सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा के बाद अरावली पर्वत शृंखला का मामला पूरे देश में बहस का मुद्दा बन गया। पर्यावरण प्रेमी इस मामले को लेकर आक्रामक हैं। युवा से लेकर बुजुर्ग तक सभी लोग सुप्रीम कोर्ट की ओर से परिभाषा तय किए जाने के बाद चिंतित हैं। दरअसल, शीर्ष अदालत ने अरावली पहाड़ियों के लिए एकसमान कानूनी परिभाषा को मंजूरी दे दी, जिसके तहत किसी भी पहाड़ी को तब ही अरावली माना जाएगा जब उसकी ऊंचाई आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर हो और उसे वैज्ञानिक सर्वेक्षण के आधार पर नक्शों में चिह्नित किया गया हो। अदालत का तर्क है कि अभी तक अलग‑अलग राज्यों में अलग मानक होने से न तो संरक्षण ठीक से हो पा रहा था और न ही खनन नियम पारदर्शी थे, इसलिए पूरे क्षेत्र के लिए एक स्पष्ट और समान परिभाषा जरूरी थी।
लोगों के आक्रोश को देखते हुए केंद्र सरकार ने बुधवार को साफ कर दिया है कि अब पूरे अरावली पर्वत शृंखला क्षेत्र में किसी भी तरह की नई खनन गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाएगी और पहले से जारी अधिकतर पट्टे भी निरस्त किए जाएंगे। सरकार का तर्क है कि यह कदम न केवल अवैध खनन पर शिकंजा कसने के लिए जरूरी है, बल्कि जलस्रोतों की रक्षा, हवा की गुणवत्ता सुधारने और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे को नियंत्रित करने के लिए भी अनिवार्य हो गया था।
जारी आदेश में कहा गया है कि प्रतिबंध पूरे अरावली भूभाग पर समान रूप से लागू होगा और राज्यों की सरकारों को अपने-अपने राजस्व एवं वन रिकॉर्ड में इस सीमा को चिह्नित करने का निर्देश दिया गया है। पर्वतमाला की सुरक्षा के लिए यह भी तय किया गया है कि भविष्य में किसी सड़क, इमारत या औद्योगिक परियोजना की स्वीकृति से पहले यह देखा जाएगा कि वह क्षेत्र ‘नो माइनिंग जोन’ या संरक्षित क्षेत्र की श्रेणी में तो नहीं आता। अभी तक सिर्फ चुनिंदा इलाकों को ही संरक्षित मानकर खनन रोका जाता था, जिसके चलते खनन माफिया ने सीमा की तकनीकी व्याख्या का फायदा उठाकर हजारों हेक्टेयर में खनन जारी रखा। अब पूरे अरावली पट्टी को एक इकाई मानकर संरक्षण की योजना बनाई जा रही है, जिससे कानून लागू करना आसान होगा और जिम्मेदारी तय की जा सकेगी।

केंद्र ने इस काम के लिए भारतीय वन सर्वेक्षण और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण जैसी संस्थाओं को मिलकर विस्तृत मानचित्र तैयार करने की जिम्मेदारी दी है, जो उन सभी पहाड़ी, झाड़ीदार और पथरीले क्षेत्रों की पहचान करेंगे जहां खनन पर तत्काल रोक लगेगी। इन मानचित्रों के आधार पर राज्यों को अपनी खनिज नीति में संशोधन करना होगा और विवादित पट्टों को रद्द करने के साथ-साथ पुनर्वास एवं मुआवजा योजना भी बनानी होगी। पर्यावरण मंत्रालय का कहना है कि अरावली क्षेत्र में अंधाधुंध खनन के कारण भूजल स्तर लगातार गिरा है, कई नदियों के स्रोत सूख गए हैं और दिल्ली–एनसीआर तथा आसपास के इलाकों में धूल कणों की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक अरावली, थार रेगिस्तान और उत्तर भारत के मैदानी हिस्से के बीच प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती है; यदि यह कड़ी कमजोर होती है तो रेतीली आंधियां और चरम मौसम पूरे मैदान को अधिक प्रभावित करेंगे।
इस निर्णय के साथ ही संरक्षित क्षेत्र की परिभाषा भी व्यापक रूप से बदली जा रही है। अभी तक 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को कई बार ‘हिल’ की औपचारिक परिभाषा से बाहर कर दिया जाता था, जिससे डेवलपर्स और खनन कंपनियां उन्हें समतल भूमि बताकर उपयोग कर लेती थीं। पर्यावरणविदों ने इस प्रावधान का कड़ा विरोध किया और दलील दी कि जैव विविधता के लिहाज से छोटी पहाड़ियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वही स्थानीय नालों, तालाबों और जंगलों की रीढ़ होती हैं। अब सरकार ने संकेत दिए हैं कि संरक्षित क्षेत्र तय करते वक्त सिर्फ ऊंचाई नहीं, बल्कि ढाल, वनस्पति, जलस्रोत और वन्यजीव आवास को भी मानदंड बनाया जाएगा। इससे उन तमाम छोटी–बड़ी टेकड़ियों को भी सुरक्षा कवच मिलेगा, जो अब तक कागजों में पहाड़ी ही नहीं मानी जाती थीं।
हालांकि खनन पट्टों की निरस्ती से खनिज आधारित उद्योगों और स्थानीय रोजगार पर असर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है। राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली के सीमावर्ती जिलों में बड़ी संख्या में लोग पत्थर खदानों, क्रशर प्लांटों और उनसे जुड़े परिवहन कार्यों पर निर्भर हैं। खनन कंपनियों का कहना है कि अचानक प्रतिबंध से निर्माण उद्योग के लिए पत्थर और बजरी की आपूर्ति बाधित होगी, जिससे लागत बढ़ेगी और अवैध खनन को बढ़ावा मिल सकता है। जवाब में सरकार का तर्क है कि कानून लागू करने की कड़ाई के साथ-साथ पर्यावरण मानकों का पालन करने वाली वैकल्पिक खदानों और पुनर्चक्रित निर्माण सामग्री को बढ़ावा दिया जाएगा।

पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि नया ढांचा ईमानदारी से लागू किया गया तो यह फैसला उत्तरी भारत के पारिस्थितिक संतुलन के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है। अरावली के कई हिस्सों में वनस्पति पुनर्स्थापना, वर्षा जल संचयन, वाइल्डलाइफ कॉरिडोर और इको–टूरिज्म जैसी योजनाओं को आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा, जिससे स्थानीय समुदायों को वैकल्पिक आजीविका भी मिल सकती है। वे यह भी चेतावनी देते हैं कि केवल कागजी प्रतिबंध से कुछ नहीं बदलेगा; जरूरत इस बात की है कि राज्यों की खनन और वन विभाग की जमीनी कार्यप्रणाली बदले, पारदर्शी निगरानी तंत्र बने और उल्लंघन करने वालों पर त्वरित दंड हो। अरावली की ढलान पर खड़े सूखे पेड़ों और टूटी चट्टानों की तस्वीरें अब चेतावनी बन चुकी हैं; सवाल यह है कि क्या यह फैसला उन्हें दोबारा हरा-भरा बना पाएगा या फिर यह भी पिछले आदेशों की तरह फाइलों में ही सिमटकर रह जाएगा।








