Author: Arjun Singh Rawat

पत्रकारिता का लंबा करियर। एजेंसी,टीवी, अखबार, मैग्जीन, रेडियो और डिजिटल मीडिया का अनुभव। राष्ट्रीय मीडिया में 15 साल काम करने के बाद पहाड़ों का रुख। पहाड़ के मुद्दों पर खुलकर बोलने का दम। जमीन पर काम करने का जज़्बा और जुनून आज भी वैसा ही, जैसा पहले दिन था।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (CM Dhami) ने शुक्रवार को मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (MDDA) द्वारा सीएम घोषणा के अंतर्गत मियांवाला, देहरादून में लगभग ₹8 करोड़ 64 लाख की लागत से विकसित ‘जल सृष्टि पार्क’ का लोकार्पण किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने क्षेत्रवासियों को नए पार्क की सौगात मिलने पर बधाई दी और इसे स्वच्छ, स्वस्थ एवं हरित देहरादून के संकल्प की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। CM Dhami ने कहा कि रायपुर क्षेत्र के लोगों के बीच इस सुंदर पार्क का लोकार्पण उनके लिए प्रसन्नता का विषय है। उन्होंने कहा कि ‘जल सृष्टि पार्क’ आधुनिक सुविधाओं और प्राकृतिक सौंदर्य का…

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस पर हरिपुर कालसी में मां यमुना का तट आस्था, संस्कृति और विकास के रंग में नजर आया। ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम में 2100 दीपों से यमुना तट रोशन हुआ। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (CM Dhami) ने साधु-संतों, श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के साथ मां यमुना की आरती में प्रतिभाग किया। इस दौरान मां यमुना की प्रतिमा का अनावरण और हरिघाट का लोकार्पण किया गया। मुख्यमंत्री ने मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (MDDA) द्वारा 7.52 करोड़ रुपये की लागत से विकसित स्नान घाट भी जनता को समर्पित किया। इसके साथ ही मां यमुना कृष्ण मंदिर का शिलान्यास किया…

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किसी विजन को जमीन पर साकार होते देखना हो तो Chhattisgarh की राजधानी रायपुर में बनी नंदनवन सफारी सबसे बेहतरीन उदाहरणों में से एक है। नया रायपुर के इलाके में करीब 320.15 हेक्टेयर यानी 800 एकड़ क्षेत्र में फैला नंदनवन ‘ZOO से जंगल सफारी तक’ का याद रह जाने वाला अनुभव है। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत पीआईबी देहरादून की ओर से आयोजित पांच दिवसीय अध्ययन एवं मीडिया एक्सपोजर टूर के चौथे दिन मीडिया दल ने छत्तीसगढ़ के नंदनवन जू एंड सफारी और नया रायपुर का भ्रमण किया। पीआईबी देहरादून के सहायक निदेशक संजीव सुंद्रियाल के नेतृत्व में…

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Chhattisgarh और उत्तराखंड एक ही कालखंड में अस्तित्व में आए। दोनों राज्य अपनी 25 साल की यात्रा पूरी कर चुके हैं। दो अलग-अलग भौगोलिक और प्राकृतिक विरासत वाले राज्यों ने इन 25 वर्षों में क्या हासिल किया है, विकास की राह में क्या कोशिशें हुई हैं और किन क्षेत्रों में अभी और काम की जरूरत है, इन्हीं पहलुओं को करीब से समझने के लिए उत्तराखंड की मीडिया का एक दल 5 दिन के स्टडी टूर पर छत्तीसगढ़ पहुंचा है। पत्र सूचना कार्यालय (PIB) की पहल पर आयोजित इस मीडिया दौरे में छत्तीसगढ़ की विकास यात्रा को जमीन पर समझने का…

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उत्तराखंड की पहचान केवल उसके शिखरों, नदियों और पर्यटन स्थलों से नहीं बनती। उसकी असली ताकत उन गांवों में बसती है, जहां खेत हैं, जंगल हैं, लोक संस्कृति है और सबसे बढ़कर वो लोग हैं, जो तमाम कठिनाइयों के बावजूद पहाड़ से जुड़े हुए हैं। लेकिन आज यही गांव कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहे हैं। जमीन की तरह सपने बिखरे नज़र आ रहे हैं, लोग गांव छोड़ रहे हैं और गांवों के मुद्दों की आवाज़ मुख्यधारा के शोर में दब सी गई है। अतुल्य उत्तराखंड के जून अंक में हमने ऐसे दो विषयों को प्रमुखता से रखा है,…

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कहते हैं, पहाड़ की सबसे बड़ी ताकत उसकी जमीन है। विडंबना यह है कि यही जमीन आज उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। उत्तराखंड के गांवों में एक परिवार की जोत पांच-दस टुकड़ों में बिखरी हुई है। कहीं खेत गांव के ऊपर हैं, कहीं नीचे और कहीं कई किलोमीटर दूर। पीढ़ियों से हुए बंटवारे ने खेती को इतना बिखेर दिया है कि न उत्पादन का वॉल्यूम बन पाता है और न खेती लाभकारी रह जाती है। यही वजह है कि चकबंदी का सवाल पिछले पांच दशकों से उत्तराखंड की कृषि बहस के केंद्र में बना हुआ है। दरअसल, सरकार…

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अतुल्य उत्तराखंड के लिए अर्जुन रावत बात जून 2024 की है। ऋषिकेश एम्स के लंबे गलियारे में बैठे बागेश्वर के नरेंद्र सिंह गहरी उलझन में डूबे थे। सामने कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझती उनकी भाभी जिंदगी और मौत के बीच लड़ रही थीं। घर की जिम्मेदारी पूरी तरह नरेंद्र के कंधों पर थी, भाई पहले से ही विकलांग थे। डॉक्टरों ने इलाज के लिए करीब एक लाख रुपये का खर्च बताया, लेकिन नरेंद्र के पास इतने पैसे नहीं थे। उस मुश्किल घड़ी में उनके पास सिर्फ एक ही सहारा था घर के छोटे से गोठ में पल रही उनकी…

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13 जून 2024… दोपहर की तपती खामोशी। जंगल शांत था। फायर वाचर कैलाश भट्ट अपनी सुबह की गश्त पूरी कर चुके थे। सब कुछ सामान्य था, हर दिन की तरह। लेकिन दोपहर बाद एक फोन कॉल ने सब बदल दिया। ‘जंगल में आग लग गई है…’ कुछ ही मिनटों में कैलाश और उनके सात साथी बोलेरो में सवार होकर घटनास्थल की ओर निकल पड़े। दूर आसमान में उठता धुआं साफ दिख रहा था और हर गुजरते मिनट के साथ गाढ़ा होता जा रहा था। मौके पर पहुंचने से पहले ही हालात भयावह हो चुके थे। हवा के साथ आग बेकाबू…

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अतुल्य उत्तराखंड के लिए ईश्वरी दत्त जोशी/अर्जुन रावत उत्तराखंड के जंगलों का सालभर जलना अब एक खतरनाक ट्रेंड बन चुका है। कभी मौसमी रही वनाग्नि अब बार-बार लौटने वाली आपदा का रूप ले चुकी है। आधिकारिक आकलनों के अनुसार आग लगने की 90 से 98% तक की घटनाएं मानवजनित हैं, जबकि शेष मामलों में असामाजिक तत्वों की भूमिका मानी जाती है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि अगर 98% घटनाएं मानवजनित हैं तो जवाबदेही तय क्यों नहीं होती? अगर लोग जिम्मेदार हैं तो उन्हें समाधान का हिस्सा बनाने के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं सवाल – क्या ‘लापरवाही’ कह…

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उत्तराखंड के जंगल हर साल जलते हैं। यह जुमला अब एक आदत बन चुका है, ऐसी आदत, जिसे हमने खामोशी से स्वीकार कर लिया है। फरवरी से जून के बीच धुआं उठता है, आग फैलती है, कुछ दिनों तक चिंता होती है, फिर बारिश आती है और हम मान लेते हैं, सब कुछ सामान्य हो गया। लेकिन क्या सच में सब कुछ सामान्य है? इस अंक की कवर स्टोरी ‘जब जंगल रोते हैं…’ सिर्फ एक पर्यावरणीय संकट की कहानी नहीं है। यह उस खामोशी को तोड़ने की कोशिश है, जिसमें हम हर साल इस त्रासदी को देखते हैं, पर समझने से…

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Dehradun में आपराधिक तत्व इतने बेखौफ हो गए हैं कि ओवरटेकिंग को लेकर हुए मामूली विवाद में भी सरेआम फायरिंग होने लगी है। मसूरी रोड पर मालसी के पास सुबह करीब 6.50 बजे हुई फायरिंग में मॉर्निंग वॉक पर निकले सेना के एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर को गोली लग गई। उनकी पहचान जाखन निवासी 70 साल के ब्रिगेडियर वीके जोशी (रिटा.) के रूप में हुई है। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन बाद में उनकी मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक सुबह मसूरी रोड पर मालसी के पास दिल्ली नंबर की फॉर्च्यूनर और स्कॉर्पियो कार सवारों के बीच गाड़ी को…

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उत्तराखंड में चल रही प्री-SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) में 85% मतदाताओं की मैपिंग पूरी कर ली गई है। पहली अप्रैल से प्रदेश में डोर-टू-डोर अभियान को और सघन करते हुए कम मैपिंग वाले बूथ पर स्पेशल फोकस करने की तैयारी है। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि उत्तराखंड में मई-जून के महीने में एसआईआर का कार्यक्रम शुरू हो जाएगा। हालांकि प्री-SIR मैपिंग में राज्य के दो बड़े मैदानी जिले देहरादून और ऊधम सिंह नगर पीछे चल रहे हैं। प्री-SIR के 27 मार्च, 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य की सबसे कम मैपिंग वाली विधानसभाओं में ऊधम सिंह नगर…

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International Women’s Day Special: उत्तराखंड की भौगोलिक विषमताएं जितनी कठोर हैं, यहां की महिलाओं का जीवट और संकल्प उतना ही विशाल है। आज जब हम 2026 में राज्य के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को देखते हैं तो ये बदलाव साफ नज़र आता है। समाज में हो रहे परिवर्तन को समझने के लिए दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। उत्तराखंड की महिलाएं केवल भागीदारी नहीं कर रहीं बल्कि हर क्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं। ये परिवर्तन अचानक नहीं आया, यह एक-दो वर्षों की उपलब्धि नहीं है न ही केवल किसी सरकारी नीति का परिणाम। यह बदलाव समाज की चेतना, सोच और निरंतर…

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गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश में अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाली हस्तियों के लिए नागरिक सम्मान Padma Awards 2026 का ऐलान कर दिया गया है। इस साल 131 लोगों को पद्म पुरस्कार के लिए चुना गया है। दिवंगत अभिनेता धर्मेंद्र सिंह देओल, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानंदन समेत 5 लोगों को पद्म विभूषण प्रदान किया जाएगा। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी, पार्श्व गायिका अलका याज्ञनिक, अभिनेता ममूटी, दिवंगत एड गुरु पीयूष पांडे, टेनिस खिलाड़ी विजय अमृतराज समेत 13 लोगों को पद्म भूषण सम्मान दिए जाने की घोषणा की गई है। इसके अतिरिक्त 113…

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उत्तराखंड, भारत के उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में स्थित एक ऐसा पर्वतीय राज्य है, जो विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों से संपन्न है, जो कृषि एवं हार्टीकल्चर की अपार संभावनाएं रखता है। पर्वतीय क्षेत्रों में उद्यानिकी यहां के निवासियों की आजीविका का मुख्य साधन है। उत्तराखंड के पर्वतीय किसान सेब और कीवी जैसे महंगे फलों की खेती में लाखों रुपये खर्च करते हैं, दिन-रात मेहनत करते हैं, फिर भी उत्पादन अक्सर अस्थिर रहता है; इसके विपरीत नींबू, कागजी नींबू, संतरा, माल्टा और मंदारिन जैसी सिट्रस फसलें कम लागत, सीमित श्रम और स्थिर आमदनी का भरोसेमंद स्रोत हैं। हिमालय की जंगली प्रजातियां और प्राकृतिक…

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वैसे तो मानव-वन्यजीव संघर्ष का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। दुखद यह है कि दिनों-दिन यह संघर्ष बढ़ता ही जा रहा है। आधुनिक समय में भी मनुष्य ऐसी व्यवस्था नहीं खोज पाया है जिससे यह संघर्ष खत्म हो सके। मनुष्य होने के नाते संघर्ष खत्म करने की जिम्मेदारी हमारी ही है। उत्तराखंड की बात की जाए तो आंकड़े अब डराने लगे हैं। वन्यजीव से संघर्ष में लोगों का जीवन असमय काल का शिकार हो रहा है। उत्तराखंड को वनसंपदा और वन्यजीवों के लिहाज से बेहद समृद्ध माना जाता है। बाघ, गुलदार, हाथी से लेकर अन्य वन्यजीवों का यहां सुरक्षित वासस्थल…

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