के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर पैदा की।
मोदी मैजिक का बरकरार रहना : निकाय चुनाव होने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी की छवि ने निर्णायक भूमिका निभाई। भाजपा ने स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय विजन से जोड़कर पेश किया, जिससे युवा और मध्यम वर्ग का वोट बड़े पैमाने पर उनकी झोली में गिरा।








