Uttarakhand में परिवार रजिस्टरों में सामने आई गंभीर अनियमितताओं ने राज्य सरकार को सतर्क कर दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उच्चस्तरीय बैठक में राज्यव्यापी जांच के निर्देश दिए हैं। बैठक में सीएम धामी ने सभी जिलों के परिवार/कुटुंब रजिस्टरों की मूल प्रतियां तत्काल जिलाधिकारियों के पास सुरक्षित जमा करने के आदेश दिए। इससे अभिलेखों में छेड़छाड़ की आशंका पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। सीडीओ और एडीएम स्तर पर इनकी गहन जांच होगी। जिसमें 2003 से वर्तमान तक का पूरा दायरा शामिल रहेगा। फर्जी दस्तावेजों पर नाम दर्ज कराने वालों के खिलाफ विभागीय जांच के साथ-साथ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
परिवार रजिस्टर पंचायत राज (कुटुंब रजिस्टरों का अनुरक्षण) नियमावली, 1970 के तहत संचालित होता है। इसके अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के हर परिवार का नाम अनिवार्य रूप से दर्ज होना चाहिए। नाम दर्ज करने का अधिकार सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) को है जबकि अपील उपजिलाधिकारी (SDM) के पास। वर्तमान में सेवाएं अपणी सरकार पोर्टल पर ऑनलाइन उपलब्ध हैं लेकिन शुद्धिकरण प्रक्रिया को अब और सख्त बनाया जाएगा।
जनसांख्यिकीय असंतुलन की आशंका
बैठक में खुलासा हुआ कि राज्य की सीमा से सटे मैदानी जनपदों में अनधिकृत बसावट के आधार पर रजिस्टरों में नाम दर्ज हो रहे हैं। इससे जनसंख्या संतुलन प्रभावित हो रहा है खासकर मुस्लिम प्रधानों द्वारा रिश्तेदारों के फर्जी नाम दर्ज कराने के आरोपों के बीच। उदाहरणस्वरूप, ब्याह-शादी पर नाम कटाने के नियमों का उल्लंघन आम है। सरकार अब नियमावली में संशोधन पर विचार कर रही है ताकि ऐसी अनियमितताएं रोकी जा सकें।
आंकड़ों में उजागर विसंगतियां
पंचायती राज विभाग के अनुसार 1 अप्रैल से 31 दिसंबर 2025 तक नए परिवार जोड़ने के 2,66,294 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें 260337 स्वीकृत हुए जबकि 5429 आवेदन नियम उल्लंघन या अपूर्ण दस्तावेजों के कारण निरस्त किए गए। यह आंकड़ा अनियमितताओं की गंभीरता दर्शाता है। सेवाओं के लिए आवश्यक दस्तावेजों में खतौनी, आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र आदि शामिल हैं। परिवार रजिस्टर प्रणाली दशकों पुरानी है लेकिन डिजिटल युग में पारदर्शिता की कमी ने समस्याएं बढ़ाई हैं। पिछले वर्षों में सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध प्रवास के कारण रजिस्टरों का दुरुपयोग हुआ।
प्रभाव और भविष्य की दिशा
यह जांच राज्य की प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। जिलाधिकारियों को समयबद्ध रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश हैं। नियमावली संशोधन से नए आवेदनों में सत्यापन कठोर होगा, जिसमें 15 वर्ष के निवास प्रमाण जैसे दस्तावेज अनिवार्य होंगे। इससे उत्तराखंड की सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय अखंडता सुरक्षित रहेगी।








