देश की सर्वोच्च अदालत ने सड़कों पर घूमते लावारिस कुत्तों और आवारा पशुओं की समस्या पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सड़कों को इन पशुओं से मुक्त होना चाहिए। क्योंकि ये न केवल लोगों को काट रहे हैं बल्कि गंभीर सड़क हादसों का मुख्य कारण भी बन रहे हैं। अदालत ने सवाल उठाया कि आखिर कब तक आम लोग इन आवारा पशुओं के कारण परेशानी झेलते रहेंगे। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि सड़कों पर लावारिस कुत्तों का घूमना बेहद खतरनाक है। पीठ ने रेखांकित किया कि ये कुत्ते अक्सर दोपहिया वाहन चालकों और साइकिल सवारों का पीछा करते हैं जिससे वाहन चालक अपना संतुलन खो देते हैं और गंभीर दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं।
अदालत ने कहा कि यह मुद्दा केवल कुत्ते के काटने तक सीमित नहीं है। सड़कें और गलियां कुत्तों से मुक्त रखी जानी चाहिए क्योंकि कोई यह नहीं समझ सकता कि कौन सा कुत्ता किस मूड में है और कब हमला कर सकता है। पीठ ने लोगों की सुरक्षा को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि सार्वजनिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता के हित में प्रभावी नीति बनाना राज्यों और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है।

स्कूलों, अस्पतालों और कोर्ट परिसरों में कुत्तों की क्या जरूरत?
सुप्रीम कोर्ट ने संस्थानों की सुरक्षा पर भी सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि किसी भी स्कूल, अस्पताल, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन या कोर्ट परिसर में आवारा कुत्तों की मौजूदगी को सामान्य कैसे माना जा सकता है? पीठ ने कहा कि इन स्थानों से कुत्तों को हटाने पर क्या आपत्ति हो सकती है?। हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि सभी कुत्तों को शेल्टर होम में रखना एक व्यावहारिक समाधान नहीं हो सकता इसलिए इस समस्या का समाधान वैज्ञानिक और मानवीय तरीके से खोजना अनिवार्य है।
सिब्बल ने कहा-आमतौर पर कुत्ते किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं
पशु अधिकार समूहों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि कुत्ते आमतौर पर किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते और वे विश्वविद्यालय परिसरों में शांति से रहते हैं। उन्होंने अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि जब वे यूनिवर्सिटी में थे तब वहां कुत्ते थे और किसी ने उन्हें नहीं काटा। इस पर पीठ ने टिप्पणी की कि सिब्बल की जानकारी पुरानी हो चुकी है और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बंगलूरू ने हाल ही में कुत्तों के हमलों की कई रिपोर्ट दी हैं। अदालत ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, अब बस एक ही काम बाकी रह गया है कि कुत्तों की भी काउंसलिंग की जाए ताकि उन्हें वापस छोड़े जाने पर वे लोगों को न काटें।
न्यायिक अधिकारियों के साथ भी हुए हादसे
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि आवारा पशुओं की समस्या इतनी गंभीर है कि न्यायिक अधिकारी भी इससे सुरक्षित नहीं हैं। पीठ ने बताया कि पिछले 20 दिनों में राजस्थान हाईकोर्ट के दो जज लावारिस पशुओं के कारण दुर्घटना का शिकार हुए हैं, जिनमें से एक जज अब भी रीढ़ की हड्डी की चोट से जूझ रहे हैं। इसके अलावा, हाल के दिनों में नेशनल हाईवे पर जजों के साथ भी ऐसी घटनाएं हुई हैं जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाती हैं।

राज्यों और नगर निकायों को सख्त निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने नगर निगमों और स्थानीय निकायों द्वारा नियमों के पालन में ढिलाई पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि रोकथाम हमेशा इलाज से बेहतर होती है इसलिए सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करना जरूरी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की जिम्मेदारी को राज्यों पर डालना अनुचित है और इस मामले में तत्काल ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है। अदालत अब इस मामले में अगली सुनवाई के दौरान नगर निकायों और राज्य सरकारों से उनके द्वारा उठाए गए कदमों का विवरण मांग सकती है।








