Author: Arjun Singh Rawat

पत्रकारिता का लंबा करियर। एजेंसी,टीवी, अखबार, मैग्जीन, रेडियो और डिजिटल मीडिया का अनुभव। राष्ट्रीय मीडिया में 15 साल काम करने के बाद पहाड़ों का रुख। पहाड़ के मुद्दों पर खुलकर बोलने का दम। जमीन पर काम करने का जज़्बा और जुनून आज भी वैसा ही, जैसा पहले दिन था।

अतुल्य उत्तराखंड के लिए अर्जुन रावत बात जून 2024 की है। ऋषिकेश एम्स के लंबे गलियारे में बैठे बागेश्वर के नरेंद्र सिंह गहरी उलझन में डूबे थे। सामने कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझती उनकी भाभी जिंदगी और मौत के बीच लड़ रही थीं। घर की जिम्मेदारी पूरी तरह नरेंद्र के कंधों पर थी, भाई पहले से ही विकलांग थे। डॉक्टरों ने इलाज के लिए करीब एक लाख रुपये का खर्च बताया, लेकिन नरेंद्र के पास इतने पैसे नहीं थे। उस मुश्किल घड़ी में उनके पास सिर्फ एक ही सहारा था घर के छोटे से गोठ में पल रही उनकी…

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शीतलाखेत मॉडल की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी है, यह आग बुझाने का नहीं, आग लगने की प्रक्रिया को ही रोकने का तरीका है। वर्षों तक चर्चा में रहने, सरकार से लेकर हाईकोर्ट तक इस मॉडल को सराहना मिलने के बावजूद यह मॉडल अभी तक व्यापक स्तर पर लागू नहीं हो पाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद इस मॉडल को प्रदेश स्तर पर लागू करने की बात कह चुके हैं। सवाल सीधा है, जब समाधान सामने है, तो उसे अपनाने में देरी क्यों? उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि केवल सरकारी तंत्र के भरोसे जंगलों की आग पर…

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13 जून 2024… दोपहर की तपती खामोशी। जंगल शांत था। फायर वाचर कैलाश भट्ट अपनी सुबह की गश्त पूरी कर चुके थे। सब कुछ सामान्य था, हर दिन की तरह। लेकिन दोपहर बाद एक फोन कॉल ने सब बदल दिया। ‘जंगल में आग लग गई है…’ कुछ ही मिनटों में कैलाश और उनके सात साथी बोलेरो में सवार होकर घटनास्थल की ओर निकल पड़े। दूर आसमान में उठता धुआं साफ दिख रहा था और हर गुजरते मिनट के साथ गाढ़ा होता जा रहा था। मौके पर पहुंचने से पहले ही हालात भयावह हो चुके थे। हवा के साथ आग बेकाबू…

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अतुल्य उत्तराखंड के लिए ईश्वरी दत्त जोशी/अर्जुन रावत उत्तराखंड के जंगलों का सालभर जलना अब एक खतरनाक ट्रेंड बन चुका है। कभी मौसमी रही वनाग्नि अब बार-बार लौटने वाली आपदा का रूप ले चुकी है। आधिकारिक आकलनों के अनुसार आग लगने की 90 से 98% तक की घटनाएं मानवजनित हैं, जबकि शेष मामलों में असामाजिक तत्वों की भूमिका मानी जाती है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि अगर 98% घटनाएं मानवजनित हैं तो जवाबदेही तय क्यों नहीं होती? अगर लोग जिम्मेदार हैं तो उन्हें समाधान का हिस्सा बनाने के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं सवाल – क्या ‘लापरवाही’ कह…

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उत्तराखंड के जंगल हर साल जलते हैं। यह जुमला अब एक आदत बन चुका है, ऐसी आदत, जिसे हमने खामोशी से स्वीकार कर लिया है। फरवरी से जून के बीच धुआं उठता है, आग फैलती है, कुछ दिनों तक चिंता होती है, फिर बारिश आती है और हम मान लेते हैं, सब कुछ सामान्य हो गया। लेकिन क्या सच में सब कुछ सामान्य है? इस अंक की कवर स्टोरी ‘जब जंगल रोते हैं…’ सिर्फ एक पर्यावरणीय संकट की कहानी नहीं है। यह उस खामोशी को तोड़ने की कोशिश है, जिसमें हम हर साल इस त्रासदी को देखते हैं, पर समझने से…

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Dehradun में आपराधिक तत्व इतने बेखौफ हो गए हैं कि ओवरटेकिंग को लेकर हुए मामूली विवाद में भी सरेआम फायरिंग होने लगी है। मसूरी रोड पर मालसी के पास सुबह करीब 6.50 बजे हुई फायरिंग में मॉर्निंग वॉक पर निकले सेना के एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर को गोली लग गई। उनकी पहचान जाखन निवासी 70 साल के ब्रिगेडियर वीके जोशी (रिटा.) के रूप में हुई है। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन बाद में उनकी मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक सुबह मसूरी रोड पर मालसी के पास दिल्ली नंबर की फॉर्च्यूनर और स्कॉर्पियो कार सवारों के बीच गाड़ी को…

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उत्तराखंड में चल रही प्री-SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) में 85% मतदाताओं की मैपिंग पूरी कर ली गई है। पहली अप्रैल से प्रदेश में डोर-टू-डोर अभियान को और सघन करते हुए कम मैपिंग वाले बूथ पर स्पेशल फोकस करने की तैयारी है। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि उत्तराखंड में मई-जून के महीने में एसआईआर का कार्यक्रम शुरू हो जाएगा। हालांकि प्री-SIR मैपिंग में राज्य के दो बड़े मैदानी जिले देहरादून और ऊधम सिंह नगर पीछे चल रहे हैं। प्री-SIR के 27 मार्च, 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य की सबसे कम मैपिंग वाली विधानसभाओं में ऊधम सिंह नगर…

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International Women’s Day Special: उत्तराखंड की भौगोलिक विषमताएं जितनी कठोर हैं, यहां की महिलाओं का जीवट और संकल्प उतना ही विशाल है। आज जब हम 2026 में राज्य के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को देखते हैं तो ये बदलाव साफ नज़र आता है। समाज में हो रहे परिवर्तन को समझने के लिए दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। उत्तराखंड की महिलाएं केवल भागीदारी नहीं कर रहीं बल्कि हर क्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं। ये परिवर्तन अचानक नहीं आया, यह एक-दो वर्षों की उपलब्धि नहीं है न ही केवल किसी सरकारी नीति का परिणाम। यह बदलाव समाज की चेतना, सोच और निरंतर…

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गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश में अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाली हस्तियों के लिए नागरिक सम्मान Padma Awards 2026 का ऐलान कर दिया गया है। इस साल 131 लोगों को पद्म पुरस्कार के लिए चुना गया है। दिवंगत अभिनेता धर्मेंद्र सिंह देओल, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानंदन समेत 5 लोगों को पद्म विभूषण प्रदान किया जाएगा। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी, पार्श्व गायिका अलका याज्ञनिक, अभिनेता ममूटी, दिवंगत एड गुरु पीयूष पांडे, टेनिस खिलाड़ी विजय अमृतराज समेत 13 लोगों को पद्म भूषण सम्मान दिए जाने की घोषणा की गई है। इसके अतिरिक्त 113…

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उत्तराखंड, भारत के उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में स्थित एक ऐसा पर्वतीय राज्य है, जो विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों से संपन्न है, जो कृषि एवं हार्टीकल्चर की अपार संभावनाएं रखता है। पर्वतीय क्षेत्रों में उद्यानिकी यहां के निवासियों की आजीविका का मुख्य साधन है। उत्तराखंड के पर्वतीय किसान सेब और कीवी जैसे महंगे फलों की खेती में लाखों रुपये खर्च करते हैं, दिन-रात मेहनत करते हैं, फिर भी उत्पादन अक्सर अस्थिर रहता है; इसके विपरीत नींबू, कागजी नींबू, संतरा, माल्टा और मंदारिन जैसी सिट्रस फसलें कम लागत, सीमित श्रम और स्थिर आमदनी का भरोसेमंद स्रोत हैं। हिमालय की जंगली प्रजातियां और प्राकृतिक…

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वैसे तो मानव-वन्यजीव संघर्ष का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। दुखद यह है कि दिनों-दिन यह संघर्ष बढ़ता ही जा रहा है। आधुनिक समय में भी मनुष्य ऐसी व्यवस्था नहीं खोज पाया है जिससे यह संघर्ष खत्म हो सके। मनुष्य होने के नाते संघर्ष खत्म करने की जिम्मेदारी हमारी ही है। उत्तराखंड की बात की जाए तो आंकड़े अब डराने लगे हैं। वन्यजीव से संघर्ष में लोगों का जीवन असमय काल का शिकार हो रहा है। उत्तराखंड को वनसंपदा और वन्यजीवों के लिहाज से बेहद समृद्ध माना जाता है। बाघ, गुलदार, हाथी से लेकर अन्य वन्यजीवों का यहां सुरक्षित वासस्थल…

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विधानसभा अध्यक्ष और कोटद्वार की विधायक श्रीमती ऋतु खंडूरी ने पौराणिक महत्व वाले Kanvashram का दौरा किया। उन्होंने Kanvashram में पुरातत्व के महत्व वाली काष्ठ कला को करीब से देखा। मालिनी नदी तट के दोनों छोरों पर बसे कण्वाश्रम, उसकी बसासत और विरासत को लेकर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि बतौर क्षेत्रीय विधायक उनका पहला ध्येय है कि वह केंद्र, राज्य सरकार की मदद से Kanvashram को पर्यटन के मानचित्र में विश्व पटल पर लाने के लिए हर संभव कोशिश करेंगी। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी ने कहा कि अगले माह तक Kanvashram में शकुंतला पुत्र चक्रवर्ती राजा भरत…

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धराली से थराली, उत्तराखंड के कई हिस्सों या कह लीजिए पूरे हिमालयी क्षेत्र से हर दिन दुखद खबरें आ रही हैं, जो साफ बता रही हैं कि अब बादल फटने और बाढ़ आने जैसी घटनाएं सिर्फ पारंपरिक संवेदनशील क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गई हैं। बदलते मौसम और जलवायु ने खतरे वाले नए इलाके बना दिए हैं। इस विनाश के पीछे मानवीय हस्तक्षेप के साथ-साथ यहां की पहाड़ी बनावट और जल-प्रवाह से जुड़ी परिस्थितियां भी बड़ी वजह हैं। 5 अगस्त को धराली गांव में जो हुआ, वह सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि विज्ञान, पर्यावरण और इंसानी लापरवाही का मिला-जुला…

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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (CM Dhami) ने शनिवार शाम को राजकीय दून मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय का औचक निरीक्षण कर अस्पताल में उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं, उपचार की गुणवत्ता तथा व्यवस्थाओं का जायजा लिया। CM Dhami ने अस्पताल में उपचारधीन मरीजों से भेंट कर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली तथा उन्हें अस्पताल में दी जा रही चिकित्सीय सुविधाओं का फीडबैक लिया। मरीजों और उनके परिजनों से संवाद कर मुख्यमंत्री ने चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता को समझा तथा आवश्यक निर्देश भी दिए। दून मेडिकल कॉलेज के औचक निरीक्षण के दौरान अस्पताल परिसर में मौजूद वेटिंग एरिया (प्रतीक्षालय) में तीमारदारों के लिए समुचित सुविधाएं…

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अतुल्य उत्तराखंड के लिए अर्जुन एस. रावत त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव का फाइनल स्कोर 12 जिलों में छोटी सरकार के गठन के बाद ही साफ होगा। इन चुनाव में भाजपा-कांग्रेस का सियासी हासिल क्या रहा, जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव भी साफ करेगा। पिछली बार 12 जिला पंचायतों में 10 पर भाजपा और 2 पर कांग्रेस के अध्यक्ष थे। इस बार के पंचायत चुनाव के नतीजों ने दोनों दलों को अंत तक लड़ने का मौका दिया है। त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव की खास बात यह रही कि ज्यादातर जीतने वाले प्रत्याशी युवा हैं। फिर वह चमोली के सारकोट की 21 साल की…

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Dehradun Basmati Rice का वजूद मिटता जा रहा है। उत्तराखंड और देहरादून से प्यार करने वालों के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं होना चाहिए। कई दशकों पहले तक इस शहर की ब्रांडिंग का माध्यम हुआ करता था देहरादूनी बासमती। कुछ मानवजनित तो कुछ प्राकृतिक कारणों से इसकी महक गुम होती जा रही है। सरकारी तंत्र सर्वे कर कारणों-परेशानियों का पता तो कर रहा है। लेकिन, बड़ा सवाल तो इसके वजूद का है। यह विडंबना ही है कि भारी मांग के बावजूद देहरादूनी बासमती का उत्पादन अभूतपूर्व रूप से घट रहा है। जो कारण गिनाए जा रहे हैं, उसमें…

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