मध्य हिमालय का शंभू ग्लेशियर कभी ब्रह्मकमल मोनाल परिंदे और कीड़ा जड़ी जैसी दुर्लभ संपदाओं का खजाना था आज जलवायु परिवर्तन की भेंट चढ़ चुका है। दशकों पहले नवंबर से बर्फीली चादर ओढ़ लेने वाला यह हिमनद अब दिसंबर गुजरने के बाद भी काला दिखाई पड़ रहा है। बर्फ गायब है। सिर्फ पत्थर और स्याह पहाड़ियां ही नजर आ रही हैं। इससे निकलने वाली शंभू नदी सूख रही है। स्थानीय खेती बहुत प्रभावित हुई हैं। कुल मिलाकर जलवायु परिवर्तन का असर यहां साफ दिखाई दे रहा है। बागेश्वर जिले के अंतिम गांव बोरबलड़ा (3900 मीटर ऊंचाई) के पास स्थित यह ग्लेशियर क्षेत्रीय जल सुरक्षा का आधार कहा जाता है। ग्राम प्रधान हरिकृष्ण मीडिया से बातचीत करते हुए बताते हैं, पिछले पांच वर्षों में बर्फबारी 80 प्रतिशत घटी है साथ ही शंभू नदी का बहाव आधा रह गया है। इस कारण खेत सूखने लगे हैं। जौ-गेहूं की उपज 40 प्रतिशत कम हो गई है। राजमा की फसल भी प्रभावित हुई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर अब ने चेते तो बहुत देर हो जाएगी। ग्रामीण भी कहने लगे हैं कि सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। ऐसी नीतियां बननी चाहिए जिससे हमारे पहाड़ सुरक्षित रहें।
सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ. एसके भरतरिया के मुताबिक, ग्लोबल वार्मिंग से पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) सेंट्रल हिमालय तक नहीं पहुंच रहे। 2025 में इस क्षेत्र में औसत बर्फबारी मात्र 20 सेंटीमीटर रही जो सामान्य के मुकाबले 70 प्रतिशत कम है। वहीं, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के पूर्व हिम वैज्ञानिक डॉ. डीपी डोभाल ने बताते हैं कि एक वर्ग किलोमीटर से छोटे ग्लेशियर सबसे तेज पिघल रहे हैं। शंभू जैसे 200-300 छोटे हिमनद अगले दशक में 50 प्रतिशत सिकुड़ सकते हैं। ब्लैक कार्बन प्रदूषण और अवैध निर्माण ने पिघलने की रफ्तार तेज कर दी है। 2026 को अंतरराष्ट्रीय ग्लेशियर संरक्षण वर्ष घोषित कर चुके डॉ. डोभाल कहते हैं कि निर्माण पर रोक, हरित ऊर्जा को बढ़ावा और स्थानीय स्तर पर वनीकरण से ही कुछ बचाव हो सकता है। केंद्र-राज्य सरकारें जलवायु अनुकूल नीतियां बनाएं। ग्राम सभा ने प्रस्ताव पारित कर ग्लेशियर क्षेत्र को नो-कंस्ट्रक्शन जोन घोषित करें। यह संकट केवल शंभू तक सीमित नहीं गंगा बेसिन की जल सुरक्षा पर इसका असर पड़ेगा। इस कारण जनजीवन बुरी तरह प्रभावित होगा।

खेती पर असर
मौसम का यह अप्रत्याशित बदलाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचा रहा। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, सेब-खुबानी जैसे फल पेड़ों को 800-1000 चिलिंग आवर्स (ठंडे घंटे) चाहिए जो अब नहीं मिल रहे। फलों का आकार 30 प्रतिशत छोटा हो गया है। साथ ही स्वाद में असर दिखाई देने लगा है। बोरबलड़ा में 200 हेक्टेयर सेब बागान प्रभावित है। स्थानीय किसान लीला देवी मीडिया से बातचीत में बताती हैं, पहले सर्दी में बर्फ देखकर खुशी होती थी अब चिंता। अगर ग्लेशियर गया तो हमारा भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। 80 वर्षीय रूप सिंह बताते हैं कि चार दशक पहले ये पहाड़ियां पूरे साल बर्फ से ढकी रहती थीं। अब छिटपुट बर्फ के सिवा कुछ नहीं है। ग्रामीण आशंकित भाव से कहते हैं कि अगर यही हालात रहे तो शंभू ग्लेशियर गायब हो जाएगा। नदियां सूखेंगी, हिमालय की पारिस्थितिकी बर्बाद हो जाएगी। यहां का जीवन ही नष्ट हो जाएगा।
वैज्ञानिक आंकड़े चिंताजनक
संयुक्त राष्ट्र की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक हिमालय के 10 हजार से अधिक ग्लेशियरों में से 30 प्रतिशत पहले ही 20-25 प्रतिशत सिकुड़ चुके। भारत के सेंट्रल हिमालय में 1985-2025 के बीच बर्फ क्षेत्र 15 प्रतिशत घट चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि मानवीय कारक जैसे वाहनों से ब्लैक कार्बन बर्फ पर जमकर पिघलाव तेज कर रहा। पर्यावरण मंत्रालय के आंकड़ों में उत्तराखंड में 2025 सर्दी में हिमपात 60 प्रतिशत कम दर्ज की गई है।
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