- अतुल्य उत्तराखंड के लिए साधना त्रिपाठी और विकास जोशी
छोटी सी उम्र… नन्हें हाथ और उनमें जकड़ा हुआ मोबाइल। घर में इधर-उधर दौड़ते बच्चे को एक जगह रोकने का सबसे आसान तरीका लगता है स्क्रीन। यहीं से शुरुआत होती है उस सफर की, जो खेल के मैदान से नहीं, बल्कि वीडियो के एक क्लिक से शुरू होता है। छह-सात साल की उम्र में वीडियो, नौ-दस साल तक आते-आते सोशल मीडिया अकाउंट और टीनऐज तक पहुंचते-पहुंचते ‘सेलिब्रिटी’ बनने की बेचैनी और दबाव। इसके बाद जो बचता है, वो है, चिंता, तनाव और धीरे-धीरे गहराता अकेलापन। यह कहानी किसी एक बच्चे की नहीं है। यह उस पूरी पीढ़ी की सच्चाई है, जिसका पहला खिलौना अब मोबाइल बन चुका है, जो स्क्रीन के साथ बड़ी हो रही है, स्क्रीन में जी रही है।
अक्सर माना जाता है कि पहाड़ अब भी ‘सुरक्षित’ हैं… लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। कभी पहाड़ों में शाम का मतलब होता था, ढलती धूप, खेतों के किनारे दौड़ते बच्चे और गांव में गूंजती उनकी आवाज। बच्चे घरों में टिकते ही नहीं थे… खेल ही उनकी दुनिया था। लेकिन अब पूरा मंजर बदल चुका है।
हाल ही में एक स्टोरी के सिलसिले में पहाड़ों का दौरा हुआ। जो देखा, उसने ठहरकर सोचने पर मजबूर कर दिया। मैदानी इलाकों की तरह अब पहाड़ों में भी बचपन स्क्रीन में सिमटने लगा है। एक छोटे से आंगन में चार-पांच बच्चे गोल घेरा बनाकर बैठे थे। न खेल, न एक-दूसरे से बातचीत… एक मोबाइल… और सब उसी में गुम। न शोर… न दौड़ और न वो बेफिक्री…। एक स्क्रीन और उसके आसपास सिमटा हुआ बचपन। यहीं से इस स्टोरी के सिरे जुड़ने शुरू हुए। क्योंकि इस दृश्य ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया, यह एक खतरनाक संकेत है। पहाड़ों में मोबाइल नेटवर्क तो मजबूत हो रहा है…लेकिन बचपन स्क्रीन तक सिमट रहा है। क्या हम इस बदलाव को समय रहते समझ पाएंगे या यह भी एक नॉर्मल बन जाएगा? इसी सवाल पर दुनिया भर में सरकारें अलर्ट हैं। अदालतें सख्त हो रही हैं। नीतियां बन रही हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी वहीं खड़ा है, क्या हम समस्या की जड़ तक पहुंच पा रहे हैं… या सिर्फ उसके लक्षणों का इलाज कर रहे हैं?
जब अदालत ने कहा, ये सिर्फ ऐप नहीं, लत हैं
अमेरिका की एक अदालत ने एक ऐसे मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसने दुनिया भर में सोशल मीडिया कंपनियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने मेटा प्लेटफॉर्म और गूगल पर करीब 60 लाख डॉलर का जुर्माना लगाया है। इसके साथ ही जूरी ने इन कंपनियों को एक 20 वर्षीय युवती को लगभग 56 करोड़ रुपये का हर्जाना देने का आदेश दिया। यह मामला सिर्फ मुआवजे का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करने का है। लॉस एंजेलिस की अदालत में दाखिल याचिका में ‘केली’ नाम की युवती ने आरोप लगाया कि बचपन में फेसबुक और यूट्यूब के इस्तेमाल ने उसे सोशल मीडिया का आदी बना दिया। उसने बताया कि कम उम्र में शुरू हुई यह आदत धीरे-धीरे लत में बदल गई, जिसने उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला। सुनवाई के दौरान जूरी ने माना कि यह सिर्फ एक व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि इन प्लेटफॉर्म्स के डिजाइन और इरादों से जुड़ा मुद्दा है।

लॉस एंजेलिस जूरी की खरी-खरी
• मेटा प्लेटफॉर्म्स ने इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सएप को इस तरह विकसित किया है कि यूजर अधिक समय तक जुड़ा रहे।
• गूगल ने यूट्यूब के जरियए ऐसा कंटेंट इको-सिस्टम तैयार किया है, जो लगातार देखने की आदत को बढ़ावा देता है।
• इन प्लेटफॉर्म्स के संचालन में ऐसे तत्व मौजूद थे, जो लत को बढ़ाने वाले थे और कंपनियां इस जोखिम से पूरी तरह वाकिफ थीं।
• इन प्लेटफॉर्म्स के संचालन के तरीकों में दुर्भावना, उत्पीड़न और भ्रामक रणनीतियों के संकेत मिले।
यह फैसला सिर्फ एक देश या एक केस तक सीमित नहीं है। यह उस वैश्विक बहस को तेज करता है, जिसमें अब सवाल सीधा है, क्या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सिर्फ माध्यम हैं, या वे व्यवहार को नियंत्रित करने वाली मशीनें बन चुके हैं?
क्या बोली कंपनियां?
अमेरिका के इस फैसले के बाद जहां एक ओर कई लोग इसे सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कंपनियों ने इस पर अपना बचाव किया है। मेटा प्लेटफार्म ने इस बारे में सफाई दी। कहा, किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य एक जटिल और बहु-आयामी विषय है, जिसे किसी एक ऐप या प्लेटफॉर्म से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। वहीं, गूगल का कहना है, इस मामले में यूट्यूब की भूमिका को गलत तरीके से समझा गया है।यूट्यूब एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार वीडियो स्ट्रीमिंग सेवा है, जो यूजर्स को जानकारी और मनोरंजन उपलब्ध कराती है।
भारत में भी नीतियां बन रहीं …लेकिन क्या बदलेगा?
अब बात भारत की…। 25 मार्च को कर्नाटक सरकार ने बच्चों के डिजिटल इस्तेमाल को लेकर एक अहम पहल की। राज्य ने एक ड्राफ्ट नीति पेश की है, जिसमें नौवीं से 12वीं तक के छात्रों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित या नियंत्रित करने का प्रस्ताव है। इसी दिशा में आंध्र प्रदेश भी ऐसी ही नीति लाने की तैयारी में है। दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश पहले ही सख्त कदम उठा चुके हैं, जहां 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रोफाइल बनाना ही प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस फैसले के बाद कंपनियों को अपनी नीतियों और सिस्टम में बदलाव करने पड़े। तसवीर साफ है, सरकारें अब इस खतरे को गंभीरता से लेने लगी हैं। लेकिन इन तमाम पहलों के बीच असली सवाल अब भी वहीं खड़ा है, क्या ये नियम जमीन पर उतने ही असरदार साबित होंगे, जितने कागज पर दिखते हैं? और इससे भी अहम, क्या खुद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों को इस लत से बचाने के लिए कुछ कर सकते हैं? जवाब है, हां कर सकते हैं… अगर वो चाहें। जिस तरह इन प्लेटफॉर्म्स को यूजर को लंबे समय तक जोड़े रखने के लिए डिजाइन किया गया है, उसी तरह इन्हें सुरक्षित बनाने के लिए भी बदला जा सकता है। लेकिन तस्वीर सिर्फ इतनी साफ नहीं है। अगर सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल, बच्चों पर उसके असर और अमेरिका में हुए जुर्माने जैसे मामलों को एक साथ रखकर देखें, तो एक बात साफ उभरकर सामने आती है, सिर्फ नियम बना देना इस समस्या का समाधान नहीं है।
यह सिर्फ मोबाइल की समस्या नहीं है… घर, स्कूल और सिस्टम, तीनों की जिम्मेदारी है। यह एक बहु-स्तरीय संकट है, जहां जिम्मेदारी भी साझा है, सरकार नियम बना सकती है, कंपनियां प्लेटफॉर्म बदल सकती हैं, लेकिन सबसे निर्णायक भूमिका घर के भीतर तय होती है। यानी जब तक सरकार, सोशल मीडिया कंपनियां और माता-पिता, सब मिलकर कदम नहीं उठाते, तब तक बच्चों को सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव से सुरक्षित रखना मुश्किल ही रहेगा।

इस फैसले से क्या बदलेगा?
अमेरिका में आए इस फैसले के बाद सबसे पहला असर यह हो सकता है कि मेटा और गूगल जैसे बड़े प्लेटफॉर्म पहले से कहीं ज्यादा सतर्क हो जाएं। बच्चों और टीनएजर्स को अपने प्लेटफॉर्म पर जोड़ने के नियम कड़े किए जा सकते हैं, चाहे वह ऐज वैरिफिकेशन हो या बच्चों के लिए अलग सेफ्टी लेयर तैयार करना। लेकिन इस फैसले का असर सिर्फ कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। यह एक कानूनी नजीर बन सकता है। दुनिया भर में अब ऐसे मामलों की संख्या बढ़ सकती है, जहां माता-पिता और प्रभावित युवा अदालत का दरवाजा खटखटाएं। इसके साथ ही एक और बड़ा बदलाव संभव है, सोशल मीडिया कंपनियों पर यह दबाव बढ़ेगा कि वे अपने प्लेटफॉर्म के डिजाइन को लेकर गंभीर सुधार करें। फिर चाहे वो एल्गोरिद्म की आक्रामकता कम करना हो, बच्चों के लिए डिफॉल्ट सेफ मोड लागू करना या स्क्रीन टाइम नियंत्रण को मजबूती देना। यानी पहली बार कंपनियों को सिर्फ कंटेंट नहीं, बल्कि ‘डिजाइन की जिम्मेदारी’ भी लेनी पड़ सकती है। ये तस्वीर का एक पहलू है, दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है। अब तक का अनुभव यही कहता है कि टेक कंपनियां अक्सर बदलाव दबाव में करती हैं, स्वेच्छा से नहीं। ऐसे में यह देखना बाकी है कि यह फैसला वास्तव में कितनी गहराई तक बदलाव लाता है, या फिर यह भी कुछ समय बाद एक और खबर बनकर रह जाता है।
फैसले आएंगे, नीतियां बनेंगी, लेकिन असली सवाल अब भी वही है, क्या हम बच्चों को इस डिजिटल लत से सच में बचा पाएंगे?

आपके घर में भी है कोई ‘केली’
केली की कहानी को दूसरे देश की कहकर नहीं छोड़ देना चाहिए…क्योंकि उसके किरदार हमारे अपने घरों में मौजूद हैं। ‘केली’ ने छह साल की उम्र में यूट्यूब देखना शुरू किया… और नौ साल में इंस्टाग्राम… और कुछ ही साल में यह आदत लत बन गई। नतीजा यह हुआ कि वह परिवार और दोस्तों से दूर हो गई। यह एक ऐसी दुनिया थी, जो स्क्रीन के अंदर सिमटती चली गई। सिर्फ 10 साल की उम्र में उसमें चिंता, तनाव और भावनात्मक असंतुलन के लक्षण दिखने लगे। हालत यहां तक पहुंची कि कुछ साल बाद उसे थेरेपी की जरूरत पड़ी। सच यही है, केली अकेली नहीं है। आज दुनिया भर में लाखों बच्चे इसी रास्ते पर चल रहे हैं। सोशल मीडिया की लत अब सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि एक उभरती हुई स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। बच्चों का शारीरिक विकास प्रभावित हो रहा है, नींद और दिनचर्या बिगड़ रही है और सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है उनके मानसिक स्वास्थ्य पर। इसे समझने के लिए किसी रिपोर्ट की जरूरत नहीं है। बस अपने आसपास देखिए, घर के कोने में बैठा बच्चा, हाथ में मोबाइल, आंखें स्क्रीन पर टिकी हुई और बाहर खाली पड़ा खेल का मैदान।
सवाल यह नहीं है कि केली कौन है? सवाल ये है, क्या आपके घर में भी एक ‘केली’ बड़ी हो रही है?
दुनिया देख रही है, सीख रही है
ऑस्ट्रेलिया के इस कदम के बाद अब कई देश इसी दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी कर रहे हैं। डेनमॉर्क और न्यूजीलैंड ने इस मॉडल पर रिसर्च शुरू की है। ब्रिटेन में पायलट प्रोग्राम चल रहा है, जहां यह परखा जा रहा है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखना कितना संभव है। अगर ये प्रयोग सफल होते हैं, तो आने वाले समय में यह ग्लोबल रेगुलेटरी ट्रेंड बन सकता है।
ऑस्ट्रेलिया में कड़े नियम: सख्ती का मॉडल
बच्चों को सोशल मीडिया की लत से बचाने के लिए ऑस्ट्रेलिया ने 2025 में एक बड़ा और सख्त फैसला लिया। यहां सोशल मीडिया इस्तेमाल की न्यूनतम आयु 16 वर्ष तय कर दी गई। इस फैसले के बाद सोशल मीडिया कंपनियों को अपने सिस्टम में बदलाव करना पड़ा।
16 साल से कम उम्र के बच्चों की प्रोफाइल निष्क्रिय की गई और नए अकाउंट बनाने के लिए उम्र के सत्यापन की प्रक्रिया को कड़ा किया गया। यह फैसला किसी अनुमान पर नहीं, बल्कि एक सर्वे के आधार पर लिया गया था, जिसमें चौंकाने वाले तथ्य सामने आए थे…
• 10–15 वर्ष के 96% बच्चे सोशल मीडिया पर मौजूद।
• इनमें से 50% से ज्यादा बच्चे साइबर बुलिंग का शिकार।
• 70% से ज्यादा बच्चों को अनुचित कंटेंट का एक्सपोजर।
• यानी यह सिर्फ स्क्रीन टाइम नहीं, बल्कि सेफ्टी और मानसिक स्वास्थ्य का संकट है।
कर्नाटक की पहल: क्या बन सकता है मॉडल!
बच्चों पर सोशल मीडिया के बढ़ते दुष्प्रभाव को देखते हुए कर्नाटक सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। राज्य ने 9वीं से 12वीं कक्षा के छात्रों के डिजिटल इस्तेमाल को लेकर एक ड्राफ्ट पॉलिसी पेश की है, जो सिर्फ प्रतिबंध नहीं, बल्कि डिजिटल अनुशासन बनाने की कोशिश है।
मसौदे के अहम प्रस्ताव….
• रोजाना स्क्रीन टाइम एक घंटे तक सीमित।
• शाम 7 बजे के बाद इंटरनेट बंद करने का सुझाव।
• सोने से कम से कम एक घंटे पहले नो-स्क्रीन नियम।
• चाइल्ड डिजिटल प्लान यानी तय समय के बाद इंटरनेट खुद बंद।
• बच्चों के लिए उम्र-आधारित डिवाइस और ऑपरेटिंग सिस्टम विकसित करने की बात।
• जरूरत पड़ने पर ऑडियो-ओनली विकल्प ताकि बच्चों का स्क्रीन एक्सपोजर कम हो।
कर्नाटक सरकार के मुताबिक, यह नीति इसलिए जरूरी हुई क्योंकि करीब 25% किशोर इंटरनेट एडिक्शन के संकेत दिखा रहे हैं, जिसके चलते नींद की कमी, तनाव, चिड़चिड़ापन और फोकस की समस्या तेजी से बढ़ रही है। इस नीति की सबसे खास बात यह है कि यह केवल रोक की बात नहीं करती, बल्कि आदत बदलने की दिशा में भी काम करती है।
पॉलिसी के अहम पहलू…
• स्कूल पाठ्यक्रम में डिजिटल वेल-बीइंग को शामिल करना।
• साइबर बुलिंग, प्राइवेसी और जिम्मेदार ऑनलाइन व्यवहार की शिक्षा।
• स्कूलों में डिजिटल डिटॉक्स डे और टेक-फ्री पीरियड।
• छात्रों से संपर्क के लिए व्हाट्सऐप के बजाय पारंपरिक डायरी सिस्टम।
• बच्चों के लिए काउंसलिंग व्यवस्था, शिक्षकों को डिजिटल एडिक्शन पहचानने की ट्रेनिंग।
• स्कूलों में AI उपयोग के लिए स्पष्ट गाइडलाइन।
कर्नाटक का यह मॉडल एक अहम संकेत देता है कि समस्या सिर्फ ‘एक्सेस’ की नहीं, बल्कि ‘यूज़’ की है। यानी सिर्फ इंटरनेट बंद कर देना समाधान नहीं है। बच्चों को डिजिटल दुनिया में सुरक्षित और संतुलित तरीके से जीना सिखाना ही असली लक्ष्य है।
कर्नाटक ने एक रास्ता दिखाया है… लेकिन सवाल अब भी बाकी है, क्या बाकी राज्य, खासकर उत्तराखंड जैसे पहाड़ी इलाके, इस मॉडल से कुछ सीखेंगे?
…तकनीक से भाग नहीं सकते, लेकिन बच्चों को उसके हवाले भी नहीं कर सकते
हेडे हैरिटेज एकेडमी, कोटद्वार की प्रिसिंपल डा. रूपमाला सिंह कहती हैं, आज जब हम समाज में बच्चों के व्यवहार को देखते हैं, तो कुछ घटनाएं हमें झकझोर देती हैं। एक शिक्षक और प्रिंसिपल के तौर पर मैं यह साफ कह सकती हूं कि स्क्रीन टाइम के साइड इफेक्ट्स अब सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत बन चुके हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या हम तकनीक से पीछे भाग सकते हैं? जवाब है – नहीं। हम बच्चों के हाथ से मोबाइल छीन नहीं सकते, न ही उन्हें डिजिटल दुनिया से पूरी तरह काट सकते हैं। मोबाइल या इंटरनेट अपने आप में बुरा नहीं है, यह एक टूल है। असल मुद्दा यह है कि इसका उपयोग कैसे, कितना और किसके मार्गदर्शन में हो रहा है। हमें सिक्के का दूसरा पहलू भी देखना होगा। मोबाइल एक बेहतरीन लर्निंग टूल है। बच्चे दुनिया भर की जानकारी तक पहुंच पा रहे हैं
नई भाषाएं सीख रहे हैं। अपनी क्रिएटिविटी को वैश्विक मंच पर ले जा रहे हैं। आज का भविष्य डिजिटल लिटरेसी पर टिका है। अगर हम बच्चों को तकनीक से दूर करेंगे, तो हम उन्हें उनके ही भविष्य से दूर कर देंगे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि स्क्रीन अनलिमिटेड हो जाए। एक शिक्षक के रूप में जो बदलाव दिख रहा है, वह चिंताजनक है, छोटे वीडियो से एकाग्रता कम हो रही है। नींद की कमी और आंखों पर दबाव, फिजिकल एक्टिविटी लगभग खत्म, अनचाहे कंटेंट का एक्सपोजर, ट्रोलिंग और तुलना से मानसिक तनाव। बच्चे अब परिवार के साथ बैठने के बजाय अकेले कमरे में, मोबाइल के साथ रहना पसंद कर रहे हैं। एक स्टडी कहती है आमतौर पर हर नई पीढ़ी पिछली से ज्यादा समझदार होती है, लेकिन आज की ‘डिजिटल जनरेशन’ में यह ट्रेंड उलटता दिख रहा है। जानकारी हाथ में है, लेकिन सामान्य ज्ञान और गहराई घट रही है।
हमें तकनीक से भागना नहीं है, बल्कि उसके साथ संतुलन बनाना है। घर में डाइनिंग टेबल और बेडरूम में नौ-फोन जोन, सोने से पहले नो-स्क्रीन टाइम, बच्चे के कंटेंट पर निगरानी और सबसे जरूरी डांट नहीं संवाद। स्कूलों में ब्लेंडेट लर्निंग सबसे ज्यादा जरूरी है। आज शिक्षा का नया मॉडल है, ब्लेंडेड लर्निंग यानी टेक्नोलॉजी और पारंपरिक शिक्षा का संतुलन। गूगल और एआई जानकारी दे सकते हैं, लेकिन ज्ञान शिक्षक और किताबें ही देते हैं। अगर बच्चा सिर्फ कॉपी-पेस्ट कर रहा है, तो उसकी सोचने की क्षमता खत्म हो जाएगी। इसलिए डिजिटल रिस्पांसिबिलिटी बहुत जरूरी है।


कितना कारगर होगा बैन?
दुनिया भर में बन रहे इन सख्त नियमों के बीच सबसे अहम सवाल यही है, क्या सिर्फ बैन से बच्चों को सोशल मीडिया की लत से बचाया जा सकता है? जवाब उतना आसान नहीं है। आज के डिजिटल दौर में बच्चों के लिए तकनीकी बाधाओं को पार करना मुश्किल नहीं। ज्यादातर बच्चों के पास अपना मोबाइल नहीं होता, लेकिन वे घर के फोन तक आसानी से पहुंच जाते हैं। सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि बच्चे खुद मोबाइल तक नहीं पहुंचते, मोबाइल उनके हाथ में दिया जाता है। आज यह आम होता जा रहा है कि रोते हुए बच्चे को शांत कराने के लिए मोबाइल दे दिया जाए… खाना खिलाने के लिए वीडियो चला दिया जाए… और धीरे-धीरे यही आदत ‘लत’ में बदल जाती है।
ऐसे में चाहे नियम कितने भी सख्त क्यों न हों, वे तब तक पूरी तरह कारगर नहीं हो सकते, जब तक माता-पिता खुद इस समस्या को समझकर अपनी भूमिका नहीं बदलते। कानून सीमाएं तय कर सकता है… लेकिन बच्चों की आदतें घर के माहौल से बनती हैं। असली सवाल अब यह है, क्या हम बच्चों से पहले खुद को बदलने के लिए तैयार हैं?
सब देख रहे हैं… तो हम कैसे रोकें?
आज ज्यादातर घरों में एक ही सवाल गूंजता है, जब सबके बच्चे मोबाइल देख रहे हैं, तो हम अपने बच्चे को कैसे रोकें? यहीं से समस्या शुरू होती है। दरअसल, धीरे-धीरे हमने एक ऐसा माहौल बना लिया है, जहां बच्चों का घंटों मोबाइल पर रहना ‘नॉर्मल’ माना जाने लगा है। स्क्रीन अब अपवाद नहीं, दिनचर्या बन चुकी है। आज जरूरत बच्चों को समझाने से पहले माता-पिता को समझाने की है। उन्हें यह जानना होगा कि मोबाइल सिर्फ टाइमपास नहीं, व्यवहार बदलने वाला टूल है। सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन नहीं, मानसिक प्रभाव डालने वाला सिस्टम है और सबसे अहम, यह बच्चों को सिर्फ व्यस्त नहीं करता, कई बार उन्हें अकेला, चिंतित और असुरक्षित भी बना देता है।
पैरेंट्स ध्यान दें
स्क्रीन टाइम: चेतावनी या संकट?
3.1 घंटे/दिन (औसत) 13 साल तक की औसत उम्र के बच्चों का स्क्रीन टाइम
3 में से 2 बच्चे WHO और अमेरिकन एकेडमी ऑफ़ पीडियाट्रिक्स की लिमिट से ज्यादा स्क्रीन देख रहे
स्रोत – (Indian Journal of Psychiatry Study)
जोखिम भी है ओपन स्क्रीन एक्सपोजर
(9-17 साल के बच्चों पर सर्वे)
54% बच्चों ने एडल्ट/अनुचित कंटेंट देखा
46% साइबर बुलिंग/ट्रोलिंग का शिकार
46% बच्चों ने डीपफेक/मॉर्फिंग की जानकारी दी
39% बच्चों को अजनबियों से गलत मैसेज
33% बच्चों ने ब्लैकमेल/धमकी का सामना किया
26% बच्चे ऑनलाइन फ्रॉड/स्कैम के शिकार
स्रोत – (LocalCircles Survey)
छोटे बच्चे (2 से 5 साल) – ज्यादा स्क्रीन टाइम
13% बच्चों का स्क्रीन टाइम 8 घंटे रोजाना
70–80% माता-पिता को गाइडलाइंस की जानकारी नहीं
स्रोत – (BMJ Paediatrics Open)
WHO और अमेरिकन एकेडमी ऑफ़ पीडियाट्रिक्स गाइडलाइंस (उम्र के अनुसार)
0–2 वर्ष:स्क्रीन टाइम बिल्कुल नहीं (वीडियो कॉल छोड़कर)
2–4 वर्ष: अधिकतम 1 घंटा प्रति दिन
5 साल से अधिकः समयसीमा और क्या देखना है ये तय करें। (नींद, खेल और पढ़ाई प्रभावित न हो)
उत्तराखंड में बच्चे और डिजिटल वर्ल्ड
- एक्सेस और उपयोग (14–16 वर्ष)
- 93% बच्चों के घर में स्मार्टफोन मौजूद
- 89.3% बच्चे जानते हैं स्मार्टफोन चलाना
उपयोग का पैटर्न - 61.4% बच्चों ने पढ़ाई के लिए फोन इस्तेमाल किया
- 80% बच्चों ने सोशल मीडिया के लिए फोन चलाया
डिजिटल सेफ्टी - 73.8% बच्चों को आता है प्रोफाइल ब्लॉक और रिपोर्ट करना
- 70.4% बच्चों को पता है कैसे प्राइवेट होता है प्रोफाइल
स्रोत – (ASER Report 2024 )










