- गोविंद सिंह
Women’s Day Special : यह एक कड़वा सच है कि पृथक राज्य बनने के बाद हमारी मातृशक्ति को वह लाभ और अधिकार नहीं मिल सके, जिनकी वे हकदार थीं।इस तथ्य से शायद ही कोई असहमत हो कि संपत्ति, उत्तराधिकार, रोजगार और राजनीति जैसे क्षेत्रों में उन्हें उनका उचित ‘देय’ नहीं मिला। हालांकि, संतोषजनक और सुखद पहलू यह है कि पिछले कुछ वर्षों में यह धुंधली तस्वीर तेजी से बदल रही है। 2026 के महिला दिवस पर यह लिखते हुए मेरा मन गौरव से भर उठता है कि हमारी देवभूमि उत्तराखंड ने नारी शक्ति के उत्थान में अग्रणी भूमिका निभाई है। महिला सशक्तिकरण के इस उत्तराखंड मॉडल के पीछे कई ठोस कारण हैं।

सर्वप्रथम, मैं समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर चर्चा करना चाहूंगा। मेरा मानना है कि यह वह सशक्त कानूनी कवच है जो महिलाओं के विरुद्ध होने वाले भेदभाव और अत्याचारों से निपटने में पूरी तरह सक्षम है। उत्तराखंड में वर्ष 2022 में विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान अंतिम चरण में जब पुष्कर सिंह धामी ने यह घोषणा की कि यदि हम सत्ता में आए तो राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करवाएंगे। तब इस बात को सिर्फ चुनावी नारा समझ कर ज्यादातर लोगों ने नजरअंदाज कर दिया था। लेकिन भारी बहुमत से चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री धामी ने इस दिशा में गंभीरता से कदम बढ़ाया और उच्चतम न्यायालय की अवकाशप्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में समान नागरिक संहिता ड्राफ्ट करने के लिए एक समिति का गठन किया। तभी तय हो गया था कि संहिता की केंद्र बिंदु में महिलाएं होंगी। और इस तरह 27 जनवरी, 2025 को यह पूरी तरह से अस्तित्व में आ गया।
यद्यपि इस कानून में घर-परिवार और समाज से संबंधित कई तरह के प्रावधान हैं लेकिन मुख्य रूप से इसने उत्तराखंड में महिलाओं को एक नई तरह की आजादी प्रदान की। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के शब्दों में, ‘यह कानून महिलाओं को समानता, सुरक्षा और सशक्तीकरण की गारंटी देता है। मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक, हलाला, बहुविवाह, बाल विवाह जैसी कुरीतियों से मुक्ति प्रदान करता है। महिलाओं को उत्तराधिकार, संपत्ति में अधिकार जैसे हथियार देता है। कुल मिलाकर यहां से एक नए युग की शुरुआत हो रही है’।
इसलिए मुख्यमंत्री ने इस कमी को महसूस करते हुए इस विधेयक के बनने से लेकर लागू होने तक विशेष रूप से इस पर नजर रखी। इसलिए इस विधेयक का लाभ न सिर्फ मुस्लिम महिलाओं को मिला है, बल्कि हर धर्म की महिलाओं को मिला है। अभी भले ही ऐसा लग रहा हो, लेकिन बीस-तीस साल बाद इसके चौतरफा फायदों का पता चलेगा। समान नागरिक संहिता की ड्राफ्टिंग कमेटी की सदस्य प्रो. सुरेखा डंगवाल की एक बात आज के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे कहती हैं कि इस कानून का मूल लब्बोलुआब यह है कि यह लैंगिक आधार पर होने वाले हर भेदभाव को जड़ से समाप्त कर समाज में पूर्ण समानता स्थापित करता है। उनकी यह बात आज उत्तराखंड की हर बेटी के आत्मविश्वास में झलकती है। दरअसल, अनेक मामलों में महिलाओं को यह पता ही नहीं होता था कि उनके पतियों ने दूसरी शादी भी कर रखी है। अक्सर धार्मिक, सामाजिक रीति-रिवाजों की आड़ में ऐसा होता था। लेकिन अब विवाह के अनिवार्यतः पंजीकरण के बाद इस तरह के धोखे की संभावना अब न्यूनतम हो गई है। समान नागरिक संहिता के बाद बाल विवाह खत्म होंगे लड़कियों को पढ़ाई-लिखाई करने के मौके मिलेंगे और वे तरक्की करेंगी।
शुरुआत से ही धामी सरकार की नीतियों के केंद्र में महिला सशक्तिकरण रहा है। उत्तराखंड सरकार की योजनाएं इस बात की तस्दीक करती हैं। महिला सशक्तिकरण अब केवल कागजी घोषणाओं तक सीमित नहीं बल्कि ठोस आंकड़ों के साथ एक सफल मॉडल के रूप में उभरा है। राज्य सरकार की व्यवस्थित योजनाओं ने प्रदेश की महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी सफलता हासिल की है। आर्थिक स्वावलंबन के क्षेत्र में लखपति दीदी कार्यक्रम गेम-चेंजर साबित हुआ है। इस कार्यक्रम के जरिये 1.68 लाख से अधिक महिलाओं ने अपनी वार्षिक आय 1 लाख रुपये से अधिक करने का कीर्तिमान स्थापित किया है। वहीं, प्रदेश की लगभग 5 लाख महिलाएं करीब 70,000 स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से संगठित आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी हैं। मुख्यमंत्री एकल महिला स्वरोजगार योजना के तहत अविवाहित, तलाकशुदा, निराश्रित और दिव्यांग महिलाओं को अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए 2 लाख रुपये तक की सहायता दी जा रही है। जिसमें 75 प्रतिशत राशि सीधे अनुदान के रूप में मिल रही है।
सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का दायरा भी काफी व्यापक है। वित्तीय वर्ष 2023-24 में नंदा गौरा योजना के तहत लगभग 40,000 लड़कियों को उच्च शिक्षा और आर्थिक संबल मिला है। इसके अलावा, एकीकृत बाल विकास सेवा व पोषण योजनाओं से प्रतिमाह 1,76,919 महिलाएं, मुख्यमंत्री महालक्ष्मी योजना से 1,33,236 महिलाएं, उत्तराखंड महिला समेकित विकास योजना से 56,246 महिलाएं और राष्ट्रीय मातृत्व वंदना योजना के तहत 45,982 महिलाएं सीधे लाभान्वित हुई हैं।

शासन-प्रशासन में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने नीतिगत बदलाव किए हैं। सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण के साथ-साथ, स्थानीय निकायों और सहकारी समितियों में 33 प्रतिशत आरक्षण लागू कर महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया है। महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास मंत्री के अनुसार, यह व्यवस्थित प्रयास महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के क्षेत्र में समान अवसर प्रदान कर रहे हैं, ताकि वे राज्य और देश के विकास में निर्णायक भूमिका निभा सकें।
वर्ष 2026 का यह कालखंड उत्तराखंड की नारी शक्ति के लिए एक स्वर्ण युग की आहट है। समान नागरिक संहिता के रूप में मिला कानूनी कवच और लखपति दीदी जैसी योजनाओं से मिली आर्थिक उड़ान ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब सरकार की नीतियां महिला-केंद्रित होती हैं तो समाज का कायाकल्प निश्चित है। आज उत्तराखंड की महिलाएं न केवल अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं बल्कि वे राज्य की प्रगति की मुख्यधारा का नेतृत्व भी कर रही हैं। धामी सरकार के ये क्रांतिकारी कदम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा सुरक्षित और समतावादी मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं, जहां सशक्तिकरण केवल एक शब्द नहीं, बल्कि हर महिला के जीवन की वास्तविकता है। देवभूमि की यह नई इबारत आज पूरे देश के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन चुकी है।
(लेखक उत्तराखंड सरकार के मीडिया एडवाइजरी कमेटी के चेयरमैन हैं)









