राज्य आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक दिवाकर भट्ट हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन की खबर से पूरा उत्तराखंड शोकमय है। जिन्होंने उनके साथ समय बिताया था, उन्हें अच्छे से जानते थे, वह स्तब्ध हैं। नई पीढ़ी जिन्होंने उनके बारे में पढ़ा है वह भी दुखी है। पुराने लोग उनके किस्से सुना रहे हैं। वह अपने स्वाभाव के कारण लोगों में लोकप्रिय थे। स्वाभाव से जुझारू थे। ऐसा नहीं है उनके ऊपर आक्षेप नहीं लगे। लेकिन, उनका उन्होंने आक्रामक ढंग से जवाब दिया। युवावस्था से ही आंदोलन में सक्रिय, वे उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक सदस्य थे। राज्य आंदोलन के दौरान उनकी एक आवाज पर युवा एकत्र हो जाते थे। 2007 में देवप्रयाग से विधायक बने और राजस्व मंत्री रहे। उन्होंने सख्त भूकानून बनाने में भी भूमिका निभाई। भट्ट ने तरुण हिमालय संस्था की स्थापना की और कई आंदोलनों में भाग लिया। वे तीन बार कीर्तिनगर के ब्लॉक प्रमुख भी रहे। उन्होंने बुधवार शाम 4:20 बजे हरिद्वार के खड़खड़ी स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। पिछले दस दिनों से उनकी तबीयत अत्यंत नाजुक थी और उन्हें भोजन फूड पाइप के माध्यम से दिया जा रहा था। दिवाकर भट्ट लंबे समय से बीमार थे और लगातार उपचार ले रहे थे।

दिवाकर भट्ट के जीवन पर नजर डालें तो तो युवावस्था से ही वह राज्य आंदोलन के लिए समर्पित रहे। श्रीनगर से आइटीआइ करने के बाद वह बीएचईएल हरिद्वार में सेवायोजित हुए। वहां उन्होंने कर्मचारी नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई। इसी दौरान उन्होंने हरिद्वार में पर्वतीय वासियों को एकत्र करते हुए वर्ष 1970 में तरुण हिमालय संस्था बनाई। वर्ष 1971 में चले गढ़वाल विश्वविद्यालय आंदोलन में भी वह सड़कों पर रहे। उन्होंने 1988 में वन अधिनियम के चलते रूके हुए विकास कार्यों को लेकर भी आंदोलन किया, इसमें उनकी गिरफ्तारी भी हुई। वर्ष 1994 में जब राज्य आंदोलन तेज हुआ तो वह एक प्रमुख चेहरा रहे। नवंबर 1995 में उन्होंने श्रीनगर के श्रीयंत्र टापू और फिर दिसंबर 1995 में टिहरी खैट पर्वत पर आमरण अनशन किया। वह राजनीति में भी सक्रिय रहे और 1982 से लेकर 1996 तक तीन बार कीर्तिनगर के ब्लाक प्रमुख रहे। 1999 में वह उक्रांद के केंद्रीय अध्यक्ष रहे। यद्यपि, उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से पटरी नहीं मिली। यही कारण रहा कि उक्रांद में कई बार दो फाड़ भी हुआ। वर्ष 2007 में वह उक्रांद के टिकट पर देवप्रयाग सीट से विधानसभा चुनाव जीते और राजस्व मंत्री भी बने। वर्ष 2012 में उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन वह हार गए। इसके बाद वह भाजपा को छोड़ फिर से उक्रांद में शामिल हुए। वर्ष 2017 में वह उक्रांद के केंद्रीय अध्यक्ष बने। उक्रांद के हाशिये पर जाने का दुख उन्हें हमेशा सालता रहा।
जब बैठ गए खैट पर्वत पर

वर्ष 1995 की बात है। श्रीनगर के श्रीयंत्र टापू में चले राज्य आंदोलन में दो आंदोलनकारी बलिदान हो गए थे। इस आंदोलन का नेतृत्व दिवाकर भट्ट कर रहे थे। दस नवंबर को आंदोलनकारियों पर पुलिस बर्बरता हुई। दिवाकर भट्ट एक दिन पहले ही आंदोलनस्थल से गायब हो गए। उनकी भूमिका पर सवाल उठे तो विश्वसनीयता साबित करने के लिए वह अपनी जान पर खेल गए। आत्मघाती कदम उठा लिया और बैठ गए दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित उस खैट पर्वत पर, जिसे अछरियों यानी परियों का देश कहा जाता था। अति दुर्गम स्थान पर बैठकर उन्होंने सवाल उठाने वालों को जवाब दिया और साबित किया कि वह उत्तराखंड के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। चाहे श्रीयंत्र टापू हो या फिर खैट पर्वत, आंदोलन के लिए दिवाकर भट्ट ने ऐसे स्थानों को चुना, जहां पर बैठकर उन्होंने तत्कालीन सरकार और पुलिस-प्रशासन के पसीने छुड़ाकर रखे। दिवाकर भट्ट की आंदोलन की परिभाषा शायद सबसे अलग थी। शॉर्टकट के लिए उसमें कोई जगह नहीं थी। उत्तराखंड राज्य निर्माण के एकमेव लक्ष्य को हासिल करने के लिए वह कठोर आंदोलन के पक्षपाती थे। इसीलिए पहले श्रीयंत्र टापू और फिर खैट पर्वत जैसी दुरूह स्थिति वाली जगह को उन्होंने आंदोलन का केंद्र बनाया।
जब पुलिस प्रशासन ने उन्हें निशाने पर लेना चाहा
श्रीयंत्र टापू पर चले आंदोलन में दिवाकर भट्ट पूरे समय आक्रामक ढंग से नेतृत्व करते दिखाई दिए। अमर उजाला के लिए इस आंदोलन को कवर करते वक्त मैंने खुद उनके जिद और जुनून से भरे व्यक्तित्व को महसूस किया। इसी वजह से पुलिस प्रशासन उन्हें निशाने पर लेना चाहता था। इन मंसूबों को भांपकर ही आंदोलनकारियों के दबाव में वह पुलिस कार्रवाई से एक दिन पहले ही गायब हो गए थे। उत्तराखंड आंदोलनकारियों को तब यह अंदेशा था कि दिवाकर भट्ट की जान को पुलिस कार्रवाई के दौरान खतरा हो सकता है। श्रीयंत्र टापू आंदोलन समाप्त हो जाने के बाद दिवाकर भट्ट की खूब घेराबंदी हुई। उनकी विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठे।
दिवाकर भट्ट के साथ आंदोलन में करीबी रहे राज्य आंदोलन के प्रमुख चेहरे डॉ. एसपी सती मीडिया से बातचीत में कहते हैं, अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए दिवाकर भट्ट ने जो कदम उठाया था वह आत्मघाती था। महीने भर तक उस जगह पर आंदोलन करने की वजह से वे बेहद कमजोर हो गए थे। तब केंद्र सरकार तक भी बात पहुंच गई थी। स्थितियां संभलीं तो वह खैट पर्वत से नीचे उतरने को तैयार हुए और उनकी जान बची। डॉ. सती की दिवाकर भट्ट को लेकर एक टिप्पणी काबिलेगौर है। उनका कहना है आंदोलन में जब-जब हम लोग दिवाकर भट्ट के साथ होते थे तो उस वक्त अपने को बेहद सुरक्षित सुरक्षित महसूस करते थे। ठीक उसी तरह, जैसे घर में पिता के मौजूद रहने पर किया करते थे। कीर्तिनगर के तीन बार के ब्लॉक प्रमुख, उत्तराखंड क्रांति दल के अध्यक्ष, खंडूरी सरकार के कैबिनेट मंत्री सहित दिवाकर भट्ट की कई रूपों में पहचान रही है। मगर आंदोलन में तप कर अपने लोगों के बीच ‘फील्ड मार्शल’ की जो पहचान उन्हें मिली, वह बेजोड़ है।








