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    मंजूबाला … 21 साल की साधना

    महिला दिवस के अवसर पर अतुल्य उत्तराखंड की टीम ने प्रदेश भर में सरकारी सेवाओं से लेकर स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं व महिला उद्यमियों से भी बात की। उनके कामों का गहराई से विश्लेषण किया। एक बात स्पष्ट दिखी। परिवर्तन अब अपवाद नहीं प्रवृत्ति बन चुका है। यह बदलाव केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की कहानी नहीं बल्कि सामाजिक संरचना में हो रहे गहरे परिवर्तन का प्रमाण है। कैदियों के पुनर्वास का कार्य कर रहीं गिरिबाला का उदाहरण बताता है कि महिला नेतृत्व केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक सुधार और संवेदनशील क्षेत्रों में भी निर्णायक भूमिका निभा रहा है।
    teerandajBy teerandajMarch 8, 2026Updated:March 8, 2026No Comments
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    • अतुल्य उत्तराखंड ब्यूरो

    womens day Special : उत्तराखंड के सीमांत जनपद चंपावत जिला के बाराकोट ब्लॉक में बसा च्यूरानी गांव… ऊबड़-खाबड़ पगडंडियां, सीमित संसाधन और चुनौतियों से भरी दिनचर्या। इन्हीं पहाड़ियों के बीच एक छोटा-सा प्राथमिक विद्यालय है। यहां से उठी समर्पण की कहानी अब राष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुकी है। इस विद्यालय की प्रधानाध्यापिका मंजूबाला को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2025 से नवाजा गया है। 3 सितंबर 2025 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें सम्मानित किया। यह सम्मान सिर्फ एक शिक्षक का नहीं बल्कि उस जज्बे का है जो पहाड़ की कठिन राहों से गुजरकर भी हार नहीं मानता। यह सम्मान 21 वर्षों के संघर्ष को है। जब पहाड़ के दुर्गम इलाकों में कोई जाना नहीं चाहता वहां शिक्षिका मंजूबाला 21 वर्षों से शिक्षा की चौकीदारी कर रही हैं।

    च्यूरानी का विद्यालय सड़क से करीब ढाई किलोमीटर दूर है। वह पहाड़ के टॉप पर है। चढ़ाई बेहद कठिन है। इसलिए यहां पर कोई शिक्षक ठहरता नहीं है। खैर, यह हालत तो पहाड़ के अन्य स्कूलों के भी हैं। शिक्षक या कर्मचारी पहाड़ के स्कूलों में नहीं काम करना चाहते हैं। किसी का तबादला हो भी गया तो वह किसी तरह महीने दो महीने में दूसरी जगह करा लेता है। दरअसल, च्यूरानी में स्वास्थ्य व अन्य मूलभूत सेवाओं का अभाव है। अगर कोई बीमार पड़ जाए तो उसे आसपास कोई डॉक्टर भी नहीं मिलेगा। इसलिए यहां पर कोई शिक्षक नहीं टिकना चाहता है। लेकिन, शिक्षिका मंजूबाला जब एक बार यहां पहुंचीं तो वापसी के दरवाजे खुद ही बंद कर लिया। ऐसा नहीं है कि उनका तबादला नहीं हुआ। या वह नहीं करवा सकती थीं। उनके बच्चे देहरादून में रहते हैं। चाहती तो वहां भी करवा सकती थी। क्योंकि उनकी सेवा इतनी लंबी हो चुकी है। दो बार वह प्रमोट भी हो चुकी हैं। लेकिन, उन्होंने पलायन का रास्ता नहीं चुना। वहीं डट गईं। कई मुश्किलें भी झेलीं। हर दिन मंजूबाला इसी मुश्किल पहाड़ी रास्ते को पार कर स्कूल पहुंचती हैं। बरसात हो या ठंड, रास्ता फिसलन भरा हो या धूप चुभती हुई लेकिन उनकी दिनचर्या नहीं बदलती।

    21 साल पहले 2025 में मंजूबाला जब यहां आई थीं तब स्कूल की इमारत जरूर खंडहर सी थी मगर बच्चों की किलकारियों से पूरा इलाका गूंजता था। एक कमरा था। 90 बच्चे थे। आसपास गांवों में भी लोग थे। वह बताती हैं कि उस समय मिड डे मील बनाने के लिए बर्तन कम पड़ जाते थे। हम लोग दो बार में खाना बनवाते थे। धीरे-धीरे लोग पलायन करते गए, स्कूल में बच्चों की संख्या भी घटती गई। मौजूदा समय में स्कूल में पांच कमरे हैं। कंप्यूटर हैं, स्मार्ट टीवी हैं। पहले बच्चे दरी बिछाकर बैठते थे, अब बेहतर फर्नीचर है। लेकिन, अब बच्चे केवल छह हैं। अगले साल चार ही बचेंगे। आसपास कोई रहता ही नहीं, किसके पास जाकर कहूं कि अपना बच्चा स्कूल भेज दें।

    पहाड़ी गांव में जिले का पहला अंग्रेजी माध्यम स्कूल खड़ा किया
    2005 में मंजूबाला ने स्कूल की कमान संभाली। थोड़े ही वर्षों में सब बदल गया। 2011 तक यह जिले का पहला अंग्रेजी माध्यम प्राथमिक विद्यालय बन चुका था। उन्होंने नियमित कक्षाओं के साथ शाम की पढ़ाई शुरू की। यहां बच्चे अंग्रेजी, हिंदी और कुमाऊनी सीखते हैं। मंजूबाला कहती हैं, मातृभाषा का जुड़ाव ही बच्चे को आत्मविश्वास देता है। उनके कई शिष्य सेना व एसएसबी में भर्ती हुए। कुछ ने राजीव गांधी नवोदय विद्यालय और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में जगह बनाई। एक समय वह 25 स्कूलों की समन्वयक भी रहीं। जहां भी रहीं, बेटियों की पढ़ाई को प्राथमिकता दी।

    भावनाओं से बड़ी भूख और भविष्य की चिंता
    कभी 1100-1200 की आबादी वाला यह इलाका अब 11 परिवारों तक सिमट चुका है। शिक्षिका मंजूबाला बताती हैं, गांव के लोग रोजगार की तलाश में गाजियाबाद, दिल्ली, मुंबई की ओर चले गए। वहां वे 20-25 हजार रुपये कमा लेते हैं। यहां उनको रोजगार मिले तभी तो रुकेंगे। मैं कई लोगों को रोकने की कोशिश करती हूं। कहती हूं-बच्चों को मेरे पास छोड़ दीजिए, मैं मुफ्त पढ़ाऊंगी। लेकिन भूख और भविष्य की चिंता भावनाओं से बड़ी होती है।

    जंगल को ही बनाए रोजगार का माध्यम
    मंजूबाला सिर्फ अंग्रेजी ही नहीं पढ़ातीं वह विकास का खाका भी सोचती हैं। कहती हैं-पलायन रोकना है तो रोजगार दीजिए। हमारे पास जंगल हैं, चूरा के पेड़ हैं। मधुमक्खी पालन की अपार संभावनाएं हैं। शुद्ध शहद 900-1000 रुपये किलो बिक रहा है। अगर इसे उद्योग बना दिया जाए तो गांव आत्मनिर्भर हो सकते हैं।

    शिक्षा ने ही खड़ा रहना सिखाया
    उनके लिए यह संघर्ष आसान नहीं रहा। दो बच्चों की सिंगल अभिभावक। शुरुआत में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। दोनों बच्चों की पढ़ाई पिथौरागढ़ में हो रही थी। इसलिए वह रोजाना घर से स्कूल आती जाती थी। अब बच्चे बड़े हो गए हैं तो स्कूल के पास ही एक कमरा लेकर यही रहने लगी हैं। एक बच्चा फौज में अफसर है। दूसरा इंजीनियर। यानी, वह घरेलू मोर्चे पर भी बेहद सफल साबित हुई हैं। वह कहती है, जो मुसीबत मेरे सामने आई अगर मैं पढ़ी लिखी नहीं होती तो जीवन बड़ा मुश्किल हो जाता। इसलिए मैं पहाड़ के सभी लोगों को कहती हूं कि बेटियों को कम से कम 12वीं तक की शिक्षा तो दो ही।

    बेटियों के लिए एक जिद

    पहाड़ के गांवों में लड़कियों की स्थिति ने उन्हें भीतर तक झकझोरा। कई परिवारों में पांच-पांच बेटियां हैं। वह बताती हैं-बेटों की चाह में कई लोगों के पास पांच-पांच बेटियां हैं। उनके पास आय का साधन नहीं है। ऐसे में पढ़ाई अक्सर सबसे पहले छूटती है। मेरे कोशिश रहती है कि ऐसे परिवार के संपर्क में आ सकूं। उन्हें समझाकर छोटी-मोटी मदद कर बच्चियों की पढ़ाई जारी करवा सकूं। क्योंकि शिक्षा से बड़ा कोई हथियार नहीं है।

    सम्मान से बड़ा संतोष
    5 सितंबर 2025 को जब उन्हें राष्ट्रपति सम्मान मिला तो वह च्यूरानी की ही प्रतिनिधि बनकर मंच पर खड़ी थीं। लेकिन उनके लिए असली पुरस्कार क्या है? इस सवाल के जवाब में वह कहती हैं, जब मेरे गांव की कोई लड़की आत्मविश्वास से खड़ी होती है या कोई बच्चा आगे बढ़ता है वही मेरा सम्मान है।

    शायद इमारत ही रह जाएगी…

    (भावुक होकर कहती हैं) अगर हालात नहीं बदले तो दो-तीन साल में स्कूल में एक भी बच्चा नहीं बचेगा। फिर यह इमारत रह जाएगी। कमरों, कंप्यूटरों और स्मार्ट टीवी के साथ।

    ———–
    एडिटर व्यू
    च्यूरानी का यह स्कूल केवल एक सरकारी संस्थान नहीं है। यह उस विश्वास का प्रतीक है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठोर हों अगर एक शिक्षक ठान ले तो जंगल के बीच भी शिक्षा का उजाला संभव है। और शायद पहाड़ों को फिर से बसाने की शुरुआत भी यहीं से होती है। पर वह दीया जो 21 साल से जल रहा है उसकी रोशनी की कहानी कौन बताएगा?

    सच कहूं तो बच्चों को पढ़ाने के लिए हमें पैसे मिलते हैं। इसके बाद भी हम अपने पेशे के साथ ईमानदारी न बरतें तो यह पाप होगा। क्योंकि इन्हीं बच्चों की वजह से मेरे बच्चे पलते हैं। इसलिए हम शिक्षक कोई परोपकार नहीं करते हैं। बल्कि उससे कहीं ज्यादा समाज से हमें सम्मान मिल जाता है। इसलिए मेरा मानना है कि शिक्षक के काम की तुलना घंटों और पैसों से नहीं की जा सकती। जो शिक्षण पेशे में आ रहे हैं, उन्हें इन बातों को गांठ बांध लेना चाहिए।
    मंजूबाला, शिक्षिका

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