- अतुल्य उत्तराखंड के लिए अर्जुन रावत
बात जून 2024 की है। ऋषिकेश एम्स के लंबे गलियारे में बैठे बागेश्वर के नरेंद्र सिंह गहरी उलझन में डूबे थे। सामने कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझती उनकी भाभी जिंदगी और मौत के बीच लड़ रही थीं। घर की जिम्मेदारी पूरी तरह नरेंद्र के कंधों पर थी, भाई पहले से ही विकलांग थे। डॉक्टरों ने इलाज के लिए करीब एक लाख रुपये का खर्च बताया, लेकिन नरेंद्र के पास इतने पैसे नहीं थे। उस मुश्किल घड़ी में उनके पास सिर्फ एक ही सहारा था घर के छोटे से गोठ में पल रही उनकी बकरियां। नरेंद्र ने बिना देर किए फैसला लिया। …बागेश्वर में कुछ ही घंटों में उनकी 12 बकरियां बिक गईं। अब उनके हाथ में वह नकदी थी, जिससे इलाज शुरू हो सकता था। जिसे दुनिया ‘पशुधन’ कहती है, वही उस दिन नरेंद्र के लिए किसी एटीएम से कम नहीं था। हालांकि तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी भाभी को बचाया नहीं जा सका, लेकिन नरेंद्र के मन में यह संतोष है कि उन्होंने पैसों की कमी को इलाज के रास्ते में आड़े नहीं आने दिया। दरअसल, यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं है, यह उत्तराखंड की उस साइलेंट इकॉनमी की सच्चाई है, जो संकट के समय सबसे बड़ा सहारा बनती है। कुछ ऐसी ही कहानी ऊधमसिंह नगर में चौमेला की मधु देवी की है, 2024 में 20 बकरी और एक बकरे से बकरी पालन की शुरुआत की। धीरे-धीरे बकरियों की संख्या बढ़ाई और आज इसी से कमाए पैसों से नए घर की नींव रखी है।
पहाड़ की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में जहां रोजगार के पारंपरिक साधन सीमित हैं, वहां बकरी पालन आज तत्काल पेमेंट फैसिलिटी की तरह उभर रहा है। 2019 की पशुधन गणना के मुताबिक, उत्तराखंड में 13.71 लाख यानी करीब 14 लाख बकरियां हैं। वहीं 2 लाख के करीब लोग बकरी पालन करते हैं। बहर पांच साल में होने वाली नई पशुधन गणना का काम 2025 में पूरा हो चुका है, हालांकि अभी इसके आंकड़े जारी नहीं हुए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तराखंड में बकरी पालन करने वाला परिवार औसतन 7-8 बकरियां पालता है। इसके लिए उसे 8-12 हजार रुपये प्रति बकरी आसानी से मिल जाते हैं। यानी एक छोटा परिवार 80 हजार रुपये से 1.20 लाख रुपये तक की आय कर सकता है। लंबे समय तक बकरी पालन एक साइलेंट सेक्टर बना रहा। इसी साइलेंट सेक्टर को पहचान देकर उसे संगठित करने के लिए राज्य में नवंबर 2022 में गोट वैली योजना की शुरुआत की गई।

कई छोटे पशुपालक, जो कभी आजीविका के स्थाई विकल्प के लिए संघर्ष कर रहे थे आज गोट वैली योजना के जरिए न सिर्फ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बने हैं बल्कि दूसरों के लिए मिसाल भी पेश कर रहे हैं। उत्तराखंड सरकार का पशुपालन विभाग गोट वैली योजना को एक बड़े क्लस्टर आधारित आर्थिक मॉडल के रूप में विकसित कर रहा है। यह योजना केवल सब्सिडी या ऋण तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजना और जिला योजना के साथ जुड़कर एक व्यापक ग्रामीण इकोसिस्टम तैयार कर रही है।

इस योजना की सबसे बड़ी ताकत इसका 90% सब्सिडी मॉडल है। यानी अगर कोई एक लाख का प्रोजेक्ट शुरू करता है तो उसे केवल दस हजार रुपये जमा करने होते हैं। बाकी 90 हजार तक की मदद सरकार करती है। विभाग की टीम खुद मौके पर आकर बकरियों का सत्यापन और टैगिंग करती है जिससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहती है। इस योजना की रीढ़ इसका क्लस्टर मॉडल है, जिसमें हर गोट वैली में कम से कम 100 बकरी इकाइयों का लक्ष्य रखा गया है। यह मॉडल बकरी पालन को पारंपरिक गतिविधि से निकालकर एक संगठित ग्रामीण उद्योग में बदलने की दिशा में बड़ा कदम है।



राज्य में बकरी पालन को संगठित, वैज्ञानिक और व्यावसायिक रूप देने की दिशा में पशुपालन विभाग लगातार काम कर रहा है। विभाग के निदेशक डा. उदयशंकर के मुताबिक, ‘उन्नत नस्ल सुधार, नियमित टीकाकरण, स्वास्थ्य शिविर, प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन के जरिए इस सेक्टर को मजबूत किया जा रहा है। साथ ही, अनुदान, बीमा और बाजार से जोड़ने की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जा रही है, ताकि पशुपालकों को हर स्तर पर सहयोग मिल सके। वह बताते हैं कि विभाग की कोशिश सिर्फ उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे एक सस्टेनेबल रोजगार मॉडल में बदलना है, खासतौर पर ग्रामीण महिलाओं और बेरोजगार युवाओं के लिए।


इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए उत्तराखंड भेड़ एवं ऊन विकास बोर्ड के सीईओ डा. जी.एस. खड़ायत कहते हैं, बकरी पालन कम निवेश में अधिक लाभ देने वाला ऐसा मॉडल है, जो पहाड़ी परिस्थितियों में भी आसानी से अपनाया जा सकता है। यह आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मजबूत कदम है। ‘गोट वैली’ जैसी पहलें अब सिर्फ योजना नहीं रहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाले ग्राउंड-लेवल मॉडल बन चुकी हैं, जो आने वाले समय में बड़े बदलाव की नींव रख सकती हैं।











