उत्तराखंड के जंगल हर साल जलते हैं। यह जुमला अब एक आदत बन चुका है, ऐसी आदत, जिसे हमने खामोशी से स्वीकार कर लिया है। फरवरी से जून के बीच धुआं उठता है, आग फैलती है, कुछ दिनों तक चिंता होती है, फिर बारिश आती है और हम मान लेते हैं, सब कुछ सामान्य हो गया। लेकिन क्या सच में सब कुछ सामान्य है?
इस अंक की कवर स्टोरी ‘जब जंगल रोते हैं…’ सिर्फ एक पर्यावरणीय संकट की कहानी नहीं है। यह उस खामोशी को तोड़ने की कोशिश है, जिसमें हम हर साल इस त्रासदी को देखते हैं, पर समझने से बचते हैं। लंबे समय तक जंगल की आग को एक प्राकृतिक घटना मानकर टाल दिया गया, लेकिन अब सब कुछ सामने है… यह सिर्फ जंगल की आग नहीं, हमारी अपनी बनाई हुई समस्या भी है। यह भी एक संयोग है कि जब यह स्टोरी तैयार की जा रही है, तब उत्तराखंड में कहीं भी बड़े स्तर पर आग की घटनाएं सामने नहीं आईं हैं। लेकिन शायद यही वह समय है जब तैयारी करने की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। यह स्टोरी आज की आग नहीं, हर साल लौटने वाले खतरे की बात करती है और जिसके लिए हम अब भी पूरी तरह तैयार नहीं हैं।
मुझे गांव के वो दिन याद हैं, जब कहीं जंगल में आग लगती थी तो पूरा गांव बिना एक पल गंवाए उसे बुझाने दौड़ पड़ता था। मानों धुंआ दिखते ही कोई अलार्म बज जाता था। कोई ये नहीं सोचता था कि उनकी जान को खतरा हो सकता है। हाथों में हरी डालियां या झाड़, जो भी मिले, लोग आग से लड़ने निकल पड़ते थे। क्योंकि जंगल उनकी जिम्मेदारी हुआ करते थे। आज वही जुड़ाव कहीं कमजोर पड़ गया है। जंगल और समाज के बीच दूरी बढ़ी है, …शायद इसी दूरी ने आग को और बेखौफ बना दिया है। उत्तराखंड के जंगलों की संरचना तेजी से बदल रही है। मिश्रित वनों की जगह चीड़ के विस्तार ने आग के लिए एक स्थायी ईंधन तैयार कर दिया है। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता तापमान और घटती नमी इस संकट को और भड़का रही है। हर बार मौसम को दोष देकर हम अपनी भूमिका से बच नहीं सकते।
तकनीक ने निगरानी को आसान जरूर बनाया है। सैटेलाइट अलर्ट, रियल टाइम डेटा और कंट्रोल रूम… सब मौजूद हैं। लेकिन सवाल सीधा है, क्या हम आग को सिर्फ ‘देख’ रहे हैं या उसे ‘रोक’ भी पा रहे हैं? तकनीक आग का पता लगा सकती है, लेकिन उसे बुझाने के लिए जमीन पर मौजूद इंसान, संसाधन और इच्छाशक्ति की जरूरत होती है और यहीं आकर हम हर साल हार जाते हैं। पहाड़ों में आग को फैसले से रोकने वाली फायर लाइनें नजर तो आती हैं, लेकिन कई जगह टूटी हुई मिलती हैं। कंट्रोल फायर का दायरा सीमित है। समुदाय की भागीदारी के लिए योजनाएं हैं, लेकिन जमीन पर उनका असर अपेक्षित नजर नहीं आता। योजना और हकीकत के बीच का यही अंतर हर साल जंगलों को फिर जलने देता है।

हमने अपनी कवर स्टोरी में सिर्फ समस्या नहीं, बल्कि समाधान की दिशा में भी देखने की कोशिश की है। शीतलाखेत मॉडल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आता है, जहां आग लगने से पहले ही उसे रोकने की रणनीति पर काम किया गया। यह मॉडल हमें सिखाता है कि जंगल की आग से लड़ाई आग लगने के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले शुरू होती है। लेकिन किसी एक मॉडल या योजना से पूरे राज्य की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। आधे-अधूरे उपाय अब काम नहीं आएंगे, एक ऐसा हल खोजना होगा, जिसमें पॉलिसी, टेक्नोलॉजी और समाज तीनों की समान भागीदारी हो। जंगल सिर्फ सरकार के नहीं, हमारे भी हैं।
वन सिर्फ जमीन पर खड़े पेड़ नहीं हैं, हमारी सांसों का आधार हैं, संस्कृति का हिस्सा हैं और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा की गारंटी भी है। जब जंगल जलते हैं, तो केवल पेड़ नहीं जलते, हमारा भविष्य धधकता है। अब वक्त है कि हम इस संकट को मौसमी खबर के रूप में नहीं, बल्कि एक स्थायी चुनौती के रूप में देखें। सवाल यह नहीं है कि जंगल क्यों जलते हैं—सवाल यह है कि क्या हम अब भी उनके जलने की आवाज सुनने के लिए तैयार हैं?










