राज्य के ऊंचाई वाले जिलों उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ और रुद्रप्रयाग में स्नो-ब्लाइंडनेस यानी बर्फ की चमक से आंखों को होने वाली क्षति के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक लगातार बर्फ पर पड़ने वाली तेज धूप और उससे परावर्तित होने वाली अल्ट्रावायलेट किरणें आंखों की कॉर्निया और रेटिना को नुकसान पहुंचा रही हैं। इसका असर धीरे-धीरे दृष्टि कमजोर होने, आंखों में जलन, धुंधलापन और कई मामलों में स्थायी नुकसान तक पहुंच रहा है। पहाड़ के गांवों में रहने वाले लोग बताते हैं कि सर्दियों के दिनों में बाहर निकलना तक मुश्किल हो जाता है। कई ग्रामीण दिनभर घरों में बंद रहने को मजबूर हैं जबकि मजदूरी और पशुपालन जैसे काम प्रभावित हो रहे हैं।
बर्फीले इलाकों में बढ़ रहा खतरा
उत्तरकाशी जिला अस्पताल के नेत्र रोग विशेषज्ञों के अनुसार हर साल सर्दियों में आंखों से जुड़ी समस्याओं वाले मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। इनमें सबसे अधिक मामले उन लोगों के होते हैं जो लंबे समय तक बर्फ में रहते या काम करते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि बर्फ सूर्य की किरणों को 80 प्रतिशत तक परावर्तित करती है। यही चमक आंखों पर सीधा असर डालती है। लगातार संपर्क में रहने पर आंखों की ऊपरी परत में सूजन, जलन और रोशनी सहन न होने जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। विशेष चिंता की बात यह है कि दूरस्थ गांवों में रहने वाले लोग शुरुआती लक्षणों को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। जब तक वे अस्पताल पहुंचते हैं, तब तक नुकसान बढ़ चुका होता है।
गांवों में लोग सर्दियों में छोड़ देते हैं घर
उत्तरकाशी के हर्षिल, मुखबा, जाड़ुंग और नेलांग जैसे इलाकों में रहने वाले ग्रामीण बताते हैं कि भारी बर्फबारी के दौरान गांवों में जीवन बेहद कठिन हो जाता है। स्थानीय निवासी कमल सिंह कहते हैं कि जब कई दिनों तक लगातार बर्फ गिरती है तो बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। तेज चमक आंखों को चुभती है। कई बार सिरदर्द और आंखों से पानी आने लगता है। ग्रामीण महिलाएं बताती हैं कि पशुओं के लिए चारा और पानी लाने के दौरान उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी होती है। बिना चश्मे के कुछ देर भी बर्फ में रहना मुश्किल हो जाता है।
सेना और आईटीबीपी के जवान भी चपेट में
ऊंचाई वाले सीमांत इलाकों में तैनात सेना और आईटीबीपी के जवान भी इस खतरे से अछूते नहीं हैं। लंबे समय तक बर्फीले इलाकों में गश्त और ड्यूटी के दौरान कई जवान आंखों की समस्याओं से जूझ रहे हैं। एक जवान ने बताया कि कई बार बर्फीले तूफान और तेज चमक के कारण आंखों में इतनी जलन होती है कि कुछ देर तक साफ दिखाई नहीं देता। विशेषज्ञों के अनुसार सुरक्षाबलों को विशेष UV-प्रोटेक्टेड गॉगल्स दिए जाते हैं, लेकिन लगातार कठोर परिस्थितियों में रहने से खतरा बना रहता है।
चश्मा उतारते ही बढ़ जाती है परेशानी
डॉक्टरों के मुताबिक बर्फीले क्षेत्रों में साधारण चश्मा पर्याप्त नहीं होता। सुरक्षा वाले विशेष ग्लास जरूरी हैं। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. एम. पांडे बताते हैं, कई लोग कुछ समय के लिए चश्मा हटाकर काम करने लगते हैं। यही सबसे खतरनाक स्थिति होती है। कुछ मिनट की तेज चमक भी आंखों को नुकसान पहुंचा सकती है। उन्होंने कहा कि शुरुआती लक्षणों में आंखों में जलन, लालिमा, पानी आना, रोशनी से परेशानी और धुंधला दिखाई देना शामिल है। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत जांच करानी चाहिए।

क्या है स्नो-ब्लाइंडनेस?
स्नो-ब्लाइंडनेस आंखों की एक स्थिति है जिसमें बर्फ से परावर्तित UV किरणें आंखों की सतह को नुकसान पहुंचाती हैं। इसे फोटोकेराटाइटिस भी कहा जाता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे त्वचा पर सनबर्न होता है, लेकिन यहां असर आंखों पर पड़ता है।
प्रमुख लक्षण
- आंखों में तेज जलन
- लालिमा और सूजन
- लगातार पानी आना
- धुंधला दिखाई देना
- रोशनी से चुभन
- सिरदर्द
कैसे करें बचाव?
- बर्फीले क्षेत्रों में हमेशा UV-प्रोटेक्टेड चश्मा पहनें
- तेज धूप में लंबे समय तक बाहर रहने से बचें
- बच्चों और बुजुर्गों को अतिरिक्त सुरक्षा दें
- आंखों में जलन होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें
- लगातार बर्फ में काम करने वालों को समय-समय पर जांच करानी चाहिए
जलवायु परिवर्तन भी बढ़ा रहा खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। कई इलाकों में बर्फबारी के बाद अचानक तेज धूप निकलने से चमक और ज्यादा तीखी हो जाती है। इससे आंखों पर यूवी प्रभाव बढ़ रहा है। स्वास्थ्य विभाग अब सीमांत गांवों में जागरूकता अभियान चलाने की तैयारी कर रहा है ताकि लोग समय रहते सावधानी बरत सकें।
स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ी
राज्य स्वास्थ्य विभाग ने सीमांत जिलों में आंखों की जांच शिविर लगाने की योजना बनाई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते सावधानी नहीं बरती गई तो आने वाले वर्षों में पहाड़ी क्षेत्रों में आंखों से जुड़ी बीमारियां और बढ़ सकती हैं। बर्फ के खूबसूरत नजारों के पीछे छिपा यह खतरा अब पहाड़ के लोगों के लिए बड़ी चिंता बनता जा रहा है। पर्यटन की चमक के बीच पहाड़ के बाशिंदे अपनी आंखों की रोशनी बचाने की जंग लड़ रहे हैं।










