केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बृहस्पतिवार को संसद में आर्थिक सर्वे 2026 की रिपोर्ट पेश की। इस आधिकारिक रिपोर्ट ने वैश्विक मंच पर भारत की नई हैसियत की पुष्टि कर दी है। भारत अब जापान को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और 4 ट्रिलियन डॉलर के पड़ाव को पार करने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। समीक्षा के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है जो इसे लगातार चौथे वर्ष दुनिया की सबसे तेज प्रमुख इकोनॉमी बनाता है। अगले साल नरमी समीक्षा ने संतुलित तस्वीर पेश करते हुए आगामी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए विकास दर में मामूली नरमी का संकेत दिया है। अगले साल जीडीपी वृद्धि दर 6.8% से 7.2% के बीच रहने का अनुमान है। इस गिरावट की मुख्य वजह वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव को बताया गया है। हालांकि, घरेलू मोर्चे पर निजी उपभोग की हिस्सेदारी जीडीपी के 61.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है जो वित्त वर्ष 2012 के बाद का सर्वोच्च स्तर है।
ट्रंप टैरिफ वार की चुनौतियों का पहली बार उल्लेख
ट्रंप टैरिफ और वैश्विक ट्रेड वार को पहली बार खुले तौर पर उल्लेख किया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय निर्यात पर 50% तक टैरिफ लगाने के फैसले ने भारत के कपड़ा, जेम्स एंड ज्वैलरी और लेदर सेक्टर को प्रभावित किया है। रिपोर्ट के अनुसार, रूस से तेल खरीदने के भारत के फैसले और यूक्रेन मुद्दे पर तटस्थता के कारण अमेरिका ने यह सख्त रुख अपनाया है। सर्वे में माना गया है कि आज के दौर में मजबूत इकोनॉमी होने के बावजूद देशों को करेंसी और ग्लोबल मार्केट की अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा है।
निवेश और रोजगार
राहत भरी तस्वीर रोजगार के मोर्चे पर सर्वे ने सकारात्मक आंकड़े पेश किए हैं। 15 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए बेरोजगारी दर 2017-18 के 6% से घटकर 2023-24 में 3.2% पर आ गई है। सरकार का पूरा जोर इन्फ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा पर है। पिछले साल पूंजीगत व्यय का 75% हिस्सा केवल रक्षा, रेलवे और सड़क परिवहन पर खर्च किया गया। विदेशी निवेश के मामले में सेवा क्षेत्र 19.1% इक्विटी प्रवाह के साथ सबसे आगे रहा। हालांकि, समीक्षा ने चेतावनी दी है कि भारत में औद्योगिक अनुसंधान अब भी केवल दवा, आईटी और रक्षा तक सीमित है जिसे व्यापक बनाने की जरूरत है।
अमेरिका नहीं तो यूरोप ही सही
अमेरिका नहीं तो यूरोप सही अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव के बीच भारत ने अपनी रणनीति बदल ली है। तीन साल की लंबी बातचीत के बाद भारत ने यूरोपीय संघ के साथ ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता फाइनल कर लिया है। इसके अलावा यूके, न्यूजीलैंड और ओमान के साथ हुई डील से भारत अब व्यापार के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहेगा। सरकार का लक्ष्य 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है, जिसके लिए 8% की निरंतर ग्रोथ को अनिवार्य माना जा रहा है।

कहीं राहत – कहीं आफत
राहत: वैश्विक बाजार में कच्चे तेल और अन्य कमोडिटी के दाम घट रहे हैं। अच्छी फसल के कारण खाद्य वस्तुओं की कीमतें काबू में रहने की उम्मीद है। हेडलाइन सीपीआई मुद्रास्फीति गिरकर 1.7% पर आ गई है।
आफत: रुपये में गिरावट और कमजोर होते विनिमय मूल्य से ‘इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन’ का खतरा है। सोना, चांदी और तांबे जैसी धातुओं की ऊंची कीमतें कोर इन्फ्लेशन पर दबाव बनाए रखेंगी।
ब्याज दरें: महंगाई काबू में रहने के चलते आरबीआई अगले हफ्ते ब्याज दरों में 0.25% की कटौती कर सकता है। यह इस चक्र की आखिरी कटौती हो सकती है।
भारत-ईयू डील: भारतीय कंपनियों के लिए चुनौती
सस्ती विदेशी कारें: यूरोप से आने वाली लग्जरी कारों पर आयात शुल्क 110% से घटकर 10% होने जा रहा है। इससे टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी देसी कंपनियों को यूरोपीय ब्रांड्स से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलेगी।
वाइन इंडस्ट्री पर दबाव: इस समझौते से यूरोप की वाइन भारत में सस्ती होगी, जिसका असर सुला विनयार्ड्स जैसी प्रमुख घरेलू कंपनियों पर पड़ सकता है।








