Uttarakhand : गढ़वाली-कुमाउंनी भाषा अकादमी की मांग जोर पकड़ती जा रही है। उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र लिखकर मांग की है कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जाए। उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच के संयोजक दिनेश ध्यानी का कहना है कि मंच द्वारा इस संबंध में पहले भी कई बार पत्र भेजकर व मुख्यमंत्री व मंत्री से मुलाकात करके इस मुद्दे को उठाया गया है। लेकिन अभी तक इस संबंध में प्रदेश सरकार की तरफ से कोई निर्णय नहीं लिया गया है। ध्यानी में कहा कि हमें आशा है कि प्रदेश सरकार हमारी उक्त जायज मांगों पर शीघ्र ही निर्णय लेगी। उन्होंने कहा, उत्तराखंड राज्य मांगा गया था तब हमारी पहचान का अहम् सवाल था जो कि हमारी भाषा, संस्कृति, सरोकारों पर आधारित था। इसलिए राज्य बनने के पच्चीस साल बाद भी एक अदद भाषा अकादमी का गठन नहीं होना निराशाजनक है। जिस राज्य के लिए दर्जनों शहीदों ने बलिदान दिया, वर्षों तक जनता ने संघर्ष किया, यातना झेलीं लेकिन राज्य बनने के बाद भी हालात जब के तस हैं। इसलिए अब तो कम से कम सरकार को इस पर निर्णय लेना चाहिए।
कुछ लोगों का कहना है कि उत्तराखंड भाषा संस्थान क्षेत्रीय भाषाओं के विकास के लिए कार्य कर रहा है तो अलग से अकादमी की क्या जरूरत है? इस पर ध्यानी ने कहा की जो लोग इस प्रकार की बातें करते हैं उनको पता होना चाहिए कि उत्तराखंड में हिंदी, संस्कृत, उर्दू, पंजाबी अकादमी पहले से हैं और ये सब भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हैं लेकिन उत्तराखंड भाषा संस्थान इन भाषाओं के लिए भी कार्य करता ही है कई सम्मान व पुरस्कार प्रदान करता है। अगर भाषा संस्थान ही भाषा विकास का आधार है तो फिर उक्त चारों भाषाओं की अकादमी क्यों?

ध्यानी ने कहा हम किसी भाषा के विरोधी नहीं हैं। लेकिन उत्तराखंड में गढ़वाली, कुमाउंनी भाषा अकादमी का गठन होना ही चाहिए। साथ ही गढ़वाली, कुमाउंनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए प्रदेश सरकार का सहयोग चाहिए। इसलिए उत्तराखंड विधानसभा से प्रस्ताव चर्चा के बाद पास करते केंद्र को भेजने की हमारी मांग प्रदेश सरकार से है। ध्यानी ने कहा कि जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी क्षेत्रीय भाषाओं के विकास के पक्षधर हैं। उत्तराखंड आगमन पर मोदी जी ने कई बार अपने संबोधन में कहा है कि उत्तराखंड के लोगों को अपनी भाषा, साहित्य की रक्षा करनी चाहिए। ये भाषा बची रहनी चाहिए। साथ ही भारत सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति- 2020 के माध्यम से देश में प्राथमिक स्तर तक मातृ भाषा में शिक्षा देने का प्रावधान रखा है। साहित्य अकादमी पूर्व में हमारे कई साहित्यकारों को सम्मान प्रदान कर चुकी है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा गढ़वाली, कुमाउंनी भाषाओं की पुस्तकों का अनुवाद अन्य भाषाओं में किया जा रहा है व अन्य भाषा की पुस्तकों का अनुवाद गढ़वाली, कुमाउंनी में हो रहा है तो फिर हम लोग ही अपनी पौराणिक भाषाओं के प्रति उदासीन क्यों हैं ?
ध्यानी ने कहा कि अब समय आ गया है कि अगर हमने अपनी भाषा, साहित्य, संस्कृति की रक्षा करनी है तो इस दिशा में सरकारी व संस्थागत आगे आना होगा। क्योंकि आज के समय में पलायन और कई वैश्विक परिवर्तन के कारण स्थानीय भाषा व साहित्य, संस्कृति आदि का अस्तित्व खतरे में है। उत्तराखंड की गढ़वाली, कुमाउंनी भाषाओं के साथ भी यही सब हो रहा है। हम एक समाज के रूप में तो उन्नति कर रहे हैं, निजी स्तर पर विकास कर रहे हैं। लेकिन जब भाषा, साहित्य की बात आती है तो अधिकांश लोग चुप ही रहते हैं। इसलिए आज समय की आवश्कयता है कि हमें अपनी भाषाओं के प्रति इस उदासीनता को त्यागना होगा। नई पीढ़ी को अपनी भाषा, साहित्य, संस्कृति से जोड़ना होगा। हमारी चिंता यह है कि अगर हम अपनी भाषाओं की इसी प्रकार से अवहेलना करेंगे तो फिर आने वाले समय में हमारी गढ़वाली, कुमाउंनी भाषाएं भी संकट में आ जाएंगी। इसलिए आज समय की आवश्यकता है कि उत्तराखंड में गढ़वाली, कुमाउंनी भाषा अकादमी बने, साथ ही गढ़वाली, कुमाउंनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए।








