- अतुल्य उत्तराखंड के लिए ईश्वरी दत्त जोशी/अर्जुन रावत
उत्तराखंड के जंगलों का सालभर जलना अब एक खतरनाक ट्रेंड बन चुका है। कभी मौसमी रही वनाग्नि अब बार-बार लौटने वाली आपदा का रूप ले चुकी है। आधिकारिक आकलनों के अनुसार आग लगने की 90 से 98% तक की घटनाएं मानवजनित हैं, जबकि शेष मामलों में असामाजिक तत्वों की भूमिका मानी जाती है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि अगर 98% घटनाएं मानवजनित हैं तो जवाबदेही तय क्यों नहीं होती? अगर लोग जिम्मेदार हैं तो उन्हें समाधान का हिस्सा बनाने के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं
सवाल – क्या ‘लापरवाही’ कह देना असल जिम्मेदारों को बचाने का तरीका है? अगर हर साल वही गलती दोहराई जा रही है, तो सिस्टम सीख क्यों नहीं रहा?
आग पहले काबू में थी, अब बेकाबू क्यों?
आग लगना कोई नई बात नहीं है। दशकों तक जंगलों में लगने वाली आग को स्थानीय समुदाय और वन विभाग मिलकर नियंत्रित कर लेते थे। फर्क अब यह है कि एक बार आग लगने के बाद उसे काबू में करना लगभग असंभव होता जा रहा है। इसके पीछे सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि सिस्टम की कमजोरियां भी जिम्मेदार हैं। इतने वर्षों में कुछ भी तो नहीं बदला है। असल मुद्दा यह है, क्या वन विभाग की रणनीति समय के साथ अपडेट नहीं हुई? क्या स्थानीय लोगों को जंगलों से टूटता रिश्ता इसकी वजह है?
सवाल – वही जंगल, वही लोग, फिर आग अब काबू से बाहर क्यों हो रही है? क्या बदला – मौसम, सिस्टम या हमारी मंशा?
जंगल से इंसान दूर हुआ या सिस्टम ने दूर किया
वन विभाग चाहे कितने ही दावे करे लेकिन सच यह है कि उसके पास आज भी आग से सुरक्षा के लिए न तो कोई व्यवहारिक योजना है और न ही जरूरी संवेदनशीलता। दूसरी तरफ कठोर वन कानूनों के चलते अपने परंपरागत वनाधिकारों के छिनने से जनता में भी आग बुझाने में कोई रूचि नहीं दिखाई देती। पिछले दो-तीन दशकों में तमाम कारणों से गांव और जंगल का रिश्ता बदला है। अब जंगलों पर ग्रामीणों की पहले जैसी निर्भरता नहीं रही। गांवों में पशुपालन तेजी से घटा है।
अल्मोड़ा जिले के ताकुला ब्लॉक के पशुगणना आंकड़ों से इसे समझने की कोशिश करते हैं। जिन 37 गांवों की पशुगणना के आंकड़े उपलब्ध हैं, वहां पिछले 4 साल में गाय और भैंस की संख्या में 14.09 प्रतिशत की कमी आई हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि आरक्षित वन तो दूर निजी भूमि और सिविल वन भूमि से भी घास का उठान नहीं हो पा रहा। गांव-घरों के आस पास मौजूद यह सूखी घास भी अब वनाग्नि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगी है। जाड़ों में लगने वाली आग का प्रमुख कारण यही घास है। वन क्षेत्रों के निकटवर्ती गांवों में पलायन अपेक्षाकृत अधिक हुआ है। यहां से हुए अत्यधिक पलायन ने भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से वनाग्नि को प्रभावित किया है।
पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड राज्य गठन के बाद यहां 1726 गांव भूतहा हो गए हैं। वन वासियों को ब्रिटिश काल से मिलता आ रहा इमारती लकड़ी के हक का कोटा और वन उपज के उपयोग में लगे तमाम प्रतिबंधों से ग्रामीणों का एक बड़ा वर्ग अब आग बुझाने के लिए जंगल जाने में उत्सुक नहीं दिखता।
सवाल – जब गांव जंगल से दूर हो गया तो जंगल की जिम्मेदारी किसकी रह गई? क्या नीतियों ने ही लोगों को जंगल से अलग कर दिया?
जो काम करता था, उसे क्यों छोड़ा गया?
ब्रिटिश काल में 1906 में पातन के आधार पर वनों को ‘क, ख तथा ग’ श्रेणियों में बांटकर आग से वनों की सुरक्षा का कार्य शुरू किया गया था। आग से सुरक्षा के लिए प्रत्येक श्रेणी के वनों को अलग करने के लिए 16 मीटर चौड़ी बटिया (फायर लाइन) बनाई जाती थी। वर्ष 1911-12 में पहली बार चीड़ के जंगलों में आग से सुरक्षा का कार्य किया गया। इसके लिए 4 मीटर की आग बटियायें दो-तीन घेरों में बनाई गई।
1917 में वन विभाग ने नियंत्रित आग द्वारा विभिन्न प्रकार के वनों के जलाने का कार्य शुरू किया। कंट्रोल फायर का यह काम दिसम्बर से फरवरी माह तक किया जाता था। इस आग से बनने वाली राख खाद के साथ ही कीटनाशक का काम करती थी तथा अनावश्यक झाड़-झंखाड़ को साफ करती थी। लेकिन बाद के समय में विभाग द्वारा नियंत्रित आग लगाना लगभग बंद कर दिया गया।
पिछले कुछ वर्षो से नियंत्रित आग लगाने का काम फिर से शुरू तो किया गया लेकिन अग्नि बटियाओं के अभाव में अधिकांश स्थानों में इस नियंत्रित आग ने अनियंत्रित होकर सारे जंगल को ही स्वाहा कर डाला। लोगों की मानें तो पिछले 50 वर्षों में वन विभाग द्वारा नई अग्नि बटिया नहीं बनाई गई हैं। यही नहीं अधिकांश पुरानी अग्नि बटियायें समाप्त हो चुकी हैं। उनमें झाड़ियां और पेड़ उग आए हैं। बटियाओं के अभाव में आग नियंत्रित नहीं हो पाती। पिछले कुछ समय में आग की बढ़ती घटनाओं के बाद वन विभाग ने कई जगह अग्नि बटियाओं में उगे पेड़ों को काटने का काम फिर से शुरू किया लेकिन इसकी रफ्तार बहुत धीमी है।
सवाल – जो व्यवस्था 100 साल पहले काम कर रही थी, वो आज गायब क्यों है? क्या हमने समाधान छोड़े और समस्या को बढ़ने दिया?
जमीन पर लड़ने वाले ही सबसे कमजोर क्यों?
जंगलों में लगने वाली आग को काबू करने में जमीनी स्तर पर फायर वाचरों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वन विभाग द्वारा फायर सीजन में रखे जाने वाले इन वाचरों की नियुक्ति प्रक्रिया में काफी खामियां हैं। पैसा बचाने की जुगत में वन विभाग की ओर से सीजनल फायर वाचरों की नियुक्ति समय पर नहीं की जाती है।
मात्र तीन-चार महीने के लिए रखे जाने वाले इन सीजनल फायर वाचरों को मिलने वाला न्यूनतम मानदेय भी समय पर नहीं मिल पाता। उन्हें नियुक्ति पत्र दिए जाने तथा जीवन बीमा कराए जाने का सवाल अभी भी बना हुआ है। फायर वाचर का रखा जाना वन रक्षक की मर्जी पर निर्भर है।
सवाल नियुक्ति का ही नहीं ट्रेनिंग का भी है। बिना प्रशिक्षण, बिना उपकरण, बिना बीमा ये फ्रंटलाइन वॉरियर कितने सुरक्षित हैं? क्या यह सिस्टम की लापरवाही नहीं है?
देखने में आया कि कई बार वन क्षेत्राधिकारी को ही मालूम नहीं होता कि उनके यहां कितने और कौन फायर वाचर हैं। फायर वाचर के पास इस बात का कोई प्रमाण नहीं होता कि वह फायर वाचर का काम कर रहा है।
बिनसर हादसे के बाद भी नहीं बदला कुछ
हैरानी इस बात से भी होती है कि बिनसर की घटना के बाद भी कुछ खास नहीं बदला। 13 जून 2024 को बिनसर वन्य जीव विहार में आग बुझाने गए 8 वनकर्मी बूरी तरह जल गए। इनमें 4 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि 2 अन्य लोगों ने इलाज के दौरान दिल्ली एम्स में दम तोड़ा। शेष 2 लोग आज भी तमाम परेशानियों से जूझ रहे हैं। इस घटना में जिन लोगों की जान गई उनके परिजनों को डेली वेज पर विभाग में नौकरी जरूर दी गई है, लेकिन मुख्यमंत्री ने जिस सहायता राशि की घोषणा की थी, वह नहीं मिली। जो दो लोग घायल हुए शासन, प्रशासन से उन्हें सहयोग नहीं मिल पा रहा है। बिनसर में आग बुझाते हुए जान गंवाने वाले 17 वर्षीय नाबालिक करन कुमार को 3 माह से सीजनल फायर वाचर का काम कराने के बाद भी वन विभाग ने अपना कर्मचारी मानने से साफ इनकार कर दिया। हालांकि मामला उछलने के बाद उनके परिजनों को आपदा मोचन निधि से मुआवजा दे दिया गया।
सवाल – क्या सिस्टम के लिए एक फायर वाचर की जान की कोई कीमत नहीं, अगर मरने के बाद भी पहचान नहीं तो जिंदा रहते उनका अस्तित्व क्या है?
कैलाश-भगवत की लड़ाई कौन लड़ेगा?
बिनसर हादसे में घायल 54 वर्षीय कैलाश भट्ट ने 30 साल जंगल बचाए, लेकिन जब वह खुद आग का शिकार हुए तो सिस्टम ने उन्हें अलग-थलग छोड़ दिया गया। 1994 से वन विभाग में दैनिक श्रमिक के रूप में काम करने वाले कैलाश गंभीर रूप से झुलसे। उनका रोजमर्रा का जीवन भी मुश्किल हो गया है। परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है, बेटा बेरोजगार है।
ऐसी ही कहानी भगवत भोज की है, जो वन विभाग में पिछले एक दशक से दैनिक श्रमिक के रूप में वाहन चालक रहे। लेकिन आग में झुलसने के बाद अब काम करने की स्थिति में नहीं हैं। तीन बच्चों सहित पूरे परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी उन पर है।
बिनसर फायर के दोनों घायलों को नियमित चेकअप के लिए हर तीन माह में दिल्ली जाना होता है। एक बार जाने में तकरीबन 8-10 हजार रूपया खर्च आ रहा है, जिसे उन्हें स्वयं वहन करना पड़ता है। पैसों के अभाव में वे कई बार समय पर जांच नहीं करा पा रहे हैं। यात्रा खर्च के लिए वो वन विभाग और जिला प्रशासन से कई बार गुहार लगा चुके हैं, लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिलता।
सवाल – क्या आग से लड़ने वालों की जिंदगी इतनी सस्ती है? जो लोग जंगल बचाते हुए जल गए उन्हें ही सिस्टम ने क्यों छोड़ दिया?

सिर्फ ग्रीन कवर बढ़ने से बन जाएगी बात?
उत्तराखंड के कुल क्षेत्रफल 53,483 वर्ग किमी. में वन क्षेत्र 37999.53 वर्ग किमी. है। जो कुल क्षेत्र का 71 प्रतिशत है। राज्य गठन के समय यह 64.8 प्रतिशत था। इस प्रकार राज्य गठन के बाद वन क्षेत्र में 6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आंकड़े तो साफ कह रहे हैं कि वन क्षेत्र बढ़ा है, लेकिन क्या सिर्फ ग्रीन कवर का बढ़ जाना पर्याप्त है। क्या चीड़ के बढ़ते जंगल आग को और खतरनाक नहीं बना रहे? क्या जंगलों की गुणवत्ता और जैव विविधता पर गंभीरता से ध्यान दिया जा रहा है?
सवाल – क्या हम जंगल बढ़ा रहे हैं या सिर्फ ग्रीन कवर का भ्रम खड़ा कर रहे हैं, क्या आंकड़े सच्चाई को छिपा रहे हैं?
बढ़ गई वन से जन की दूरी
जमीनी सच्चाई यह है वन कानूनों में हुए तमाम बदलावों के चलते वन और जन की दूरी बढ़ी है। आज वन क्षेत्र का 23 प्रतिशत संरक्षित क्षेत्र के दायरे में आ चुका है। इन संरक्षित क्षेत्रों मे वन उपज का उपयोग ग्रामीणों के लिए पूर्णतया प्रतिबंधित होने के कारण वहां बड़ी संख्या में गिरी पड़ी लकड़ी दावानल का प्रमुख कारण बनती हैं। आरक्षित वनों से वन निगम द्वारा प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में लकड़ी उठाई जाती है, लेकिन उसके द्वारा लकड़ी के छिलकों एवं टहनियों को जंगल में छोड़ दिया जाता है, जो आग को फैलने में मदद करता है। संरक्षित क्षेत्रों में वन विभाग का सारा ध्यान पर्यटन पर केंद्रित हो गया है, संरक्षण का मुद्दा उनके लिए गौण हो चला है, जो गंभीर चिंता का विषय है। रही-सही कसर चीड़ वनों के विस्तार ने पूरी कर दी है
सवाल – जंगल से लकड़ी तो उठाई जा रही है, लेकिन बचा मलबा आग का ईंधन क्यों बन रहा है? क्या प्रबंधन अधूरा है या जिम्मेदारी बंटी हुई है?
लोकल लेवल पर भी मौजूद है समाधान
चीड़ के वनों के निरंतर हो रहे विस्तार से जमीन की नमी लगातार कम हो रही है। 1996 से पहले की तरह चीड़ के हरे पेड़ हक के रूप में ग्रामीणों को दिये जाने से चीड़ वनों के विस्तार को रोका जा सकता है। जंगल से पिरूल उठान एक बड़ी चुनौती है। जगह-जगह पिरूल खरीद केंद्र स्थापित कर इससे संबधित उद्योग स्थानीय स्तर पर लगाने से इस चुनौती से काफी हद तक निपटा जा सकता है। जंगल में नमी बनाए रखने के लिए चाल-खाल निर्माण व जमीनी घास/पौध रोपण का कार्य प्रभावी तरीके से करने में भी अब तक कोई विशेष सफलता नहीं मिल पाई है। जंगली जानवरों से जानमाल की सुरक्षा करने में हमारी असफलता ने जंगलों के प्रति ग्रामीणों के नजरिये को बदला है।
उत्तराखंड में 13 प्रतिशत पंचायती वन हैं, जिनका प्रबंधन वन पंचायतों द्वारा किया जाता है। राज्य गठन के बाद पिछले 25 वर्षों में वन पंचायत नियमावली में 4 बार संशोधन किए गए। वन प्रबंधन में विशिष्ट पहचान रखने वाली इस व्यवस्था को कमजोर करने का काम हमारी अपनी सरकारों द्वारा किया गया। इन संशोधनों से वन पंचायतों की स्वायत्तता में आई कमी एवं वन विभाग के अत्यधिक हस्तक्षेप के कारण पंचायती वनों के प्रबंधन के प्रति ग्रामीणों का रूझान तेजी से घटा है।
सवाल – जिन पंचायतों ने जंगल बचाए, उन्हें कमजोर क्यों किया गया? क्या केंद्रीकरण ने स्थानीय सिस्टम को खत्म कर दिया?
फील्ड स्तर पर कर्मचारियों का संकट!
वन विभाग में ऊपरी स्तर पर जहां वन संरक्षक तथा उप वन संरक्षक जैसे पदों की भरमार है, वहीं फील्ड स्तर पर कर्मचारियों की भारी कमी है। एक वन रक्षक के पास कई-कई हजार हेक्टेयर वनक्षेत्र की देखरेख का जिम्मा है। ऊपर से 2001 के बाद वन पंचायतों में सचिव का दायित्व भी उन्हें सौंप दिया गया है। इस प्रकार एक वन बीट अधिकारी को आरक्षित वन क्षेत्र के अलावा 10-15 वन पंचायतों की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गयी है। वन पंचायत नियमावली के अनुसार उसे प्रत्येक माह वन पंचायत की बैठक करनी है। यही नहीं मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती घटनाओं की जांच का दायित्व भी उसी के पास है। ऐसी स्थिति में अपने इन सभी दायित्वों का निर्वहन कर पाना उनके लिए काफी मुश्किल हो रहा है। इसका असर पंचायती वनों के विकास पर नकारात्मक तरीके से पड़ रहा है।
सवाल – हजारों हेक्टेयर जंगल एक व्यक्ति के भरोसे, क्या यह गंभीर लापरवाही नहीं? क्या नीतियां जमीन की हकीकत से कटी हुई हैं?
आखिर स्थानीय स्तर पर क्यों है संवादहीनता
सीजनल फायर वाचर जरूरत से काफी कम नियुक्त किये जाते हैं। उनके लिए न तो किसी तरह के प्रशिक्षण की व्यवस्था है और न ही उन्हें आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराए जाते हैं। यहां तक की भीषण आग की लपटों से जूझते फायर फायटरों को अग्नि विरोधी ड्रेस, जूते, टार्च और पानी की बोतल जैसी आधारभूत जरूरतों के लिए तरसना पड़ता है।
दूसरी तरफ वन विभाग एवं समुदाय के बीच भारी संवादहीनता है। अग्नि सुरक्षा को लेकर ग्रामीणों के बीच व्यापक स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाये जाने की अत्यधिक आवश्यकता है। वनाग्नि शमन में वन पंचायत, जैव विविधता प्रबंधन समिति एवं ग्राम पंचायतों की बड़ी भूमिका हो सकती है। दुर्भाग्यवश इस दिशा में भी कोई ठोस पहल दिखाई नहीं देती।
सवाल – आखिर क्यों वन पंचायतों, ग्राम पंचायतों की भूमिका को कमतर आंका गया? सरकार की कोशिशें अपर्याप्त
राज्य सरकार ने आग को नियंत्रित करने के लिए तकनीकी स्तर पर कुछ प्रयास किए गए हैं। सैटेलाइट आधारित निगरानी, जीआईएस मैपिंग, ड्रोन सर्विलांस और 24×7 कंट्रोल रूम जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। उत्तराखंड में BHUVAN और अन्य प्लेटफॉर्म के माध्यम से आग की निगरानी करने की बात होती है। मोबाइल ऐप और वेब पोर्टल के जरिये भी आग की जानकारी साझा की जाती है। जमीनी कार्रवाई के लिए अब भी मानव संसाधन, उपकरण और लोकल लेवल पर को-ऑर्डिनेशन की दरकार है जो कई मामलों में नाकाफी साबित होत है।
सवाल – सवाल फिर वही उठता है अगर सैटेलाइट आग देख सकता है तो जमीन पर उसे बुझाने वाला सिस्टम क्यों नहीं? क्या टेक्नोलॉजी सिर्फ रिपोर्ट बनाने के लिए है, समाधान के लिए नहीं?
क्या हम हर साल आग बुझा रहे हैं, या हर साल जिम्मेदारी टाल रहे हैं? सवाल अब भी वहीं खड़े हैं, लेकिन जंगल जवाब देने की स्थिति में नहीं बचे।
जंगल पक रहे हैं… इसलिए बढ़ रही है आग
सिर्फ पानी छिड़कने से जंगल की आग नहीं बुझेगी। यह समस्या जितनी सतही दिखती है, असल में उससे कहीं ज्यादा गहरी है। दुनिया भर में सरकारें आग बुझाने के तात्कालिक उपाय तो कर रही हैं, लेकिन उसकी जड़ों पर ध्यान नहीं दे रहीं। जंगलों में आग लगने का एक बड़ा कारण जैव विविधता का बिगड़ता संतुलन है और इस पर बहुत कम चर्चा होती है। इसे एक सरल उदाहरण से समझिए। कच्चा मिट्टी का घड़ा पानी सोखता है, लेकिन पकने के बाद वही घड़ा सख्त हो जाता है और पानी को अंदर नहीं जाने देता। हमारे जंगल भी धीरे-धीरे ऐसे ही ‘पक’ रहे हैं। पहले जंगलों की जमीन जीवित होती थी उसमें अलग-अलग तरह के पेड़, झाड़ियां, घास और सूक्ष्म जीव मौजूद रहते थे। यह विविधता जमीन में नमी बनाए रखती थी। लेकिन अब एक जैसी प्रजातियों के पेड़ बढ़ रहे हैं, झाड़ियां साफ हो रही हैं और प्राकृतिक परतें खत्म हो रही हैं। नतीजा यह है कि जमीन सख्त हो रही है, पानी सोखने की क्षमता घट रही है और नमी टिक नहीं पा रही। सूखे जंगल आग के लिए सबसे आसान ईंधन बन जाते हैं—इसलिए छोटी-सी चिंगारी भी बड़ी आग में बदल जाती है। यही असंतुलन बाढ़ को भी बढ़ाता है। जब जमीन पानी नहीं सोखती, तो बारिश का पानी सीधे बहाव बन जाता है। यानी एक तरफ आग और सूखा, दूसरी तरफ बाढ़ दोनों एक ही समस्या के अलग-अलग रूप हैं।
जैव विविधता का मतलब सिर्फ पेड़ लगाना नहीं, बल्कि एक संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है जहां बड़े पेड़, छोटे पौधे, घास, कीट और जीव-जंतु सब मिलकर काम करें। अगर हम जंगलों को सिर्फ ‘ग्रीन कवर’ के रूप में देखते रहेंगे, तो समस्या बनी रहेगी। जंगल एक जीवित तंत्र हैं और उन्हें उसी तरह समझना होगा। जब तक हम जैव विविधता को बहाल नहीं करेंगे, तब तक सिर्फ पानी छिड़कने या मशीनों से आग बुझाने से स्थायी समाधान नहीं मिलेगा। जंगलों की आग को रोकना है तो उसकी जड़ों तक जाना होगा और वह जड़ है प्रकृति के संतुलन को वापस लाना।
श्रीकांत चंदोला, पूर्व प्रमुख वन संरक्षक (HoFF)










