सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इच्छामृत्यु से जुड़े एक अहम मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पहली बार किसी मरीज को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दी है। अदालत का यह फैसला गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा के मामले में आया, जो एक इमारत से गिरने के बाद पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में हैं और जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे जीवित हैं। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने हरीश राणा के माता-पिता की उस अपील को स्वीकार कर लिया, जिसमें उन्होंने बेटे को कृत्रिम रूप से जीवित रखने वाली चिकित्सा प्रणालियों को हटाने की अनुमति मांगी थी।
पीठ ने एम्स को राणा को उपशामक देखभाल इकाई में भर्ती करने का निर्देश दिया, ताकि चिकित्सा उपचार बंद किया जा सके। पीठ ने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उपचार बंद करने की प्रक्रिया एक सुनियोजित योजना के साथ हो ताकि राणा की गरिमा बनी रहे। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 31 वर्षीय युवक के माता-पिता से मिलने की इच्छा व्यक्त की थी। कोर्ट ने एम्स-दिल्ली के डॉक्टरों के एक द्वितीयक मेडिकल बोर्ड द्वारा तैयार की गई राणा की मेडिकल हिस्ट्री वाली रिपोर्ट का अध्ययन किया था और टिप्पणी की थी कि यह एक दुखद रिपोर्ट है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लिया यह फैसला?
प्राथमिक चिकित्सा समिति ने मरीज की हालत की जांच करने के बाद उसके ठीक होने की संभावना नगण्य होने पर जोर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर को कहा था कि प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, उस व्यक्ति की हालत दयनीय है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2023 में जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, कोमा में पड़े मरीज के लिए कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने के संबंध में विशेषज्ञ की राय लेने के लिए एक प्राथमिक और एक द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड का गठन करना होगा। अदालत के इस फैसले के बाद देश में इच्छामृत्यु को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

इच्छामृत्यु का अर्थ क्या है?
इच्छामृत्यु का अर्थ है किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन को समाप्त करना जो असाध्य बीमारी या अत्यधिक शारीरिक पीड़ा से गुजर रहा हो और जिसके ठीक होने की कोई संभावना न हो। इसका मूल उद्देश्य पीड़ित व्यक्ति को असहनीय दर्द और कष्ट से मुक्ति दिलाना होता है। चिकित्सा और कानून की भाषा में इच्छामृत्यु को दो रूपों में समझा जाता है सक्रिय और निष्क्रिय।
सक्रिय इच्छामृत्यु में मरीज की मृत्यु के लिए सीधे तौर पर कोई कदम उठाया जाता है, जैसे घातक इंजेक्शन देना या ऐसी दवा देना जिससे व्यक्ति कुछ ही समय में दर्द रहित मृत्यु को प्राप्त हो जाए। वहीं निष्क्रिय इच्छामृत्यु में डॉक्टर मरीज को मारने के लिए कोई सक्रिय कदम नहीं उठाते, बल्कि जीवन को बनाए रखने वाले उपचार या उपकरणों को हटा दिया जाता है। इसमें वेंटिलेटर, कृत्रिम फीडिंग या अन्य जीवन रक्षक प्रणालियों को बंद कर दिया जाता है जिससे मरीज प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त करता है। सुप्रीम कोर्ट ने जिस रूप को मंजूरी दी है, वह यही निष्क्रिय इच्छामृत्यु है।
इच्छामृत्यु की अवधारणा नई नहीं
इतिहास में इसके संकेत प्राचीन सभ्यताओं तक मिलते हैं। यूनानी महाकाव्य इलियड में युद्ध में घायल सैनिकों द्वारा दर्द से मुक्ति के लिए मृत्यु की कामना का उल्लेख मिलता है। यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने भी अपनी प्रसिद्ध कृति रिपब्लिक में असाध्य रोगियों के लिए इच्छामृत्यु के विचार का समर्थन किया था। हालांकि प्राचीन चिकित्सा परंपरा में ली जाने वाली हिप्पोक्रेटिक शपथ में डॉक्टरों को किसी भी परिस्थिति में मरीज को घातक दवा न देने की बात कही गई, जिससे सक्रिय इच्छामृत्यु के प्रति विरोध का आधार बना। भारतीय परंपरा में भी स्वेच्छा से जीवन त्यागने की अवधारणा का उल्लेख मिलता है। हिंदू ग्रंथों में प्रायोपवेश का वर्णन है, जिसमें तपस्वी या संत उपवास के माध्यम से जीवन त्यागने का निर्णय लेते थे। महाभारत में भी इस प्रकार की परंपरा का जिक्र मिलता है। मध्यकाल में धर्मों के प्रभाव के कारण इच्छामृत्यु के प्रति कड़ा विरोध देखने को मिला। ईसाई धर्म के कई प्रमुख विचारकों ने इसे हत्या के समान माना और ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध बताया। इस्लाम में भी सक्रिय इच्छामृत्यु को स्वीकार नहीं किया गया, हालांकि कुछ परिस्थितियों में जीवन रक्षक उपचार को हटाने की अनुमति का उल्लेख मिलता है। आधुनिक काल में चिकित्सा विज्ञान के विकास के साथ इच्छामृत्यु पर बहस फिर तेज हुई। 19वीं सदी में कई चिकित्सकों ने अंतिम अवस्था के मरीजों को दर्द से मुक्ति दिलाने के लिए विशेष दवाओं के उपयोग का सुझाव दिया। हालांकि 20वीं सदी में नाजी जर्मनी द्वारा इच्छामृत्यु की अवधारणा के दुरुपयोग ने इस विषय को बेहद संवेदनशील बना दिया। नाजियों ने तथाकथित रूप से अयोग्य लोगों को खत्म करने के लिए इस विचार का इस्तेमाल किया, जिसके बाद दुनिया में इसके प्रति गहरी आशंका पैदा हो गई।

दुनिया में कुछ देशों में अनुमति
समय के साथ कई देशों ने सख्त नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं के साथ इच्छामृत्यु या सहायता प्राप्त मृत्यु को मान्यता दी है। नीदरलैंड और बेल्जियम जैसे देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु कानूनी है, जबकि कनाडा में मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग कार्यक्रम के तहत डॉक्टरों की मदद से मृत्यु की अनुमति दी जाती है। स्विट्जरलैंड में लंबे समय से सहायता प्राप्त आत्महत्या की अनुमति है। अमेरिका के कुछ राज्यों में भी सीमित परिस्थितियों में इसे वैध माना गया है।
इसके विपरीत दुनिया के कई देशों में इच्छामृत्यु पर अब भी सख्त प्रतिबंध है। विशेष रूप से कई इस्लामी देशों में धार्मिक आधार पर इसे पूरी तरह अवैध माना जाता है। वहीं ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं है और वहां गंभीर रोगियों के लिए बेहतर देखभाल तथा दर्द से राहत देने वाली चिकित्सा व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती है। भारत में भी इच्छामृत्यु का मुद्दा लंबे समय से कानूनी और नैतिक बहस का विषय रहा है। अदालतों के सामने पहले भी कई मामले आए, लेकिन अधिकांश मामलों में इसे अनुमति नहीं दी गई। अदालतों का तर्क था कि संविधान जीवन के अधिकार की रक्षा करता है और किसी व्यक्ति के जीवन को समाप्त करने की अनुमति देना जटिल संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है। ताजा फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि अत्यंत विशेष परिस्थितियों में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मानवीय दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में इच्छामृत्यु से जुड़े स्पष्ट कानून और दिशा-निर्देशों पर नई बहस को जन्म दे सकता है।









