Uttarakhand के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रविवार को एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए राज्य के सभी स्कूलों में श्रीमद् भगवद्गीता के श्लोकों का पाठ अनिवार्य कर दिया। यह नियम सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूलों पर तत्काल प्रभावी होगा, जिसमें कक्षा 6 से 12 तक के छात्र शामिल हैं। सरकार का उद्देश्य छात्रों को भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और जीवन दर्शन से जोड़ना है, ताकि उनका सर्वांगीण विकास हो सके। सीएम धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट साझा करते हुए कहा, हमारी सरकार ने राज्य के स्कूलों में गीता के श्लोकों का पाठ अनिवार्य किया है। यह पहल छात्रों को भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और जीवन दर्शन से जोड़कर उनके सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त कर रही है। यह घोषणा राज्य में सांस्कृतिक शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
इससे पहले जुलाई 2025 में उत्तराखंड शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूलों में प्रार्थना सभा के दौरान गीता श्लोकों का पाठ शुरू करने का आदेश जारी किया था। अब इसे पूर्ण रूप से अनिवार्य बनाया गया है। नए निर्देशों के अनुसार, रोजाना एक श्लोक का पाठ संस्कृत शिक्षकों द्वारा कराया जाएगा। श्लोक का अर्थ, संदेश और वैज्ञानिक प्रासंगिकता छात्रों को समझाई जाएगी। साथ ही, हर सप्ताह एक श्लोक चुनकर स्कूल के नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित किया जाएगा। छात्रों से फीडबैक लेने की व्यवस्था भी अनिवार्य होगी, ताकि वे श्लोकों से जुड़ सकें।
शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह पहल गीता के जीवनोपयोगी ज्ञान को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास है। गीता में निहित कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग के सिद्धांत आधुनिक जीवन की चुनौतियों से निपटने में सहायक सिद्ध होंगे। सरकारी स्कूलों में संस्कृत शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विभाग विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहा है। निजी स्कूलों को भी समान निर्देश जारी किए गए हैं, हालांकि उनका पालन सुनिश्चित करने के लिए अलग से निगरानी समिति गठित की जा सकती है।

मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि यह कदम उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और मूल्य-आधारित शिक्षा प्रदान करने का हिस्सा है। राज्य सरकार पहले भी स्कूलों में योग, वंदे मातरम और पर्यावरण जागरूकता जैसे कार्यक्रम चला चुकी है। गीता पाठ को इसी श्रृंखला का विस्तार बताया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे छात्रों में अनुशासन, एकाग्रता और नैतिकता का विकास होगा।
उदाहरण के लिए, गीता का प्रसिद्ध श्लोक ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ छात्रों को कर्तव्यनिष्ठा सिखाएगा। हालांकि, इस फैसले पर विपक्ष ने तीखी आलोचना की है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे धार्मिक प्रचार का प्रयास बताते हुए आपत्ति जताई। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि शिक्षा का सांस्कृतिकरण ठीक है, लेकिन किसी एक ग्रंथ को अनिवार्य बनाना संविधान की धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है। विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए चुनौती देने की चेतावनी दी। शिक्षा विशेषज्ञों ने भी सुझाव दिया कि अन्य धर्मों के ग्रंथों को भी शामिल किया जाए ताकि विविधता बनी रहे। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह पाठ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि साहित्यिक और दार्शनिक शिक्षा का माध्यम है। शिक्षा मंत्री डॉ. धर्मपाल सिंह ने कहा कि गीता विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त ग्रंथ है, जिसकी वैश्विक प्रासंगिकता है। अमेरिका और यूरोप के कई स्कूलों में भी इसे पढ़ाया जाता है। राज्य में कुल 20,000 से अधिक स्कूलों में यह नियम लागू होगा, जिसमें 15 लाख से ज्यादा छात्र प्रभावित होंगे।










