38 वर्षों तक रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) में बतौर वैज्ञानिक सेवा देने के दौरान डा. हेमंत कुमार पांडेय के खाते में बहुत से उपलब्धियां आई हैं। राष्ट्रीय स्तर के कई पुरस्कारों से वह नवाजे गए हैं। लेकिन, चर्चा उस पैमाने पर नई हुई, जो वह डिजर्व करते हैं। काम के अनुरूप शोहरत न मिलने पर वह कहते हैं, जो हमारा काम था, वह हमने ईमानदारी से किया। शोहरत की चाह कभी नहीं रही। मेरे प्रयास से अगर किसी का जीवन आसान होता है, उससे बढ़कर कुछ नहीं है। 15 फरवरी 1965 को नैनीताल के मझेला गांव में डा. रघुवर्द्धन पांडेय और भगवती पांडेय के घर में जन्मे डा. हेमंत कुमार पांडेय ने कुमाऊं विश्वविद्यालय के सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय परिसर अल्मोड़ा से बीएससी की और फिर डीएसबी परिसर से आर्गेनिक केमिस्ट्री में एमएससी की उपाधि ली। गढ़वाल विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के बाद रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) में विज्ञानी के पद पर उनका चयन हुआ। पूर्व राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम ने जब उनसे कहा कि इन जड़ी-बूटियों से किसी ऐसी बीमारी की दवा बनाओ जिसका इलाज दुनिया में अब तक नहीं है। उन्होंने इस बात चुनौती के रूप में लिया। आखिरकार, दस साल के अथक प्रयास से उन्होंने यह काम कर दिखाया।

ल्यूकोस्किन 65 से 70 प्रतिशत कारगर है। दवा मलहम के तरह लगाने और खाने दोनों तरीके से इस्तेमाल की जाती है। डॉ. पांडेय बताते हैं, ल्यूकोडर्मा होने के 14 से अधिक कारण हैं। अनुसंधान से पहले इनके कारणों को खोजा गया। यह बीमारी 30 प्रतिशत जेनेटिक है। इसके अलावा खट्टी चीजों ज्यादा खाने से भी होता है, और भी बहुत कारण हैं। खास बात यह है कि डीआरडीओ ने दवा बनाने में करीब एक करोड़ रुपये खर्च किया था, लेकिन अब तक इस दवा से दो करोड़ 30 लाख रुपये राजस्व मिल चुका है। डीआईबीईआर में तैयार तीन उत्पादों का टीओटी एमिल फार्मास्युटिकल्स, नई दिल्ली के साथ किया गया है, जिसने ल्यूकोस्किन नाम से एंटी-ल्यूकोडर्मा उत्पाद बाजार में उतारा है। डा. पांडेय को मिले पुरस्कारों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है। ‘अतुल्य उत्तराखंड’ से उनकी बातचीत के कुछ प्रमुख अंश…।
आप वनस्पति वैज्ञानिक हैं? आपको जब डीआरडीओ में मौका मिला तो आपने शोध के लिए सफेद कुष्ठ को ही क्यों चुना?
सात मई 1997 को डीआरडीओ के तत्कालीन महानिदेशक डा. एपीजे अब्दुल कलाम रक्षा जैव-ऊर्जा अनुसंधान संस्थान (डीआईबीईआर) फील्ड स्टेशन, पिथौरागढ़ के तकनीकी परिसर का उद्घाटन करने आए थे। उन्होंने संस्थान के हर्बल मेडिसिन डिवीजन और लाइव हर्बल गार्डन का दौरा किया। हर्बल गार्डन में रखे हिमालयी औषधीय पौधों में गहरी रुचि दिखाई। डा. कलाम एक ही स्थान पर हिमालयी औषधीय पौधों की 100 से अधिक प्रजातियों को देखकर बहुत खुश हुए थे। उन्होंने हमें एक चुनौती दी कि उस बीमारी के लिए एक हर्बल दवा विकसित करें जिसका आधुनिक दवाओं (एलोपैथिक) में कोई इलाज नहीं है। उन्होंने हमें एक सप्ताह के भीतर एक परियोजना तैयार करने का निर्देश दिया। उनकी सलाह के अनुसार, 58 लाख रुपये के बजट के साथ ‘हिमालयी औषधीय पौधों पर अध्ययन और हर्बल उत्पादों का विकास’ की एक परियोजना तैयार की गई। इसके अंतर्गत हर्बल उत्पाद जैसे ल्यूकोडर्मा-रोधी हर्बल उत्पाद (ल्यूकोस्किन) और एक्जिमा-रोधी हर्बल उत्पाद (एक्सोस्किन) विकसित किए गए थे। हम गर्व से कह सकते हैं कि ल्यूकोडर्मा जैसे असाध्य त्वचा रोग के लिए हर्बल उत्पाद का विकास मुख्य रूप से डा. एपीजे अब्दुल कलाम की प्रेरणा के कारण संभव हुआ। वैसे भी बचपन से हम लोग देखते आए हैं कि ल्यूकोडर्मा के रोगियों के साथ भेदभाव होता है। मुझे तो उनके प्रति बहुत सहानुभूति होती है। पढ़े लिखे लोग जो यह जानते हैं कि यह छुआछूत की बीमारी नहीं है, इसके बावजूद वह भी प्रभावित लोगों के साथ भेदभाव करते हैं। इसलिए जब मौका मिला तो मैंने यह विषय शोध के लिए चुना। मुझे खुशी है कि वर्षों की मेहनत सफल हुई है। अब हमारे रिसर्च के आधार पर दवा बना रही कंपनी का दावा है कि इसके प्रभाव से दो से तीन लाख लोग ठीक हुए हैं।

कुछ बीमारियों के साथ मिथक जुड़े होते हैं, इस बारे में आप क्या सोचते हैं?
इस बीमारी के साथ कुछ ज्यादा ही मिथक जुड़े हैं। मुझे तो याद है कि कितने बड़े अधिकारी मेरे केबिन में आकर रोते थे। बताते थे कि उनके बच्चे को यह बीमारी है। आसपास के बच्चे उनके साथ खेलते नहीं हैं। यह सुनकर बड़ा अजीब लगता था। आज के समय में भी लोग बिना तथ्य जाने इस तरह बिहेवियर करते हैं। जब किसी बड़े अधिकारी के बच्चे या उनके साथ भेदभाव हो सकता है तो आम लोगों पर क्या बीतती होगी? आप जरा कल्पना कीजिए। मुझे लगता है कि सरकार और सामाजिक संगठनों को इस मुद्दे पर बड़ा जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। मैं तो कहीं भी जाता हूं तो लोगों को यह जरूर बताता हूं कि यह छुआछूत की बीमारी नहीं है। साथ ही अब इसका इलाज भी मिल चुका है।
पेशेवर जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि किसे मानते हैं?
मैंने एक असाध्य त्वचा रोग ल्यूकोडर्मा अथवा विटिलिगो या श्वेत कुष्ठ के इलाज के लिए एक अत्यंत प्रभावी हर्बल उत्पाद विकसित किया। इस बीमारी को हमारे देश में एक बड़ा सामाजिक कलंक या अभिशाप माना जाता है। 10 वर्षों के कठोर अनुसंधान एवं विकास प्रयासों से मैं ल्यूकोडर्मा के इलाज के लिए एक प्रभावी हर्बल उत्पाद विकसित कर सका। आधुनिक चिकित्सा (एलोपैथी) में यह त्वचा विकार लगभग असाध्य है। हमारे देश में लोग इसे कुष्ठ रोग समझकर एक संक्रामक रोग मानते हैं। इससे प्रभावित व्यक्ति हमेशा अवसाद और मानसिक तनाव में रहता है और उसे सामाजिक रूप से बहिष्कृत होने का एहसास होता है। ल्यूकोडर्मा से प्रभावित रोगियों में गंभीर हीन भावना हो सकती है, जिसके परिणामस्वरूप अवसाद हो सकता है, जिससे उनके कार्य प्रदर्शन, व्यक्तित्व और सौंदर्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हमारी दवा एंटील्यूकोडर्मा प्रभावी उपचार है। इसे मैं बड़ी उपलब्धि मानता हूं।

अपनी पिछले 38 वर्ष की यात्रा को कैसे देखते हैं?
मेरे परिवार में अधिकांश लोगा चिकित्सक हैं। परिवार हमेशा से दूसरों की तकलीफ समझता रहा है। यही गुण मेरे अंदर भी है। भाग्य से मुझे काम भी ऐसा मिला। जिसमें अपनी मेहनत से लोगों को फायदा पहुंचा पाया। जब लोग ठीक होकर धन्यवाद देने आते हैं तो बहुत खुशी होती है। जहां भी जाता हूं सम्मान मिलता है। अगर मैं बैंकर होता या किसी दूसरे खूब पैसे कमाने वाले पेशे में होता तो यह सम्मान कहां मिलता। कुल मिलाकर मैं अपने कैरियर को गोल्डन जर्नी कहूंगा। मैंने शत प्रतिशत दिया और लोगों को इसका फायदा भी मिल रहा है।

ल्यूकोडर्मा पर और काम करने की जरूरत है या जो हुआ है वह पर्याप्त है?
अभी इसपर और काम करने की जरूरत है। दुर्भाग्य से डीआरडीओ इन दिनों अपना पूरा फोकस वेपन रिसर्च पर कर दिया है। लाइफ साइंस पर आगे भी काम करना चाहिए था, क्योंकि जो काम वह कर सकता है वह निजी कंपनियां नहीं कर पाएंगी। मेरा मानना है कि अगर आने वाले दस वर्षों तक इस खोज की जाती तो ठीक होने का समय और घट सकता है। किसी निजी कंपनी के वैज्ञानिकों से जब मिलता हूं उन्हें इस बात को लेकर प्रोत्साहित भी करता हूं कि अभी और शोध करो। अंतिम परिणाम अभी बाकी है। जीवन और सरल बनाया जा सकता है।
डीआरडीओ में रक्षा अनुसंधान के अलावा अन्य शोध करने वाले वैज्ञानिकों के लिए कैसा माहौल है?
कभी डीआरडीओ के पास 10 प्रयोगशालाएं होती थीं। अब यह 52 हो चुकी हैं। यहां पर वैमानिकी, आयुध, इलेक्ट्रॉनिक्स, लड़ाकू वाहन, इंजीनियरिंग प्रणालियां, उपकरण, मिसाइल, उन्नत कंप्यूटिंग और सिमुलेशन, विशेष सामग्री, नौसेना प्रणालियां, जीवन विज्ञान, प्रशिक्षण, सूचना प्रणाली और कृषि पर अनुसंधान होते हैं। हजारों वैज्ञानिक इस संस्था से जुड़े हैं। यह दुखद ही हैं कि सेना में भी ल्यूकोडर्मा से पीड़ित युवक को नहीं लिया जाता। या नौकरी के दौरान उसको यह बीमारी हुई तो निकाल दिया जाता है। इसलिए वैज्ञानिक चाहते थे कि इसका इलाज खोजा जाए। आखिरकार, शरीर में एक केमिकल की गड़बड़ी की वजह से चमड़ी का रंग उतर जाता है। इससे शरीर पर कोई अन्य असर नहीं पड़ता है। देश में लगभग पांच करोड़ लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। ऐसे लोगों के लिए यह शोध बड़े काम का है। डीआरडीओ के माहौल की बात करूं तो 38 साल के भीतर मुझे कभी किसी बात की परेशानी नहीं हुई। मेरे काम को कई बार सराहा गया। राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले।
उत्तराखंड एक हर्बल स्टेट…कितनी संभावना है, क्या सोचते हैं?
मेरा शोध पूरे देश के लिए हैं। बल्कि दुनिया के लिए है। उत्तराखंड के लोग भी इससे लाभान्वित हुए हैं। आगे भी होते रहेंगे। एक बात का अफसोस होता है कि हमारा प्रदेश बहुमूल्य जड़ी बूटियों से बेहद समृद्ध है। लक्ष्मण की जान भी हमारे प्रदेश के द्रोणागिरि पर्वत से लाई गई जड़ी-बूटियों ने ही बचाई थी। लेकिन, यहां की सरकारें सिर्फ हर्बल स्टेट कहकर ही काम चलाते रहे। इसपर कोई ठोस काम नहीं किया। गोपेश्वर में कुछ साल पहले एचआरडीआई रिसर्च संस्था बनाई गई लेकिन प्रशासनिक उपयोगिता के कारण वह भी बहुत सिद्ध नहीं हुआ। हालांकि, सगंध पौधा संस्थान अच्छा काम कर रहा है। रिसर्च पर विशेष फोकस करने की जरूरत है। बिना इसके कुछ नहीं बदलने वाला है। इसके अलावा जब हम लोग काम पर थे तो भी सारे वैज्ञानिक राज्य की परेशानियों और संभावनाओं पर खूब चर्चा करते थे। मगर, हम तो ठहरे वैज्ञानिक हमारी बात भला कहां राजनेता सुनने वाले हैं। हमारे हाथ में जो था, उसे ईमानदारी से किया। मेरा मानना है कि जिसे जो टास्क मिले उसे ईमानदारी से करता जाए। इतने भर से देश और उत्तराखंड का कल्याण हो जाएगा।

डीआरडीओ से रिटायर्ड हो गए हैं काम से नहीं, आगे क्या योजनाएं हैं?
देखिए, रिटायर्ड होने के बाद बहुत सी निजी कंपनियों के ऑफर आए। फिलहाल मैं किसी के साथ काम नहीं कर रहा हूं। मैं यूनिवर्सिटी, कॉलेजों में व्याख्यान देने जाता हूं। जब मैं अपने अल्मोड़ा स्थिति घर आया तो 100 से अधिक गमले खरीदे। सभी में जड़ी-बूटियां लगाई हैं। इसमें टैग भी लगाया है, कॉमन नेम और बॉटिकल नेम के साथ। ताकि, लोग हर्बल को लेकर और जागरूक हों। स्कूलों में बच्चों को हर्बल को लेकर जागरूक करता हूं। कुल मिलाकर हर्बल के आसपास ही आगे का जीवन बिताना है।
अगर आप फिर से 25 के हो जाएं तो किस विषय पर शोध करना पसंद करेंगे?
अगर मैं वापस 25 का हो जाऊं और मुझे डीआरडीओ में काम करने का अवसर मिला तो मैं इसी विषय पर शोध करूंगा। बल्कि कुछ और असाध्य बीमारियों जैसे कैंसर, गठिया पर भी काम करूंगा, क्योंकि अपने देश में इन बीमारियों से पीड़ित लोगों के पास मेडिकली विकल्प बहुत सीमित हैं। एलोपैथ की दवाएं दर्द, लक्षण कम कर देती हैं मगर पूरी तरह क्योर नहीं करती हैं। हर्बल में वह ताकत है, उससे कई बीमारियों का इलाज खोजा जा सकता है।







