उत्तर प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी में सोमवार को उस समय प्रशासनिक भूकंप आ गया जब बरेली सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा देकर सीधे सत्ता के शिखर को चुनौती दे डाली। गणतंत्र दिवस के अवसर पर जहां पूरा अमला ध्वजारोहण की रस्म अदायगी में व्यस्त था वहीं 2019 बैच के इस पीसीएस अधिकारी ने सात पन्नों का वह विस्फोटक इस्तीफा शासन को भेजा, जिसने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक की नींद उड़ा दी है। यह महज एक त्यागपत्र नहीं बल्कि वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ एक राजपत्रित अधिकारी का खुला विद्रोह है। अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पत्र में लिखा कि आज देश और प्रदेश में न जनतंत्र बचा है और न ही गणतंत्र, बल्कि हर तरफ भ्रमतंत्र का बोलबाला है। उन्होंने सत्ताधारी दल पर निशाना साधते हुए उसे विदेशी जनता पार्टी तक कह डाला। एक प्रशासनिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा सरकार की नियत और राष्ट्रवाद पर इस तरह का प्रहार यूपी के इतिहास में विरला ही देखने को मिलता है।

अग्निहोत्री ने आरोप लगाया कि मौनी अमावस्या के पावन स्नान के दौरान ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों के साथ पुलिस प्रशासन ने गुंडों जैसा व्यवहार किया। उन्होंने लिखा, जब वृद्ध आचार्यों को पीटा जा रहा था और बटुक ब्राह्मणों की शिखा (चोटी) पकड़कर उन्हें जमीन पर घसीटा जा रहा था तब प्रशासन मौन था। शिखा ब्राह्मण और साधु-संतों की अस्मिता का केंद्र है।एक ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के नाते मैं संतों का यह अपमान अपनी आंखों से देखकर पद पर बने रहने का पाप नहीं कर सकता। उन्होंने सीधा आरोप मढ़ा कि वर्तमान सरकार ब्राह्मण विरोधी मानसिकता से ग्रस्त हो चुकी है।

सड़क पर मजिस्ट्रेट, पोस्टर ने बढ़ाई बेचैनी
अग्निहोत्री केवल कागजों तक सीमित नहीं रहे। इस्तीफे के साथ ही उनकी एक तस्वीर ने सोशल मीडिया के तापमान को बढ़ा दिया है। वह हाथ एक पोस्टर थामे हुए हैं जिस पर लिखा है। काला कानून वापस लो। उन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए बदलावों को शिक्षा का गला घोंटने वाला बताते हुए सरकार को छात्र विरोधी करार दिया। एक सिटिंग सिटी मजिस्ट्रेट का इस तरह बागी हो जाना मुख्यमंत्री कार्यालय के लिए बड़ी सिरदर्दी बन गया है। शासन के वरिष्ठ अधिकारी इस पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं क्योंकि मामला सीधे धर्म और ब्राह्मण अस्मिता से जुड़ा है। जानकारों का मानना है कि अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा देकर खुद को एक अधिकारी से शहीद की छवि में बदल लिया है जिससे उन पर कोई भी अनुशासनात्मक कार्रवाई अब सरकार के लिए उल्टे पैर पड़ने जैसी होगी।
शंकराचार्य…क्या है मामला
18 जनवरी को मौनी अमावस्या के मुख्य स्नान पर्व के दौरान माघ मेला क्षेत्र में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच गंभीर विवाद उत्पन्न हो गया। शंकराचार्य अपनी परंपरागत पालकी और शिष्यों के साथ संगम नोज की ओर जा रहे थे। जिसे पुलिस एवं मेला प्रशासन ने भीड़ नियंत्रण और नो-व्हीकल जोन का हवाला देकर रोक दिया। उन्हें पैदल जाने का सुझाव दिया गया। इस पर शंकराचार्य के शिष्यों ने इसे धार्मिक परंपरा और प्रोटोकॉल का अपमान बताते हुए विरोध किया। आरोप है कि इस दौरान पुलिस और शिष्यों के बीच धक्कामुक्की हुई तथा पुलिस ने बल प्रयोग किया। वृद्ध आचार्यों और बटुक ब्राह्मणों के साथ मारपीट और उनकी शिखा पकड़कर घसीटने जैसे आरोप लगाए गए, जिससे संत समाज में भारी आक्रोश फैल गया। यह विवाद अब धार्मिक मुद्दे से आगे बढ़कर यूपी की ब्यूरोक्रेसी और ब्राह्मण राजनीति से भी जुड़ गया है।
जानें यूजीसी प्रकरण क्या है ?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए भेदभाव-निवारण और शिकायत नियमों को लेकर देशभर में विवाद गहराता जा रहा है। इन नियमों में पीड़ित की परिभाषा को लेकर सबसे ज्यादा आपत्ति सामने आई है। आरोप है कि नियमों में पीड़ित के रूप में मुख्य रूप से एससी, एसटी और ओबीसी, अल्पसंख्यक, महिला और अन्य वंचित वर्गों को शामिल किया गया है जबकि सामान्य (सवर्ण) वर्ग का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। विरोध करने वालों का कहना है कि भेदभाव किसी भी वर्ग के साथ हो सकता है लेकिन यदि शिकायत व्यवस्था में सभी को समान रूप से पीड़ित नहीं माना जाएगा, तो न्याय की प्रक्रिया एकतरफा हो जाएगी। यूजीसी का पक्ष है कि ये नियम ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं न कि किसी को बाहर करने के उद्देश्य से। इस विवाद के साथ ही यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षा में किए गए अन्य बदलाव भी आलोचनाओं के घेरे में हैं। सवर्ण वर्ग का कहना है कि यूजीसी के नए नियम उनके लिए आरक्षण का मुद्दा नहीं बल्कि समान अवसर और सुरक्षा का सवाल हैं। उनका तर्क है कि भेदभाव निवारण नियमों में पीड़ित की परिभाषा से सामान्य वर्ग का स्पष्ट उल्लेख न होना असमान न्याय की स्थिति पैदा करता है।








