आपके अनुभव में जंगलों में आग लगने की सबसे बड़ी वजह क्या है… प्राकृतिक कारण या मानवीय लापरवाही?
देखिए, यह सवाल बहुत सीधा लगता है लेकिन इसका जवाब इतना सरल भी नहीं है। आमतौर पर हम यह मान लेते हैं कि जंगलों की आग ज्यादातर मानवीय लापरवाही से लगती है लेकिन मेरे अनुभव में यह पूरी सच्चाई नहीं है। प्राकृतिक कारण अब पहले से ज्यादा प्रभावी होते जा रहे हैं। खासकर जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का व्यवहार काफी अनिश्चित और आक्रामक हो गया है। आजकल आप देख रहे होंगे कि बिजली कड़कने की घटनाएं बढ़ी हैं। अचानक तेज गर्मी और सूखा पड़ता है। ये सभी परिस्थितियां जंगल में आग लगने की संभावना को बढ़ाती हैं। जहां तक मानवीय कारणों की बात है तो यह भी सच है कि कुछ जगहों पर आग इंसानों की वजह से लगती है। लेकिन आज के समय में जंगलों के आसपास रहने वाली आबादी पहले जैसी नहीं रही। पलायन बढ़ गया है। लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं। ऐसे में यह मान लेना कि हर आग के पीछे इंसानी लापरवाही है थोड़ा अतिशयोक्ति होगी। मेरे हिसाब से प्राकृतिक कारण अब एक बड़ा फैक्टर बनते जा रहे हैं लेकिन असली समस्या यह है कि हम आग को फैलने से रोक नहीं पा रहे हैं।

वन पंचायतों को हमेशा आग रोकने में अहम माना गया है। आज उनकी भूमिका कितनी प्रभावी है?
अगर आप इतिहास देखें तो वन पंचायतें उत्तराखंड की सबसे सफल व्यवस्थाओं में से एक रही हैं। 1930 के दशक से लेकर लगभग 2000 तक। वन पंचायतों ने अपने जंगलों को बहुत अच्छे तरीके से संभाला। चाहे वह आग से बचाव हो या अन्य नुकसान। उस समय एक मजबूत व्यवस्था थी जिसे हम त्रिपक्षीय वन प्रबंधन कह सकते हैं। इसमें तीन पक्ष थे- स्थानीय समुदाय जो जंगल का उपयोग भी करता था और उसकी रक्षा भी करता था। राजस्व विभाग जिसके पास प्रशासनिक अधिकार और कानूनी ताकत थी तीसरा वन विभाग जो तकनीकी सहायता देता था। इस व्यवस्था में संतुलन था। गांव के लोग जानते थे कि यह जंगल उनकी आजीविका का आधार है। चारा, लकड़ी, पानी सब कुछ वहीं से आता था। इसलिए वे खुद ही जंगल की रक्षा करते थे। लेकिन 2000 के बाद, जब उत्तराखंड राज्य बना तब नियमों में बदलाव किया गया। 2001 में जो संशोधन हुआ उसमें वन विभाग को ज्यादा प्रमुख भूमिका दे दी गई और जो संतुलन पहले था वह बिगड़ गया। वन पंचायतें धीरे-धीरे कमजोर हो गईं। उनकी स्वायत्तता कम हो गई। उनका उत्साह खत्म होने लगा। यही सबसे बड़ी कमी है।
क्या यह कहना सही होगा कि नीतिगत बदलावों ने इस समस्या को बढ़ाया है?
बिलकुल। मैं बहुत स्पष्ट रूप से कहूंगा कि नीतिगत बदलाव इस समस्या की जड़ में हैं। पहले जो व्यवस्था थी, उसमें स्थानीय लोगों के पास अधिकार थे तो जिम्मेदारी भी थी। बाद में जो बदलाव हुए उससे लोग सिस्टम से दूर हो गए। एक उदाहरण से बात स्पष्ट करते हैं। जब फायर सीजन शुरू होता है तो जिला स्तर पर और ब्लॉक स्तर पर कई बैठकें होती हैं। इसमें डीएम, एसडीएम और अन्य विभाग शामिल होते हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि वन पंचायत के सरपंचों को इन बैठकों में शामिल ही नहीं किया जाता। आप सोचिए, जिस व्यक्ति की जिम्मेदारी जंगल की रक्षा करना है, जो जंगल के सबसे करीब है उसे ही निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। यह सबसे बड़ी विडंबना है। सरकार कानूनों के अनुसार काम करती है। अगर कानून में वन पंचायतों को शामिल करने का प्रावधान नहीं है तो अधिकारी उन्हें बुलाएंगे ही नहीं। यही वजह है कि वन पंचायतें सिस्टम से कट गई हैं।

आग लगने के बाद शुरुआती 24 घंटों में सबसे जरूरी कदम क्या होने चाहिए?
जंगल की आग को बुझाने के लिए सबसे जरूरी चीज है मैनपावर यानी लोग। आप अमेरिका या कनाडा की बात करेंगे तो वहां हेलिकॉप्टर, विमान, आधुनिक तकनीक सब है। लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में यह संभव नहीं है। यहां जंगलों का क्षेत्र बहुत बड़ा है वह भी दुर्गम इलाकों में फैला हुआ है। ऐसे में आग बुझाने का काम सिर्फ और सिर्फ स्थानीय लोग ही कर सकते हैं। लेकिन समस्या यह है कि लोग अब आगे नहीं आते। इसके कई कारण हैं। उन्हें समय पर भुगतान नहीं मिलता। उनकी मेहनत की कद्र नहीं होती। उन्हें लगता है कि यह सरकार का जंगल है उनका नहीं। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी।
स्थानीय लोगों को जंगल बचाने में ज्यादा प्रभावी तरीके से कैसे जोड़ा जा सकता है?
इसका जवाब सीधा है। युवाओं को जोड़ना होगा। आज गांवों में जो बुजुर्ग हैं उनके लिए पहाड़ों में चढ़ना-उतरना आसान नहीं है। जंगल में आग बुझाना एक जोखिम भरा और मेहनत वाला काम है। यह काम सिर्फ युवा ही कर सकते हैं। लेकिन युवाओं को जोड़ने के लिए सिर्फ अपील करना काफी नहीं है। उन्हें प्रोत्साहन देना होगा। मैं एक सुझाव देता हूं। जंगल संरक्षण में काम करने वाले युवाओं को उनके करियर में वेटेज दिया जाए। सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता मिले तो वे जुड़ेंगे। दूसरा, जंगलों को रोजगार से जोड़ना होगा। अगर युवा को लगे कि जंगल उसके भविष्य का हिस्सा है तभी वह उसे बचाने के लिए आगे आएगा। अगर आप लोगों को जोड़ना चाहते हैं तो आपको उनके साथ संवाद करना होगा। भरोसा बनाना होगा। दूसरा बड़ा बदलाव यह होना चाहिए कि वन विभाग की भूमिका को कंट्रोल से हटाकर सहयोग में बदला जाए। यह बदलाव बिना राजनीतिक इच्छा शक्ति के नहीं आएगा।
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क्या आपको लगता है कि स्थिति अभी भी सुधर सकती है?
बिलकुल सुधर सकती है। लेकिन, इसके लिए हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। वन पंचायतों का मॉडल आज भी प्रासंगिक है। यह एक ऐसा सिस्टम है जिसमें लोग खुद अपने जंगल की रक्षा करते हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें अधिकार भी देने होंगे और सम्मान भी। अगर हम वन पंचायतों को फिर से मजबूत करें, युवाओं को जोड़ें और नीतियों में जरूरी बदलाव करें, तो जंगलों की आग को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन अगर हम उसी तरह हर साल सिर्फ दावे करते रहे तो यह आग और भी भयावह होती जाएगी।

लोगों का भरोसा जीतकर ही बुझाई जा सकती है आग
उत्तराखंड सहित पूरे देश में जंगलों के संरक्षण को लेकर एक बुनियादी सवाल बार-बार सामने आता है। क्या हम जंगलों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं या उन्हें सहेजने की? यही फर्क वन विभाग की वर्तमान कार्यशैली और भविष्य की जरूरतों के बीच सबसे बड़ा अंतर पैदा करता है। आज भी वन विभाग की छवि एक फोर्स की तरह है। खाकी वर्दी, आदेश देने का ढंग और ऊपर से नीचे तक नियंत्रण की एक सख्त व्यवस्था। यह मॉडल औपनिवेशिक दौर की देन है जब जंगलों को राज्य की संपत्ति मानकर उनका प्रबंधन किया जाता था। उस समय उद्देश्य था संसाधनों पर नियंत्रण न कि समुदायों के साथ साझेदारी। लेकिन, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती जंगल की आग जैसी चुनौतियों के दौर में यह दृष्टिकोण न सिर्फ पुराना पड़ चुका है बल्कि कई बार समस्या को और गहरा करता है। पर्यावरण संरक्षण फोर्स से नहीं, लीडरशिप से होता है। जंगलों को बचाने के लिए सबसे जरूरी है लोगों का भरोसा। उनकी भागीदारी और उनका जुड़ाव। कोई भी फोर्स आदेश देकर लोगों को कुछ समय के लिए नियंत्रित तो कर सकती है लेकिन वह लोगों के भीतर जिम्मेदारी और अपनापन पैदा नहीं कर सकती। यही कारण है कि जहां-जहां स्थानीय समुदायों को नेतृत्व मिला वहां जंगल बेहतर तरीके से सुरक्षित रहे। क्योंकि वहां लोग जंगल को सरकार की संपत्ति नहीं बल्कि अपनी आजीविका और भविष्य का आधार मानते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि वन विभाग अपनी भूमिका को कंट्रोल से हटाकर सहयोग में बदले। इसका मतलब यह नहीं कि उसकी जिम्मेदारी कम हो जाए बल्कि यह कि उसकी भूमिका बदल जाए एक नियंत्रक से एक सहभागी और मार्गदर्शक की। वन अधिकारी अगर स्थानीय समुदायों के साथ बैठकर योजना बनाएं उनकी समस्याओं को समझें और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल करें तो न सिर्फ नीतियां बेहतर बनेंगी बल्कि उनका क्रियान्वयन भी अधिक प्रभावी होगा। जंगलों की रक्षा कोई अकेली संस्था नहीं कर सकती। यह एक सामूहिक जिम्मेदारी है। जहां सरकार, समुदाय और प्रकृति के बीच संतुलन जरूरी है। अगर हम सच में जंगल बचाना चाहते हैं, तो हमें वर्दी की ताकत से आगे बढ़कर विश्वास की ताकत को अपनाना होगा। क्योंकि जंगल उसी के साथ सुरक्षित रहते हैं जो उन्हें अपना मानता है।










