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    उत्तराखंड 360

    मंजू शाह … पिरुल से परवाज़

    हमारा पहाड़ न जाने कितने किस्सों और कहानियों को अपनी गोद में समेटे बैठा है। यहां की वादियों में संघर्ष की गूंज है तो पगडंडियों पर प्यार और जुनून की छाप। हर कविता, हर कहानी, हर शायरी जैसे इन्हीं पहाड़ों से जन्म लेती प्रतीत होती है। ऐसी ही एक कहानी है मंजू शाह की। उत्तराखंड के कपकोट क्षेत्र के असों गांव में जन्मी मंजू का जीवन पहाड़ की कठोर चट्टानों जैसा सख्त, लेकिन भीतर से झरने जैसा निर्मल रहा है। मंजू शाह भी उसी परंपरा की एक सशक्त कड़ी हैं। जहां अभाव है पर हार नहीं। जहां जिम्मेदारियां हैं पर शिकायत नहीं। जहां संघर्ष है पर आत्मसम्मान अडिग है।
    teerandajBy teerandajMarch 8, 2026Updated:March 8, 2026No Comments
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    • अतुल्य उत्तराखंड ब्यूरो

    Women’s Day Special : पहाड़ों की ढलानों पर बिखरे सूखे चीड़ के पत्ते पिरुल आग और पर्यावरण संकट का कारण माने जाते हैं। इसी पिरुल के इस्तेमाल से हजारों महिलाओं की जिंदगी में उजाला फैलाने का काम किया है मंजू शाह ने। लोग उन्हें पिरुल वुमन भी कहते हैं। खेलने की उम्र में पिता का छाया सिर से उठ गया। माता गृहिणी थीं। परिवार पर आए संकट को छोटी सी उम्र में ही मंजू महसूस करने लगी थी। उनकी मां देवकी देवी कभी स्कूल नहीं गई थीं। पति के निधन के बाद उन्हें खेतों में मजदूरी करनी पड़ी। घर की जिम्मेदारी, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा की जरूरतों का बोझ उनके कंधों पर आ गया। मंजू उस दर्द को याद करते हुए कहती हैं, हमने पिता की मृत्यु के बाद अपनी जरूरतें कम कर दीं और संकल्प लिया कि कभी कर्ज नहीं लेंगे। बचपन अत्यंत अभावों में बीता। तभी मन में ठान लिया कि अनाथों और बुजुर्गों के लिए कुछ करूंगी।

    आज मंजू शाह का प्रयास एक आंदोलन का रूप ले चुका है। अब तक वह ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से लगभग पांच से छह हजार महिलाओं को पिरुल से विभिन्न उत्पाद बनाना सिखा चुकी हैं। इनमें से करीब ढाई से तीन हजार महिलाएं आज भी उनके नियमित संपर्क में हैं और इस काम से जुड़ी हुई हैं। शुरुआती दौर में वे केवल ऑफलाइन प्रशिक्षण देती थीं। पहाड़ों के दूरदराज गांवों में जाकर महिलाओं को पिरुल से हस्तशिल्प बनाना सिखाना आसान नहीं था। कई बार संसाधनों की कमी कई बार संपर्क साधनों की दूरी इन कारणों से बहुत सी महिलाएं बाद में उनसे जुड़ी नहीं रह सकीं। समय के साथ उन्होंने तकनीक का सहारा लिया और ऑनलाइन प्रशिक्षण भी शुरू किया, जिससे उनका दायरा और व्यापक हो गया।

    मुफ्त में मिली चीजों की कीमत नहीं होती…

    एक समय था जब मंजू शाह यह प्रशिक्षण पूरी तरह निशुल्क देती थीं। उनका उद्देश्य केवल इतना था कि अधिक से अधिक महिलाएं आत्मनिर्भर बनें। लेकिन अनुभव ने उन्हें एक महत्वपूर्ण सीख दी। वे कहती हैं मुफ्त में मिली चीज की अक्सर लोग कीमत नहीं समझते। इसी सोच के साथ उन्होंने अब प्रशिक्षण के लिए नाममात्र का शुल्क लेना शुरू किया। उनका मानना है कि जब महिलाएं कुछ निवेश करती हैं तो वे सीखने को अधिक गंभीरता से लेती हैं और उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास भी करती हैं।

    जीवन का टर्निंग प्वाइंट

    साल 2009 मंजू शाह के जीवन में एक निर्णायक मोड़ बनकर आया। एक दिन उन्होंने कहीं पराली और घास से बना एक सुंदर फ्लावर पॉट देखा। साधारण सी दिखने वाली वह वस्तु उनके भीतर असाधारण विचार जगा गई। उनके मन में प्रश्न उठा कि जब पराली का उपयोग हो सकता है तो पहाड़ों में बिखरे पड़े पिरुल को क्यों नहीं एक उपयोगी उत्पाद में बदला जा सकता? उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पिरुल अक्सर जंगलों में आग का कारण बनता है और पर्यावरण के लिए चुनौती भी। मंजू ने उसी समस्या में संभावना तलाश ली। उन्होंने अपनी चचेरी बहन पूजा से इस विचार पर चर्चा की। पूजा ने उन्हें पिरुल से कुछ हस्तशिल्प उत्पाद बनाना सिखाया। बस, यहीं से एक नई दिशा मिल गई।

    मंजू बताती हैं कि इसके बाद कई महीनों तक उनका मन केवल इसी विचार में डूबा रहा। वे लगातार नए-नए डिजाइन सोचतीं, प्रयोग करतीं और पिरुल को आकर्षक रूप देने की कोशिश करतीं। असफलताएं भी आईं, लेकिन उनका उत्साह कम नहीं हुआ। साल 2010 में उन्होंने इस सोच को जमीन पर उतारने का फैसला किया। उन्होंने बच्चों को पिरुल से हस्तशिल्प बनाना सिखाना शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी। लोगों का विश्वास जीतना और उन्हें इस अनोखे प्रयोग के लिए तैयार करना चुनौतीपूर्ण था। शुरुआती दिनों में खास प्रतिसाद नहीं मिला लेकिन मंजू का धैर्य अडिग रहा। धीरे-धीरे उनके प्रयास रंग लाने लगे। बच्चों की रुचि बढ़ी, फिर महिलाओं ने भी इस काम को सीखना शुरू किया। जब पिरुल से बने उत्पादों की बिक्री होने लगी और महिलाओं के हाथों में आय आने लगी तब मंजू शाह की पहचान एक साधारण गृहिणी से एक प्रेरक हस्तशिल्प प्रशिक्षक के रूप में बनने लगी। यहीं से उनके संघर्ष की कहानी आत्मनिर्भरता की मिसाल में बदलने लगी।

    मंजू बताती हैं, वह हरे पत्तों का उपयोग नहीं करतीं। हम केवल सूखे पत्तों का उपयोग करते हैं। हरे पत्तों से बना उत्पाद सूखने पर ढीला हो जाता है और पर्यावरण को भी नुकसान होता है। हम सूखे पत्तों को भिगोकर उनसे टोकरियां, फ्लावर पॉट, सजावटी सामान आदि बनाते हैं। उनके अनुसार इस काम में किसी मशीन की जरूरत नहीं पड़ती। सामान्य सुई या हाथ से भी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। उन्होंने महिलाओं को पिरुल से टोकरियां, टेबल मैट, राखियां, सजावटी सामान, फूलदान, गिफ्ट आइटम बनाना सिखाना शुरू किया। मंजू शाह बताती हैं,पिछले साल गीता पंत भिकियासैंण ने पिरुल राखी बनाकर 10 हजार रुपये कमाये। यह सिर्फ कमाई नहीं, आत्मविश्वास की कमाई है।

    उत्तराखंड के बाहर भी
    मंजू शाह का कार्यक्षेत्र अब केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने समय के साथ डिजिटल माध्यमों की शक्ति को समझा और उसे अपनाया। पहाड़ों की पगडंडियों से शुरू हुआ उनका सफर अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए देश के विभिन्न राज्यों तक पहुंच चुका है। तकनीक ने उनकी पहल को नई उड़ान दी। वे वीडियो कॉल और ऑनलाइन प्रशिक्षण सत्रों के माध्यम से दूर-दराज की महिलाओं को पिरुल क्राफ्ट सिखाने लगीं। इसी क्रम में शिमला की मेघा शाह, जो श्रवण बाधित हैं, उनसे जुड़ीं। संकल्प और संवाद के अपने तरीके खोजते हुए मंजू ने उन्हें ऑनलाइन पिरुल से उत्पाद बनाना सिखाया। आज मेघा न केवल सुंदर हस्तशिल्प तैयार कर रही हैं बल्कि उससे आय भी अर्जित कर रही हैं। इसके आलाव मंजू शाह ने दिल्ली की तीन महिलाओं को भी प्रशिक्षण दिया। ये महिलाएं यहां से पिरुल लेकर गईं थीं। इसके अलावा छत्तीसगढ़ और झारखंड की भी कुछ महिलाओं को उन्होंने मूंज से उत्पाद बनाना सिखाया। इस तरह उनका प्रशिक्षण केवल पिरुल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्थानीय संसाधनों के अनुसार हस्तशिल्प की विविध विधाएं भी उन्होंने साझा कीं। उनकी पहल अब एक राज्य की कहानी नहीं, बल्कि देशभर में फैलती आत्मनिर्भरता की शृंखला बन चुकी है।

    मुर्गी पालन से शुरुआत
    मंजू शाह की यात्रा पिरुल से शुरू अवश्य हुई लेकिन उसकी जड़ें उससे भी पहले के संघर्षों में थीं। उन्होंने अपने जीवन की पहली पहल मुर्गी पालन और रेशम उत्पादन इकाई से की। स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर छोटे-छोटे प्रयोग किए असफलताओं से सीखा और धीरे-धीरे आत्मविश्वास अर्जित किया। इन प्रारंभिक प्रयासों ने उन्हें यह समझा दिया था कि आत्मनिर्भरता केवल विचार से नहीं, निरंतर अभ्यास और सामूहिक सहयोग से आती है। यही अनुभव आगे चलकर उनके बड़े सामाजिक कार्य की नींव बना। उनके काम का प्रभाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक स्तर पर भी दिखाई देता है। जो महिलाएं कभी घर की चारदीवारी तक सीमित थीं वे अब समूह बैठकों में खुलकर अपनी बात रखती हैं। सामूहिक निर्णयों में भाग लेती हैं और अपने परिवार की आर्थिक योजनाओं में योगदान देती हैं। उनके भीतर आत्मसम्मान जागा है। यह विश्वास कि वे भी परिवार और समाज की दिशा बदल सकती हैं।

    परिस्थितियां चाहे जैसी हों आत्मसम्मान नहीं छोड़ना चाहिए

    अभावों ने हमें जल्दी बड़ा कर दिया। हमने जरूरतें कम कर दीं और तय किया कि कभी कर्ज नहीं लेंगे। मां ने खेतों में काम किया, मजदूरी की, लेकिन हमें पढ़ाया। उन्हीं से सीखा कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों आत्मसम्मान नहीं छोड़ना चाहिए। शुरुआत में लोग हंसते थे। कहते थे पत्तों से क्या होगा? लेकिन मैंने कुछ महिलाओं को जोड़ा, छोटे-छोटे प्रयोग किए। टोकरियां, टेबल मैट, राखियां, सजावटी सामान बनाना शुरू किया। जब पहली बार किसी महिला ने अपनी कमाई के पैसे हाथ में लिए, तब लगा कि रास्ता सही है। कमाई तो है ही लेकिन उससे बड़ा बदलाव महिलाओं के आत्मविश्वास में आया है। पहले वे घर से बाहर नहीं निकलती थीं। अब वे समूह की बैठक करती हैं। बैंक जाती हैं निर्णय लेती हैं। कई महिलाएं पहली बार अपने नाम से खाता खुलवा पाईं।

    आगे की योजना
    मैं चाहती हूं कि पिरुल क्राफ्ट एक ब्रांड बने। उत्तराखंड ही नहीं देश के अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में भी यह मॉडल लागू हो। महिलाओं के लिए बड़ा प्रशिक्षण केंद्र खोलना चाहती हूं। साथ ही अनाथ और बुजुर्गों के लिए कुछ स्थायी करना है। यह बचपन का सपना है। मेरे जीवन का मूल मंत्र है संघर्ष से डरिए मत, उसे गले लगाइए। अभाव आपको कमजोर नहीं बनाते, अगर आप उन्हें ताकत में बदल दें। पहाड़ की बेटियों से कहूंगी। अपनी क्षमता पहचानो। संसाधन बाहर नहीं आपके आसपास हैं। जरूरत है नजर बदलने की।

     

     

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