- अतुल्य उत्तराखंड ब्यूरो
‘धुरंधर धामी’ …कुछ समय पहले आई यह टिप्पणी किसी केंद्रीय मंत्री के भाषण का हिस्सा भर नहीं थी, यह चार साल के राजनीतिक प्रदर्शन का सार था। राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में धुरंधर वह नेता होता है जो समय की नब्ज को समझे, बदलती परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखे और अपनी पकड़ लगातार मजबूत करता चले। अगर इसी कसौटी पर पुष्कर सिंह धामी का मूल्यांकन किया जाए, तो वे इस पर खरे उतरते नजर आते हैं। उत्तराखंड में लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा होना अपवाद है। इसी अनिश्चितता के बीच जुलाई 2021 में एक युवा चेहरे का सत्ता के शीर्ष पर आगमन हुआ – पुष्कर सिंह धामी। उन्हें ‘ट्रांजिशन सीएम’ कहा गया यानी संक्रमण काल का नेतृत्व। आलोचकों का मानना था कि चुनाव से ऐन पहले कमान संभालना उनके लिए चुनौतीपूर्ण होगा लेकिन पिछले चार वर्षों ने इन तमाम आशंकाओं को काफी हद तक गलत साबित किया है। आज धामी राज्य के सबसे स्थिर नेतृत्व के रूप में स्थापित हो चुके हैं।
मोदी-धामी बांडिंगः बार-बार उत्तराखंड दौरे
धामी कार्यकाल का एक अहम राजनीतिक संकेत रहा है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार उत्तराखंड दौरा। केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम में चल रहे पुनर्विकास कार्य, पिथौरागढ़ में आदि कैलाश के दर्शन, पार्वती कुंड में पूजा, ‘मानसखंड मंदिर माला मिशन’ के तहत जागेश्वर धाम का दौरा, इन सबने धार्मिक पर्यटन को नई पहचान दी।वहीं हर्षिल–मुखबा जैसे सीमांत क्षेत्रों में जाकर विंटर टूरिज्म को बढ़ावा देना, देहरादून-दिल्ली एक्सप्रेसवे जैसे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स और ग्लोबल इनवेस्टर समिट के जरिए राज्य को ‘धार्मिक पर्यटन’ से आगे ‘इनवेस्टमेंट डेस्टिनेशन’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश, इन दौरों ने विकास के बहुआयामी पक्ष को सामने रखा है। प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों के लगातार दौरों ने दो संकेत स्पष्ट दिए, पहला- केंद्र का राज्य पर विशेष फोकस है और दूसरा – धामी के नेतृत्व पर पार्टी को पूरा भरोसा है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह ‘सिंक्रोनाइज्ड गवर्नेंस’ का मॉडल है, जहां राज्य और केंद्र एक ही नैरेटिव पर चलते दिखते हैं।
‘उत्तराखंड आज तेजी से विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है… कनेक्टिविटी, पर्यटन और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित हो रहे हैं।’ – नरेंद्र मोदी, धामी सरकार के चार साल पूरे होने पर
पुष्कर धामी को सिर्फ धाकड़ धामी नहीं, बल्कि धुरंधर धामी कहा जाना चाहिए। उन्होंने धुआंधार काम किया है।
– राजनाथ सिंह, 21 मार्च 2026नो पेंडेंसी…प्रो-एक्टिव गवर्नेंस का मंत्र
धामी ने सत्ता संभालते ही ‘नो पेंडेंसी और प्रो-एक्टिव गवर्नेंस’ का मंत्र दिया। उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि वे कभी भी राजनीतिक अटकलों से विचलित नहीं हुए। चाहे वह भीतरघात की चर्चाएं हों या विपक्ष के हमले, धामी का ध्यान केवल अपने फैसलों और उनके क्रियान्वयन पर केंद्रित रहा। यही कारण है कि आज वह प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के सबसे भरोसेमंद मुख्यमंत्रियों में गिने जाते हैं।
फैसलों की राजनीति: रिस्क और रिवॉर्ड

यूसीसीः धामी की राजनीति की सबसे बड़ी पहचान उनकी निर्णय क्षमता है। उन्होंने समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी जैसे भाजपा और आरएसएस के कोर मुद्दे को उत्तराखंड में लागू करने का साहस दिखाया। इसे लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ी, लेकिन धामी ने इसे विशेषज्ञों की समिति बनाकर और व्यापक जन-संवाद के जरिए एक कानूनी ढांचा तैयार किया। उत्तराखंड को यूसीसी की प्रयोगशाला के रूप में स्थापित करके यह संदेश दिया कि वे भविष्य की राजनीति के लिए तैयार हैं। नकल विरोधी कानून: राज्य में वर्षों से चले आ रहे भर्ती घोटालों के सिंडीकेट को ध्वस्त करना आसान नहीं था। इसमें रसूखदार लोग शामिल थे। लेकिन पुष्कर सिंह धामी ने देश का सबसे कठोर नकल विरोधी कानून लागू किया जिसमें उम्रकैद और भारी जुर्माने जैसे कड़े प्रावधान किए गए। यह फैसला सीधे तौर पर राज्य की अगली पीढ़ी से जुड़ने का एक सफल प्रयास साबित हुआ। उन्होंने युवाओं के बीच जाकर साफ कहा, मैं आपके हितों के लिए अपना सिर झुका भी सकता हूं और कटा भी सकता हूं। यह भावनात्मक जुड़ाव युवाओं के बीच उनके प्रति अटूट विश्वास पैदा करने में सफल रहा है।
लैंड जिहाद पर सीधा वार: पुष्कर धामी ने लैंड जिहाद जैसे मुद्दों पर बेझिझक कड़ा रुख अपनाया और सरकारी जमीनों पर हुए अवैध अतिक्रमणों को हटाने के लिए व्यापक अभियान चलाया। इसके साथ ही, मंदिर माला मिशन और मानसखंड मंदिर माला जैसी परियोजनाओं के जरिए उन्होंने राज्य की धार्मिक पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा दी। इन कदमों ने न केवल उनके कोर वोटर बेस को मजबूत किया बल्कि राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता को लेकर उनकी वैचारिक स्पष्टता को भी जगजाहिर किया।
महिलाओं को प्राथमिकताः राजनीति में अक्सर उन्हीं नेताओं को लंबी पारी खेलने का अवसर मिलता है जो भविष्य की जरूरतों को समझते हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने चार वर्षों के कार्यकाल में महिला शक्ति और युवा विजन को केवल चुनावी नारा नहीं रहने दिया बल्कि उन्हें अपनी शासन व्यवस्था की धुरी बना दिया है। उत्तराखंड की भौगोलिक और सामाजिक संरचना में महिलाएं हमेशा से राज्य की रीढ़ रही हैं। धामी ने इसे बखूबी समझा और उनके लिए सरकारी नौकरी में 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का ऐतिहासिक कानून लागू किया। इसके साथ ही, मुख्यमंत्री एकल महिला स्वरोजगार योजना के माध्यम से विधवा, परित्यक्ता और तलाकशुदा महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए सीधे उनके खातों में करोड़ों रुपये की धनराशि पहुंचाई गई है। लखपति दीदी योजना के तहत राज्य की 1.68 लाख से अधिक महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त हो चुकी हैं। यह सीधे तौर पर एक ऐसे बड़े वोट बैंक को प्रभावित करता है जो जाति और पार्टी से ऊपर उठकर वोट देता है।

सियासी सफर और टर्निंग प्वाइंट
धामी के सियासी सफर का सबसे नाटकीय मोड़ 2022 के विधानसभा चुनाव रहा। उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में यह एक ऐतिहासिक क्षण था जब भाजपा ने अपनी सत्ता बरकरार रखी और एक बार कांग्रेस-एक बार भाजपा सरकार की पुरानी रवायत को तोड़ दिया। हालांकि, इस जीत की पटकथा लिखने वाले धामी खुद अपनी पारंपरिक सीट खटीमा से चुनाव हार गए। इस हार ने विरोधियों को ये बोलने का मौका दे दिया कि धामी की कहानी इतनी ही थी । …पर विरोधियों को यह आभास नहीं था कि उनकी राजनीति का असल दौर शुरू अब शुरू होने वाला है। प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय नेतृत्व ने उन पर जो भरोसा जताया वह अभूतपूर्व था। सीट हारने के बावजूद उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया, जो इस बात का संकेत था कि केंद्रीय नेतृत्व को धामी की सहालियत पर पूरा भरोसा है।
अटकलों के साथ स्थिरता
पुष्कर सिंह धामी का कार्यकाल अनिश्चितताओं के बनाए गए माहौल और नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों के बीच बीता। कैबिनेट विस्तार में हो रही देरी को मुख्यमंत्री की कमजोर पकड़ के तौर पर पेश करने की कोशिश हुई। धामी के हर दिल्ली दौरे पर मीडिया और सियासी टिप्पणीकारों की नजरें टिक जाती थीं और एक ही सवाल बार-बार हवा में उछाल दिया जाता, क्या धामी को बदल दिया जाएगा? हालांकि वह कभी इसे लेकर विचलित नहीं हुए। अनिश्चितता के बनाए गए माहौल के बावजूद धामी का पद पर बने रहना और अपनी स्थिति को पहले से अधिक मजबूत कर लेना राजनीति के विश्लेषण का दिलचस्प विषय है। चुनावी वर्ष में कैबिनेट के रिक्त पदों को भर उन्होंने अपनी सियासी मजबूती भी दिखा दी है। सोचने वाली बात है …आखिर क्या कारण थे कि तमाम दबावों और विरोधियों की सक्रियता के बावजूद धामी का विकल्प नहीं तलाशा गया? इसका एक ही कारण नजर आता है, केंद्र का उन पर अटूट भरोसा। प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के लिए धामी केवल मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि उनके विजन को धरातल पर उतारने वाले वफादार सिपाही हैं।
‘उत्तराखंड को बनाने का काम अटल जी ने किया था और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे मजबूत और विकसित करने का काम कर रहे हैं… धामी सरकार के चार साल निर्माण और विकास के साल रहे हैं। – अमित शाह, केंद्रीय गृह मंत्री, धामी सरकार के चार साल पूरे होने पर दूसरा महत्वपूर्ण पहलू संगठन के भीतर संतुलन बनाए रखना भी रहा। धामी ने अपनी सौम्य छवि और सबको साथ लेकर चलने की नीति से पार्टी के भीतर किसी बड़े विद्रोह की स्थिति पैदा नहीं होने दी। उन्होंने सत्ता के केंद्र को कभी भी पावर गेम का अखाड़ा नहीं बनने दिया। तीसरी बड़ी वजह यह रही कि उनके कार्यकाल में कोई बड़ा राजनीतिक विवाद पैदा नहीं हुआ जिसने सरकार की छवि को धूमिल किया हो। यद्यपि कुछ प्रशासनिक चुनौतियां आईं लेकिन धामी ने हर बार नैतिक जिम्मेदारी और त्वरित कार्रवाई (जैसे भर्ती घोटालों में कठोर कदम) से विपक्ष के हमलों की धार कुंद कर दी। उन्होंने खुद को एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जो ‘वॉक द टॉक’ की नीति रखता है।
फर्स्ट रिस्पांडर की छवि

कुदरती आपदा झेलने वाले उत्तराखंड में धामी ने अपनी ‘फर्स्ट रिस्पांडर’ की छवि बनाई है। सिलक्यारा टनल हादसे से दिखा संवेदनशील मुख्यमंत्री का रूप धराली से पौड़ी, थराली, स्यानाचट्टी और राज्य के आपदा प्रभावित कई हिस्सों में सामने आया। सीएम धामी ने बड़ी आपदाओं के बाद खुद मौके पर जाकर मोर्चा संभाला।
बिखरा विपक्ष बनाम मजबूत नेतृत्व
2027 के सियासी संग्राम की ओर बढ़ रहे उत्तराखंड में इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ‘एकजुटता’ के संकट से जूझ रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता हरीश रावत की ‘ऑन एंड ऑफ’ सक्रियता, अपने करीबियों के पक्ष में माहौल बनाने तक सीमित हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल वरिष्ठों की खींचतान और संगठनात्मक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। वहीं पुष्कर सिंह धामी ‘धुरंधर’ की छवि और समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून और अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई, चारधाम में विकास कार्यों, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद सिपाही जैसे मजबूत नैरेटिव के साथ खड़े नजर आ रहे हैं।
…मगर चुनौतियां भी बरकरार
पलायन से खाली होते गांवों में वापसी की ठोस रणनीति, स्थानीय युवाओं के लिए स्थायी रोजगार के अवसर, शिक्षा और स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर में जमीनी सुधार, दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों में सुलभ और भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवाएं, बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष का दीर्घकालिक समाधान, पहाड़-मैदान के बीच आर्थिक संतुलन और जंगलों की आग की प्रभावी रोकथाम, ये वे मुद्दे हैं जिन्हें अब सीधे संबोधित करना होगा। पिछले चार वर्षों ने एक बात साफ कर दी है, यह नेतृत्व अस्थायी नहीं, निर्णायक है। धामी ने अपनी राजनीतिक स्थिति को न सिर्फ बचाया, बल्कि मजबूत भी किया है। लेकिन किसी भी शासन की असली ताकत केवल उसकी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसकी अधूरी चुनौतियों से निपटने की क्षमता में होती है। पलायन, पर्यावरणीय संतुलन, क्षेत्रीय असमानता और बुनियादी सुविधाओं तक समान पहुंच, ये वे मुद्दे हैं जो आने वाले समय में इस नेतृत्व की वास्तविक दिशा तय करेंगे। क्योंकि ‘धुरंधर’ होना केवल छवि नहीं, बल्कि हर चुनौती के बीच संतुलन बनाने की निरंतर क्षमता है।











