प्रकृति की सीमाओं को लांघते हुए और हजारों मील के दुर्गम रास्तों को अपनी पंखों की शक्ति से नापते हुए, एक दुर्लभ विदेशी मेहमान ने उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में दस्तक दी है। अलास्का और कनाडा के बर्फीले मैदानों से उड़ान भरकर ग्रेटर व्हाइट फ्रंटेड गूज नाम का यह दुर्लभ हंस ऐतिहासिक बैजनाथ झील पहुंचा है। यह न केवल इस पक्षी की अद्भुत सहनशक्ति का प्रमाण है बल्कि कुमाऊं के पारिस्थितिक तंत्र के लिए भी एक ऐतिहासिक क्षण है।
ग्रेटर व्हाइट फ्रंटेड गूज को पक्षियों की दुनिया का एथलीट कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यह हंस किसी सुपरफास्ट ट्रेन की गति से आसमान चीरते हुए आगे बढ़ता है। इसकी सामान्य उड़ान गति 48 से 70 किलोमीटर प्रति घंटा होती है लेकिन यदि हवा का रुख अनुकूल हो तो यह 95 से 110 किलोमीटर प्रति घंटे की प्रचंड रफ्तार पकड़ लेता है। हैरान करने वाली बात इसकी निरंतरता है। यह पक्षी दिन-रात लगातार उड़ान भर सकता है और एक ही दिन में 960 किलोमीटर तक का लंबा सफर तय कर लेता है। साइबेरिया से भारत की 4000 किलोमीटर और अलास्का से 9000 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर इसका बैजनाथ पहुंचना किसी चमत्कार से कम नहीं है।
कुमाऊं के इतिहास में पहली बार दर्ज हुई मौजूदगी
बैजनाथ झील जो अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता के लिए जानी जाती है अब वैश्विक पक्षी प्रेमियों के नक्शे पर भी चमकने लगी है। कुमाऊं क्षेत्र में इस प्रजाति की मौजूदगी का अब तक कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं था। हालांकि, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की पुस्तक बर्ड्स ऑफ इंडिया में उत्तराखंड में इसकी मौजूदगी का जिक्र मिलता है लेकिन जमीनी स्तर पर कुमाऊं में इसे पहली बार देखा गया है।

इससे पहले, ऑनलाइन डेटाबेस ई-बर्ड के अनुसार 20 जनवरी 2008 को देहरादून के आसन पक्षी विहार में इसे देखे जाने का रिकॉर्ड दर्ज है। प्राध्यापक दीपक कुमार के नेतृत्व में चल रहे गणना अभियान के दौरान इस दुर्लभ हंस की पुष्टि हुई जिससे वन्यजीव विशेषज्ञों में भारी उत्साह है। ग्रेटर व्हाइट फ्रंटेड गूज को इसके खास शारीरिक लक्षणों से पहचाना जा सकता है। इसकी चोंच के ऊपरी हिस्से पर एक सफेद रंग का पैच होता है जिसके कारण इसका नाम व्हाइट फ्रंटेड पड़ा है। इसके पेट पर काले रंग की टेढ़ी-मेढ़ी धारियां या धब्बे होते हैं और इसके पैर गहरे नारंगी रंग के होते हैं। यह एक पूर्णतः शाकाहारी पक्षी है जो पानी और जमीन दोनों जगह भोजन की तलाश करता है। मुख्य रूप से यह घास, बीज पत्तियां और खेतों में उगे नव-अंकुरित अनाज पर निर्भर रहता है।
जैव-विविधता का सकारात्मक संकेत
विदेशी मेहमानों का इस तरह पहाड़ों की ओर रुख करना पर्यावरण के लिए शुभ संकेत माना जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि प्रवासी पक्षियों का बैजनाथ झील या जिले की नदियों की तरफ आना यहां की समृद्ध जैव-विविधता का परिचायक है। वहीं, कॉर्बेट नेशनल पार्क के पक्षी विशेषज्ञ राजेश भट्ट का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में अगर ये पक्षी हजारों मील दूर से यहां आ रहे हैं तो इसका मतलब है कि बैजनाथ का वातावरण इन्हें सुरक्षित महसूस करा रहा है।
संरक्षण की चुनौती और भविष्य

आमतौर पर यह हंस सर्दियों में उत्तर प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल और हरियाणा के जलीय क्षेत्रों में पाया जाता है। लेकिन बागेश्वर जैसी पहाड़ी घाटी में इसका आना शोध का विषय है। विशेषज्ञों का कहना है कि नदियों और जलाशयों के किनारे लगे पेड़ों और झाड़ियों को संरक्षित करना अनिवार्य है ताकि भविष्य में भी ये मेहमान यहां आते रहें। बैजनाथ झील पर इस विदेशी मेहमान के पड़ाव ने न केवल स्थानीय लोगों को रोमांचित किया है बल्कि वैज्ञानिकों को भी नए डेटा जुटाने का मौका दिया है।
व्हाइट फ्रंटेड नाम के पीछे का कारण
इस हंस के माथे पर चोंच के ठीक ऊपर सफेद रंग की एक पट्टी होती है। दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे इसके चेहरे पर सफेद मास्क लगा हो। इसी विशिष्ट सफेद पट्टी के कारण इसे व्हाइट-फ्रंटेड कहा जाता है। युवा पक्षियों में यह सफेद पैच नहीं होता यह वयस्क होने पर ही विकसित होता है। पक्षियों की दुनिया में इसे लाफिंग गूज के नाम से भी जाना जाता है। इसका कारण इसकी आवाज है। जब यह झुंड में उड़ता है, तो इसकी आवाज मनुष्य के हंसने जैसी सुनाई देती है। इसकी आवाज बहुत तेज और ऊंची पिच वाली होती है जिसे काफी दूर से सुना जा सकता है।
रास्ता खोजने की अद्भुत क्षमता

यह पक्षी बिना किसी मैप या जीपीएस के हजारों किलोमीटर का सफर तय करता है। ये वी फॉर्मेशन में उड़ते हैं। इनके पास एक गजब की जेनेटिक मेमोरी होती है। चौंकाने वाली बात यह है कि परिवार के बड़े सदस्य युवा पक्षियों को रास्ता सिखाते हैं। ये अक्सर उसी रास्ते और उसी जगह पर वापस लौटते हैं जहाँ इनके पूर्वज आए थे।








