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    Home»ओपिनियन»Book Review : संवेदनाओं का दर्पण है कविता-संग्रह खेड़ाखाल
    ओपिनियन

    Book Review : संवेदनाओं का दर्पण है कविता-संग्रह खेड़ाखाल

    Book Review - प्रो. हरेंद्र सिंह असवाल पहाड़ी परिवेश से आकर दिल्ली में बसे है इसलिए उनकी भावनाओं से पहाड़ जाता नहीं है। आसपास का परिवेश उन्हें कचोटता है। लेखक ने स्वयं माना है कि 'मैं इन कविताओं में भाव और स्थितियों के बीच फंसा हुआ हूं।'
    teerandajBy teerandajAugust 21, 2024Updated:August 21, 2024No Comments
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    Book Review : खेड़ाखाल छोटी-बड़ी 82 कविताओं का संग्रह है। सोशल मीडिया पर बेबाकी से अपनी बात लिखने वाले लेखक प्रो. हरेंद्र सिंह असवाल का पहला कविता संग्रह है- खेड़ाखाल। लेखक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में वर्षों से लिख रहे हैं। पाठक उनके लेखन से अनभिज्ञ नहीं हैं। कविता-संग्रह पढ़ते हुए सबसे पहले यह प्रश्न सामने आता है कि कवि ने किताब का नाम ‘खेड़ाखाल’ क्यों रखा? इसका उत्तर कवि के जीवन परिचय और संग्रह में ‘खेड़ाखाल’ शीर्षक कविता से मिलता है। कवि के जीवन को संवारने में शिक्षा का विशेष महत्व रहा है। ‘खेड़ाखाल’ शीर्षक कविता में अपने गांव के प्रति लेखक की संवेदना और मार्मिकता प्रदर्शित होती है। कविता में उन लोगों का नाम उजागर किया गया है जिन्होंने लेखक के क्षेत्र में विद्यालयी शिक्षा को बढ़ावा देने में अपना अमूल्य योगदान दिया है।

    पुस्तक में प्रकृति और नैसर्गिक सौंदर्य को सरल शब्दों के माध्यम से संप्रेषित किया गया है। लेखक ने प्रकृति के प्रति अपने प्रेम को माना है कविता जहां अच्छी है वहां बादल और बारिश है, या जहां हिमालय है या नदी है। पेज संख्या 9 पर सूरज कविता में कवि पहाड़ी गांव में उगते सूरज के अलौकिक सौंदर्य का वर्णन किया है। हिमपात कविता में हिमपात के बाद की स्थितियों का वर्णन है। साथ ही बादल, सूर्योदय, हिमालय आदि कविताओं में भी प्रकृति के सौंदर्य का चित्रण प्रस्तुत होता है। वहीं दूसरी ओर खेत और दिल्ली, नए साल के दूसरे ही दिन, गर्मी कविता में दिल्ली शहर की स्थिति का वर्णन है।  लेखक पहाड़ी परिवेश से आकर दिल्ली में बसे है इसलिए उनकी भावनाओं से पहाड़ जाता नहीं है। आसपास का परिवेश उन्हें कचोटता है। लेखक ने स्वयं माना है कि “मैं इन कविताओं में भाव और स्थितियों के बीच फंसा हुआ हूं।

    कवि का हृदय देशप्रेम से ओत-प्रोत है। पहले काव्य संग्रह की प्रथम कविता ‘भारत अपना देश’ में भारत की विविधता में एकता और श्रृंगारिकता को प्रदर्शित किया गया है। फिर ‘हिमालय’ कविता में चीन की कुटिल विस्तारवादी नीति को मद्देनजर रखते हुए कवि ने भारत के हौंसले से विदेशी आक्रांताओं की पराजय की ओर संकेत कर चीन को चेतावनी दी है। कवि की जन्मभूमि हिमालयी क्षेत्र उत्तराखंड है। हिमालय आपदा और पलायन जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। कवि ने इन विषयों को अपनी कविताओं में प्रमुखता से स्थान प्रदान किया है। ‘नदी का जीवन’ और ‘नदी’ कविता के माध्यम से नदी के अस्तित्व को दर्शाते हुए आपदा के कारणों पर चर्चा की गई है। विकास और विनाश कविता हिमालयी क्षेत्रों में अंधाधुंध विकास के प्रयास से होने वाले विनाश की तरफ ध्यान केंद्रित करती है। पलायन, दोहे समय के और सड़क आदि कविताएं सीमांत और दुर्गम क्षेत्रों से हो रहे पलायन पर केंद्रित है। इनमें पलायन की एक वजह गांवों में सड़क पहुंचने में हुई देरी को बताया गया है। गांव कविता में कवि ने एक ओर पलायन के विभिन्न कारण बताएं है, वहीं दूसरी ओर पलायन को मानव हित में उचित भी माना है।

    एक गंभीर लेखक तत्कालीन समस्या पर जरूर विचार करता है और अपनी लेखनी में जगह देता है। ऐसे ही लेखक ने कोरोना काल पर भी कई कविताएं रची है। अच्छे दिन, जीवन, तुमने क्या खोया, सांस लगी है दांव पर, दुआएं, कोरोना काल के दोहे आदि कविताएं कोविड काल के दौरान लिखी गई जान पड़ती है। स्वयं कोविड से ग्रसित हो चुके लेखक के अंतर्मन में बसा भय इन कविताओं में उजागर होता है। साल बदलता है कविता में कोरोना महामारी के भयावह परिणाम प्रदर्शित होते है, साथ ही दरकती मानवीय संवेदनाओं पर चर्चा की गई है।

    यात्रा और चरैवेति चरैवेति कविता यायावर लेखक की यात्रा की समझ यात्रा के उद्देश्य और जिज्ञासा को दर्शाती है। कछुआ, आग, खुद से मिला करो, हिमालय दिवस पर, सूरज से बातें, कुछ कविताएं आदि स्व-केंद्रित रचनाएं हैं।

    आजकल कविता सोशल मीडिया की दुनिया के छद्म को उजागर कर रही है। अपने को औरों से बेहतर और श्रेष्ठ दिखाने के लिए सोशल मीडिया उपयोगकर्ता द्वारा तरह-तरह के तरीके अपनाएं जाते है, जिनका वर्णन कविता में किया गया है। बेटियां होती है घर-घर की रोशनी, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर कविता महिलाओं पर, ‘स्त्री’ कविताओं में स्त्री के अस्तित्व का वर्णन है। बेटियां शीर्षक में गौरवान्वित पिता नज़र आता है। कवि ने वे और जन कविता में रियलिटी शो बिग बॉस के घर में दिखाई जाने वाली महिलाओं और सामान्य भारतीय घरों की महिलाओं में अंतर स्पष्ट करते हुए भारतीय घरों की महिलाओं के समर्पण, त्याग, निष्ठा और प्रबंधन का वर्णन किया है।

    हे मेरी तुम कविता में कवि का पत्नी के प्रति प्रेम भाव प्रदर्शित हुआ है और शादी की पच्चीसवीं सालगिरह पर हे मेरी तुम कविता में पूरे वैवाहिक जीवनक्रम को उद्घाटित किया गया है। लड़कियां सपने देखने के लिए नहीं होती हैं। पुरुष सत्तात्मक समाज और सोच कैसे लड़कियों के सपनों के आड़े आता है यह लेखक ने कविता में दर्शाया है। कवि नारी सशक्तिकरण के समर्थक भी जान पड़ते है। वे अपनी कविता ‘नारी’ में लिखते है –

    तू बेबस नारी न बनियो/ बनियो दुर्गा काली।
    महिषासुर मर्दिनी बनियो/ बनियो समर्थ भवानी।

    कवि धुंआ धुंआ कविता में रूस और यूक्रेन के विध्वंशक युद्ध के दुष्परिणामों पर चिंता व्यक्त करते है, वहीं ‘रूस हमारा दोस्त है’ कविता में रूस का यूक्रेन पर हमला करना अनुचित ठहराते है। कवि ने सामाजिक मुद्दों के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों में भी अपनी दिलचस्पी स्पष्ट की है। ‘चुनाव का वक्त है’ कविता में वर्तमान राजनीति पर कटाक्ष किया गया है। ‘आजकल’ कविता में चुनाव के समय की राजनीतिक गतिविधियों का वर्णन है। सूचना और चुनाव कविता में चुनावी समय मीडिया की स्थिति और देश के माहौल का वर्णन है। हिन्दी चैनल कविता में हिंदी के न्यूज चैनलों की कार्यप्रणाली पर व्यंग्य किया गया है। साध लिया है मौन, तपस्या और लपस्या, सच कहने से, बाबा, चुप्पा, अच्छे दिन, कीचड़ आदि व्यंग्यात्मक कविताएं बेहतरीन बन पड़ी है।

    धर्म, संस्कृति और संस्कारों के प्रति कवि में श्रद्धा भाव है। सिरमुंडा के महादेव कविता में शंकराचार्य द्वारा स्थापित धार्मिक स्थल सिरमुंडा महादेव का वर्णन कवि का अपनी भूमि और संस्कारों के प्रति आस्था का प्रतीक है। श्राद्ध कविता कोविड काल और भारतीय सनातन संस्कृति पर केंद्रित है। ‘राम’ कविता में कवि की भगवान राम के प्रति आस्था प्रदर्शित होती है।

    हरेला उत्तराखंड का लोक पर्व है। लेखक की कविता ‘हरेला पर्व’ उत्तराखंड के लोक गीत “जी रया, जागि रया, यो दिन, यो महैंण कैं नित-नित भ्यटनै रया” का हिंदी अनुवाद जान पड़ता है। बदलती संस्कृति और संस्कारो के पलायन से कवि हृदय छटपटा उठता है, यह छटपटाहट उनकी कविताओं में स्पष्ट देखी जा सकती है। हे मेरी तुम कविता में जन्मदिन मनाने के बदलती तरीके का वर्णन किया गया है। हम कहां से कहां आ गए कविता में लेखक ने चिंता व्यक्त करते हुए लिखा है कि अब पहाड़ी लोगों ने गांव के नज़दीक कस्बानुमा शहर बसा लिया है। शहरी संस्कृति को अपनाते अपनाते हम अपने संस्कार, परंपरा और इतिहास भूल गए। ‘देवता ने कहा’ कविता में उजड़ते गांवों की वजह और बिसरते देवताओं का वर्णन मिलता है।

    कवि ने अपनी कविताओं को जीवंत रूप प्रदान करने के लिए संस्कृत के श्लोकों, अंग्रेजी, उर्दू और देशज (क्षेत्रीय) शब्दों का यथा उचित प्रयोग किया है। कविताओं के विषय नूतन है। कवि की देश, पर्यावरण, समाज, धर्म, राजनीति और संस्कृति जैसे विषयों में गहरी पकड़ है, अतः कविताओं में उनका प्रभाव परिलक्षित होता है। पठनीय है यह कविता-संग्रह।

    ‘खेड़ाखाल’ काव्य संग्रह स्वराज प्रकाशन, 4648/1, 21, अंसारी रोड, दरियागंज नई दिल्ली -110002, दूरभाष : 011 – 23289915 या Email : swaraj_prakashan@yahoo.co.in से प्राप्त किया जा सकता है।

    समीक्षकः डॉ. खीमानंद बिनवाल, हिंदी विभाग
    लक्ष्मण सिंह महर परिसर पिथौरागढ़, सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा

     

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