- अतुल्य उत्तराखंड के लिए जेपी मैठाणी
मोनाल टॉप आज उत्तराखंड के उभरते ट्रेकिंग डेस्टीनेशनों में तेजी से अपनी पहचान बना रहा है। चमोली जिले के देवाल ब्लॉक में स्थित यह ट्रेक रूट खासतौर पर हिमालयी पक्षी मोनाल की मौजूदगी के कारण अलग आकर्षण रखता है। यहां बड़ी संख्या में मोनाल का दिखाई देना इस क्षेत्र को बाकी ट्रेकिंग रूट्स से अलग बनाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस इलाके में मानवीय हस्तक्षेप अपेक्षाकृत कम होने के कारण यहां का प्राकृतिक संतुलन अब भी काफी हद तक सुरक्षित है, जो वन्यजीवों के लिए अनुकूल माहौल तैयार करता है।
मोनाल टॉप तक पहुंचने की यात्रा भी अपने आप में एक अनुभव है। देवाल से वाण गांव तक सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है, जहां से असली ट्रेक की शुरुआत होती है। वाण गांव में ठहरने की सीमित लेकिन सुविधाजनक व्यवस्था उपलब्ध है। यहां से सुबह-सुबह शुरू होने वाला ट्रेक घने जंगलों और शांत पहाड़ी रास्तों से गुजरते हुए करीब 5 किलोमीटर दूर कुकीना खाल तक पहुंचता है। आगे थोड़ी दूरी पर हुनेल नामक स्थान ट्रेकर्स के लिए एक उपयुक्त कैंप साइट के रूप में सामने आता है, जहां पानी और ठहरने की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं। यहीं से लगभग 4 किलोमीटर की चढ़ाई पार करने के बाद ट्रेकर मोनाल टॉप तक पहुंचते हैं, जहां हिमालय का विराट विस्तार और प्रकृति की जीवंतता अपने पूरे रूप में नजर आती है।

मोनाल टॉप का नाम ही इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में पाए जाने वाले हिमालयी पक्षी ‘मोनाल’ पर पड़ा है। जैसे ही ट्रेकर टॉप पर पहुंचता है, सामने खुलता है हिमालय का एक विशाल और मनमोहक कैनवास। चारों ओर फैली पर्वत श्रृंखलाएं—चौखंभा, हाथीपर्वत, बंदरपूंछ, केदार डूंगा, नंदा घुंघुटी और त्रिशूल—एक साथ नजर आती हैं, मानो प्रकृति ने अपने सबसे भव्य दृश्य को यहीं सहेज रखा हो।
मोनाल टॉप से दिखाई देने वाला भू-दृश्य भी उतना ही अद्भुत है। ज्युंरागली और उसके नीचे स्थित रूपकुंड, काली डाक, थारकोट, बगजी बुग्याल, औली और बेदनी बुग्याल जैसे प्रसिद्ध स्थल यहां से साफ दिखाई देते हैं। इसके साथ ही रंणकाधार और रौंटी क्षेत्र के विस्तृत फैलाव के अलावा घाट ब्लॉक के सुतोल, कनोल गांव और तातड़ा छानी का दृश्य इस अनुभव को और भी समृद्ध बना देता है।
सर्दियों के मौसम में यहां का मौसम तेजी से बदलता है, इसलिए शाम चार बजे तक हुनेल कैंप साइट की ओर लौटना सुरक्षित माना जाता है। मोनाल टॉप तक का सफर भी कम दिलचस्प नहीं है। ट्रेक के दौरान बांज और बुरांश के घने जंगलों से गुजरते हुए हर मोड़ पर प्रकृति के अलग रंग देखने को मिलते हैं। इस दौरान रंग-बिरंगा मोनाल पक्षी और दुर्लभ कस्तूरी मृग भी कभी-कभी नजर आ जाते हैं, जो इस ट्रेक को और खास बना देते हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र में कई तरह के हिमालयी पक्षी, कीट, मोलस्क और घुरड़ जैसे वन्यजीव भी पाए जाते हैं।
मौसम के साथ इस ट्रेक का रूप भी बदलता रहता है। बरसात के दिनों में यहां के बुग्याल रंग-बिरंगे फूलों से भर जाते हैं, जबकि सर्दियों में बर्फ की चादर इसे एक एडवेंचर डेस्टिनेशन में बदल देती है, जहां स्कीइंग और स्नो एक्टिविटी की भी संभावनाएं हैं। साफ मौसम में यहां से दिखने वाली ‘विंटरलाइन’ का नजारा इस पूरे अनुभव को यादगार बना देता है—एक ऐसा दृश्य, जिसे शब्दों में बांध पाना आसान नहीं।

ये एक शानदार ट्रेक है, जिसको आसानी से 4-5 दिन में पूरा किया जा सकता है इस मोनाल टॉप के आसपास साल के 4 महीने बर्फ रहती है और इसका क्षेत्र काफी विशाल है।
– जनार्दन थपलियाल, एडवेंचर विंग, जिला पर्यटन विभाग, चमोली
उत्तराखंड के टूरिज्म मैप पर तेजी से उभरते हुए इस ट्रेक को गढ़भूमि एडवेंचर के सीईओ हीरा सिंह गढ़वाली और देवेंद्र सिंह ने सबसे पहले प्रचारित-प्रसारित किया। मोनाल टॉप ट्रेक के बारे में हीरा सिंह बताते हैं कि 2023 के जनवरी माह में वाण गांव के छानी क्षेत्र (पहाड़ के पशुओं का वर्षाकालीन आवास) का अध्ययन शुरू किया और उसके आधार पर ही उन्होंने जिला पर्यटन अधिकारी और जिला अधिकारी चमोली को इस ट्रेक को प्रचारित करने का प्रस्ताव दिया। हीरा सिंह 2019 से ट्रैकिंग टूर का काम कर रहे हैं, 2023 में उन्होंने टूर ट्रेवल एजेंसी का पंजीकरण करवाया और तब से वह इस क्षेत्र के नए-नए ट्रैकिंग रूट को विकसित करने को कोशिश में जुटे हैं।
नर भेड़ों की लड़ाई में फट गई चट्टान! हुनेल से आगे बढ़ते हुए, अगली सुबह का ट्रेक आपको एक और रहस्यमयी जगह तक ले जाता है—मैंड फाड़ा (मेंढ़ फाड़ा)। मोनाल टॉप से थोड़ा नीचे स्थित यह स्थान लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर है, लेकिन इसकी पहचान सिर्फ एक ट्रेकिंग स्पॉट के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत लोककथा के कारण भी है।
स्थानीय बोली में नर भेड़ को मेंढा कहा जाता है, और इसी से इस जगह का नाम पड़ा—मेंढ़ फाड़ा। कहा जाता है कि कभी यहां सुतोल के देवसिंह देवता और वाण के लाटू देवता के मेंढों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। यह कोई साधारण भिड़ंत नहीं थी—दोनों मेंढ़ पूरी ताकत से एक-दूसरे से टकराए, और संघर्ष इतना तीव्र था कि एक मेंढ ने दूसरे को पहाड़ के आर-पार धकेल दिया। इस टक्कर का असर इतना जबरदस्त था कि पहाड़ी चट्टान बीच से फट गई—और वहीं से बना यह अनोखा ‘फाड़ा’। आज भी यह स्थान एक लंबी, सुरंग जैसी दरार के रूप में मौजूद है, जिसे देखकर उस कथा की गूंज महसूस की जा सकती है। हीरासिंह बताते हैं कि उन्होंने अपने दोस्त देवेंद्र के साथ टॉर्च लेकर इस प्राकृतिक सुरंग में लगभग 500 मीटर तक जाने की कोशिश की। ऑक्सीजन की कमी महसूस होते ही उन्हें लौटना पड़ा। यह जगह रोमांच से भरपूर है लेकिन बिना टीम और उपकरणों के यहां नहीं जाना चाहिए। ट्रैकर्स के लिए यह स्थान एक अलग ही अनुभव देता है—जहां प्रकृति, रोमांच और लोककथा एक साथ मिलकर सफर को यादगार बना देते हैं। हालांकि, यहां कैंपिंग की संभावना होने के बावजूद शाम होने से पहले हुनेल बेस कैंप लौटना ही सुरक्षित माना जाता है।

मोनाल टॉप ट्रेक के लिए कैसे पहुंचे?
मोनाल टॉप ट्रेक के लिए गढ़वाल और कुमाऊं दोनों स्थानों से पहुंचा जा सकता है –
दिल्ली – काठगोदाम – काठगोदाम से देवाल –
जीप-टैक्सी द्वारा या ग्वालदम तक बस द्वारा, फिर देवाल से वाण फिर से जीप-टैक्सी द्वारा और ग्वालदम से भी देवाल या वाण तक शेयर्ड जीप-टैक्सी मिल जाती है।
दिल्ली से हरिद्वार – ऋषिकेश या देहरादून
वॉल्वो बस और ट्रेन से हरिद्वार, ऋषिकेश या देहरादून पहुंचा जा सकता है। फिर वहां से बस, जीप-टैक्सी और शेयर्ड टैक्सी द्वारा कर्णप्रयाग होते हुए से देवाल – फिर देवाल से जीप-टैक्सी से वाण पहुंचा जा सकता है। यहां से अगले दिन मोनाल टॉप ट्रेक किया जा सकता है।
जाड़ों में मोनाल टॉप के ट्रेक के लिए अच्छे किस्म के विंड और वाटरप्रूफ टैंट, माइनस 10 डिग्री तापमान झेलने के लिए अच्छे स्लीपिंग बैग, मैट्रेस, अच्छे क्वालिटी का वाटरप्रूफ बैकपैक, पौंचू, टोपी, सनग्लास, ग्लव्स, ट्रैकिंग शूज़, थर्मलवियर, टार्च, टायलैट्रिज़ और आवश्यक दवाएं होना जरूरी है।
इस ट्रैक में कहीं भी कोई दुकान या ढाबे नहीं है इसलिए खाने का सामान और खाना पकाने के लिए छोटे गैस सिलेंडर (ब्यूटेन सिलेंडर) साथ में ले जाएं। अलग से ड्राई फ्रूट आदि रखना ना भूलें। शीतल हिमालयी जल मिनरल वाटर से कम नहीं है। ट्रैकिंग के दौरान अकेले कहीं ना जाएं- कोई ना कोई साथ में अवश्य रहे।










