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    जायका पहाड़ का… अब भट्ट की चटनी भी ग्लोबल!

    हमारे जिन पारंपरिक व्यंजनों को नई पीढ़ियां भूलती जा रही हैं, उनकी गूंज सात समंदर पार हो तो हैरानी तो होगी ही। कितना अजीब है...आज पहाड़ के हर कोने में मैगी, पिज्जा, चाऊमिन और मोमोज आसानी से मिल रहे हैं, लेकिन पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन नहीं। कई लोगों ने तो भट्ट की चटनी का नाम भी नहीं सुना होगा और मोरक्को में इसके जायके ने धूम मचा दी है। ये कमाल किया है पौड़ी गढ़वाल के बैजरो के छोटे से गांव सुकई के साधारण लड़के हितेश नेगी ने...। मोरक्को में आयोजित फूड प्रतियोगिता में हितेश ने 92 शेफ के बीच दो गोल्ड अपने नाम और पहाड़ के पारंपरिक भोजन की तरफ सबका ध्यान खींचा। ‘अतुल्य उत्तराखंड’ और ‘तीरंदाज लाइव’ से हितेश ने अपनी इस प्रतियोगिता के अनुभव साझा किए...
    teerandajBy teerandajJune 14, 2025Updated:June 14, 2025No Comments
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    • अतुल्य उत्तराखंड के लिए ऋषिता नेगी

    जायका पहाड़ का…. भट्ट, गहत की दाल, मडुवा (रागी), झंगोरा जैसे परंपरागत अनाज को पहाड़ की नई पीढ़ियां भूलती जा रही हैं। गाहे बगाहे किताबों, पत्र-पत्रिकाओं में पर्यटन को लेकर हो रही चर्चा में इसको शामिल जरूर किया जाता है, लेकिन, सच्चाई यह है कि उत्तराखंड के आम घरों में खाने की थाली से ये गायब होते जा रहे हैं। नई पीढ़ी को पारंपरिक व्यंजनों के बारे में कम जानकारी है। वे उन व्यंजनों को भूल जाते हैं जिन्हें उनकी कई पीढ़ियों ने बढ़े चाव से खाया है। व्यस्त जीवनशैली के कारण लोगों के पास पारंपरिक व्यंजनों को बनाने और पकाने के लिए समय नहीं बचा है। वे ऐसे भोजन को पसंद करते हैं जो जल्दी और आसानी से उपलब्ध हो सके। इसलिए पश्चिमी देशों का भोजन, पिज्जा, बर्गर और पास्ता, युवा पीढ़ी के बीच लोकप्रिय हो गया। पश्चिमी भोजन के विज्ञापन और विभिन्न माध्यमों पर प्रचार-प्रसार ने भी इसे अधिक आकर्षक बना दिया है। आप किसी रेस्टोरेंट में जाइए, आपको ये चीजें आसानी से मिल जाएंगी। जबकि, पारंपरिक व्यंजन कहीं-कहीं मिलेंगे। पहाड़ के पारंपरिक व्यंजन बनाने में विशेष हुनर की जरूरत होती है। समय भी ज्यादा लगता है। विशेष सामग्री की जरूरत पड़ती है। जो हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं होते हैं। इस वजह से पहाड़ के युवा ही अपने बुजुर्गों द्वारा इजात किए हुए पौष्टिक-स्वादिष्ट व्यंजनों को लुत्फ नहीं उठा पा रहे हैं। दुनिया भले ही आज मिलेट्स यानी मोटे अनाज की दीवानी हुए जा रहे है लेकिन उत्तराखंड में तो सदियों मोटे अनाज को बड़े चाव से खाया जाता है।

    यह बात सिद्ध है कि हिमालयी क्षेत्र के व्यंजनों के स्वाद और पौष्टिकता का कोई मेल नहीं है। यहां कई जायके मिलते हैं। भट्ट, गहत की दाल, मंडुवा (रागी), झंगोरा पहाड़ के परंपरागत अनाज हैं। इन्हीं से तैयार व्यंजनों का मोरक्को में हितेश नेगी ने डंका बजा दिया। आठ से 12 मई तक Hotel Ta' Cenc & Spa की ओर से सोश गस्त्रो फेस्टिवल में उन्होंने हिस्सा लिया। यह प्रतियोगिता मोरक्को के अगादिर शहर में हुई। हितेश ने दो श्रेणियों में 2 गोल्ड मेडल जीतकर भारत और पहाड़ का नाम रोशन किया। ये फेस्टिवल केवल खाना पकाने की प्रतियोगिता नहीं थी बल्कि एक सांस्कृतिक महोत्सव था। यहां कई दशों से आए शेफ ने अपनी पाक कला के हुनर का प्रदर्शन किया। इसी में पहाड़ के इस लड़के ने पहाड़ के स्वाद से सबका दिल जीत लिया। माल्टा में रहने वाले हितेश को प्रतियोगिता की जानकारी इटली के दोस्त से मिली थी। खास बात यह है कि हितेश ने पहले कभी भट्ट की चटनी नहीं बनाई थी। छुट्टियों में घर से भट्ट लेकर माल्टा
    गए थे। यूं ही उनके दिमाग में आया कि इसी को आजमाया जाए। उन्होंने घर पर बात कर इसे बनाने का तरीका सीखा। बनाने के बाद चखा। इसके बाद फाइनल किया कि प्रतियोगिता में इसे ही बनाएंगे। प्रतियोगिता 12 वर्गों में थी। उन्होंने दो कैटेगरी में भाग लिया। निर्णायकों ने जब उनसे पूछा कि वह क्या बना रहे हैं, तब उन्होंने बताया कि ‘मैं उत्तराखंड का हूं। विशुद्ध पहाड़ी हूं। वहीं की डिश बना रहा हूं।’ निर्णायक उनसे बहुत प्रभावित हुए थे। हितेश को पहले कभी इतना बड़ा प्लेटफॉर्म नहीं मिला था। अब वह पहाड़ी व्यंजनों को अधिक से अधिक प्रमोट करेंगे।

    भट्ट की चटनी से मारी बाजी हितेश ने पहाड़ की सबसे पौष्टिक दाल भट्ट की चटनी से बाजी मारी। पहाड़ों में भट्ट की दाल की चुड़कानी, पीसकर भटिया, भूनकर सबूत खाने और दाल बनाने का प्रचलन है। लेकिन हितेश ने पहाड़ की इस पौष्टिक दाल की चटनी बनाई और विदेश में भट्ट की एक नई पहचान गढ़ दी। भट्ट की चटनी पहाड़ के कुछ क्षेत्रों में खास अवसरों पर ही बनाई जाती है लेकिन पहाड़ की दिनचर्या के स्वाद में भट्ट की चटनी नहीं है। चटनी में अक्सर लोग, पुदीना, भांग, तिल, आम आदि की चटनी बनाते हैं। हितेश नेगी ने इसी आम भट्ट की चटनी को खास बना दिया। यह वही चटनी है जिसने बचपन से न जाने कितनी बार हमारे दिलों पर राज किया है।
    पहाड़ पर बचपन, जवानी सात समंदर पार जैसे आम पहाड़ी युवा पढ़ाई के बाद परिवार चलाने के लिए अपनी माटी छोड़ ईंट-कंक्रीट की दुनिया की ओर रुखा करता है, वैसे ही हितेश भी रामनगर में अपनी पढ़ाई पूरी कर बाहर निकले। 2016 से वो विदेश में कार्यरत हैं। उनका बचपन पहाड़ में और जवानी विदेश में बीत रही है। वह पिछले ढाई साल से माल्टा में होटल इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं। हितेश ने दिल्ली से होटल मैनेजमेंट किया। 2010 को उन्होंने पढ़ाई पूरी कर दिल्ली में ही कुछ साल काम किया। फिर खाड़ी देश कुवैत में चार साल तक काम किया। जब वह पहली बार बाहर गए तब उनकी उम्र महज 23 साल थी। कोरोना काल में वह घर आ गए।

     

    पिता के होटल में दो साल काम किया। यही पर उन्होंने पहाड़ी व्यंजनों के बारे में गहराई से अध्ययन किया। पाक कला से उनका गहरा नाता है। पिता भी खाना बनाने के शौकीन हैं। हितेश ने सिर्फ गोल्ड मेडल नहीं जीता बल्कि हर गांव के युवाओं में उम्मीद जगा दी है। बता दिया कि मेहनत और लगन के बल पर आप हर उस फील्ड में बेहतर कर सकते जिसमें आपकी रुचि है। नृत्य, साहित्य,संगीत, कला और खेल जगत में रहकर ही आप देश या प्रदेश का नाम रोशन कर सकते हैं। यह उनकी पहली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता थी। उन्हें माल्टा में भाषाई दिक्कतों का सामना करना पड़ा। लेकिन, उनका फोकस अपने बनाए जाने वाले व्यंजन पर था। बाकी मुश्किलों की तरफ वह ध्यान नहीं दिए। उनकी एक फ्लाइट भी रद्द हो गई थी। इस वजह से वह परेशान भी हुए। 12 घंटे एयरपोर्ट पर बैठे रहे। लेकिन, उनका जोश कम नहीं हुआ।

    यह भी पढ़ें : जिंदा बचे एकमात्र यात्री ने पीएम से कहा-मैं कूदा नहीं था…

    जायका पहाड़ का
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