World Peacock Day : अपनी चाल और नृत्य से सबका मन मोह लेने वाला मोर इश्क के मामले में बेवफा होता है। वह एक साथ कई मोरनी के साथ रोमांस करता है। जिस मोर के पंख जितने फैले होते हैं वह उतना ही घमंडी होता है। क्योंकि माना जाता है मोरनी ज्यादा फैले पंख वाले मोर पर मोहित हो जाती हैं। मोरनी के साथ इश्क फरमाने के बाद तुरंत दूसरे साथी की तलाश में लग जाता है। मोर समूह में रहते हैं। जिसमें एक मोर के साथ कई मोरनी होती हैं। मोरनी को आकर्षित करने के लिए नृत्य करते हैं। इसलिए इसे बेवफा पक्षी भी कहा जाता है।
15 नवंबर को विश्व मोर दिवस मनाया जाता है। 26 जनवरी 1963 को मोर को राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया था। क्योंकि यह भारतीय संस्कृति, पौराणिक कथाओं और धार्मिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा है। इसको शालीनता, गर्व और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। मोर देश के विभिन्न जलवायु‑क्षेत्रों उष्णकटिबंधीय वर्षावन से लेकर शुष्क झाड़ियों तक पाया जाता है। इसे सबका पक्षी कहा जाता है। इसलिए इसे राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा दिया गया। हमारे पड़ोसी देश म्यांमार का राष्ट्रीय पक्षी भी मोर ही है। मोर का वैज्ञानिक नाम पावो क्रिस्टेटस है। माना जाता है कि मोर पंख नकारात्मक ऊर्जा एवं बुरी नजर से बचाव में भी सहायक होते हैं। इसके साथ मोर पर्यावरणीय संतुलन में भी भूमिका निभाता है। वह खेतों और पेड़ों के हानिकारक कीटों को खा जाता है और पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने में मदद देता है।

मोर की धार्मिक मान्यता बहुत महत्वपूर्ण है। हिंदू धर्म में मोर को भगवान मुरुगन या कार्तिकेय का सवारी माना जाता है। यही नहीं इसे भगवान कृष्ण का वाहन के साथ उनकी बांसुरी के साथ भी मोर की छवि देखी जाती है। बौद्ध धर्म में मोर को बुद्ध तथा उनके पंखों को ज्ञान एवं विवेक का प्रतीक माना जाता है।
देश में बढ़ी मोरों की संख्या
भारत के राष्ट्रीय पक्षी, भारतीय मोर/मोर की संख्या में पिछले कुछ दशकों में वृद्धि हुई है। जबकि देश में गिद्धों और चीलों की संख्या में कमी आई है। यह बात गांधीनगर में आयोजित वन्य प्राणियों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन के 13वें सम्मेलन में भारत के पक्षी स्थिति 2020 रिपोर्ट बताई गई थी। हालांकि, देश में कभी मोरों की गणना नहीं की गई है। एक निजी संस्था सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री कोयंबटूर के वैज्ञानिकों ने कुछ महीने पहले एक अध्ययन किया था। इसमें बताया गया कि तमिलनाडु में मोरों की संख्या करीब 61 लाख है। इस आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि देश में मोरों की संख्या करोड़ों में हो सकती है।
मोर के शिकार पर सख्त है कानून
मोर के शिकार पर देश में सख्त कानून है। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत मोर का शिकार करना या उसे नुकसान पहुंचाना दंडनीय अपराध है। अगर कोई व्यक्ति मोर का शिकार करता है या उसे नुकसान पहुंचाता है, तो उसे 3 से 7 साल तक की सजा और आर्थिक दंड हो सकता है। दरअसल, पारंपरिक मान्यताओं के कारण मोर का शिकार भी खूब किया जाता है। इसके पंख की खूब मांग रहती है। इनकी संख्या की बात की जाए तो कोई आधिकारिक डाटा उपलब्ध नहीं है। लेकिन, गुजरात के गांधीनगर में वर्ष

दो सौ से ज्यादा पंख, 20 से 25 वर्ष की उम्र
मोर की पूंछ बहुत ही सुंदर होती है जो 200 से ज्यादा अलग-अलग पंखों से सजी होती है। जब उन्हें फड़फड़ाया जाता है तो झिलमिलाती हैं। ये पंख अलग-अलग आंखों के धब्बों के साथ खूबसूरती से सजे होते हैं। नर मोर के रंग इंद्रधनुषी होते हैं और उनके सिर, वक्ष और गर्दन पर हरे और नीले रंग की सजावट होती है। एक स्वस्थ मोर आम तौर पर 20 से 25 साल तक जी सकता है। यह उसकी देखभाल और वातावरण पर निर्भर करता है।








