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    Home»FOLK रंग»Uttarakhand : प्रसिद्ध तमिल रचना ‘आथीसूड़ी’ का गढ़वाली-कुमाऊंनी में हुआ अनुवाद
    FOLK रंग

    Uttarakhand : प्रसिद्ध तमिल रचना ‘आथीसूड़ी’ का गढ़वाली-कुमाऊंनी में हुआ अनुवाद

    दिल्ली विश्वविद्यालय में हुई कार्यशाला में कई भाषाओं के अनुवादक हुए शामिल। गढ़वाली भाषा में उक्त पुस्तक का अनुवाद साहित्यकार दिनेश ध्यानी ने किया।
    teerandajBy teerandajDecember 7, 2025No Comments
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    Uttarakhand : भाषा ही वह माध्यम है जिसके द्वारा हम दूसरी संस्कृति के करीब आते हैं। इसमें अनुवादक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। तमिलनाडु, तेलुगु, मलयालम आदि भाषाओं में कितने ही विश्वस्तरीय रचनाएं हुईं। लेकिन, अधिकांश रचनाओं को हिंदी में अनुवाद न होने के कारण हिंदी भाषी इन अमूल्य रचनाओं से वंचित रह जाते हैं। हालांकि अब तस्वीर बदल रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय में बहुभाषिक अनुवाद कार्यशाला का आयोजन किया गया। दरअसल, तमिल की प्रसिद्ध रचना अव्वैयार की आथीसूड़ी का अनुवाद कई भाषाओं में किया जाना है। इसी कारण देशभर के अनुवादकों के लिए यह कार्यशाला आयोजित की गई थी। उत्तराखंड के साहित्यकार दिनेश ध्यानी ने इसका अनुवाद गढ़वाली में किया है। डॉ. रुचि राणा ने उनका सहयोग किया है। इस आयोजन में गढ़वाली भाषा और कुमाउंनी भाषा को स्थान मिलना अपने आप में बड़ी बात है।

    तीन दिवसीय इस कार्यशाला का आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा तथा साहित्य अध्ययन विभाग द्वारा केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान के सहयोग से हुआ। कार्यशाला में मुख्य रूप से गढ़वाली, सिंधी, कश्मीरी, बोडो, मैथिली, मेइती के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय भाषाओं जैसे पोलिश, वियतनामी, स्पैनिश, पुर्तगाली आदि के प्रतिभागी अनुवादकों/ विद्वानों ने भाग लिया। इस तीन दिवसीय कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य तमिल की प्रसिद्ध रचना अव्वैयार की ‘आथीसूड़ी’ का अनुवाद भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में करना है, जिससे भाषाई विविधता और अंतर–संस्कृतिक संवाद को प्रोत्साहन मिल सके।

    साहित्यकार दिनेश ध्यानी ने कहा कि गढ़वाली-कुमाउंनी भाषाएं लगभग एक हजार साल से भी पुरानी हैं। उन्होंने कहा कि वह लोग लगातार इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए प्रयासरत है। उन्होंने बताया कि विगत कई वर्षों से दिल्ली एनसीआर समेत कई राज्यों में बच्चों को गढ़वाली, कुमाउनी भाषा पढ़ा रहे हैं। नई पीढ़ी भाषा, साहित्य व सरोकारों से जोड़े रखना बहुत अहम है। ध्यानी ने कहा कि इस प्रकार के आयोजन हमारे जैसे संघर्षशील भाषाओं के लिए सुकून का पल लेकर आते हैं। दिल्ली विश्वविद्यायल जैसे बड़े फलक पर हमारी भाषाओं की बात होना गर्व की बात है। आशा है इस प्रकार के आयोजन लगातार होते रहेंगे। सभी वक्ताओं ने भी इस बात पर सहमति जताई कि इस प्रकार की कार्यशाला लगातार होनी चाहिए। देश विदेश के भाषा प्रेमी, साहित्यकार व अनुवादकों ने कहा है तीन दिन तक लगातार चिंतन, मनन और बहुत कुछ नया सीखने और जानने का अवसर का सभी ने भाषाहित में बहुत फायदा उठाया।

    यह पहला विविध सांस्कृतिक समुदायों को एक मंच पर जोड़ते हुए साहित्य को वैश्विक विस्तार प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। निदेशक प्रो. आर. चन्द्रशेखरण (CICT, चेन्नई) तथा प्रो. रविप्रकाश टेकचंदानी और प्रो. डी. उमा देवी द्वारा इस आयोजन का नेतृत्व एवं परिकल्पना की गई। यह कार्यशाला इस विश्वास को मजबूत करती है कि जब अनुवादक एक साथ बैठते हैं तब भाषाएं दीवारें नहीं पुल बन जाती हैं और दुनिया और अधिक एकीकृत दिखाई देती है।

    कार्यशाला आयोजन समिति के सदस्य थे
    • सुश्री सुरभि गुप्ता (रिसर्च स्कॉलर)
    • सुश्री सेल्वंबल वी (रिसर्च स्कॉलर)
    • श्रीमती रजनी गुप्ता (रिसर्च स्कॉलर)
    • श्री सतीश आर (रिसर्च स्कॉलर)
    • सुश्री प्रभजोत कौर (रिसर्च स्कॉलर)
    • श्री शुभम चौधरी (रिसर्च स्कॉलर)
    • श्री आकाश (रिसर्च स्कॉलर)
    • श्री एस. श्री सरन (रिसर्च स्कॉलर)

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