सवाल : आप 30 साल से सोशल वर्क कर रही हैं लेकिन जेल में हीलिंग और काउंसलिंग का काम कब से और कैसे शुरू हुआ?
जेल में मेरा काम लगभग 2014 से शुरू हुआ। सच कहूं तो यह कोई प्लान बनाकर नहीं हुआ। जेल में काम करना है ऐसा कोई एजेंडा नहीं था। ईश्वर ने मुझे यहां भेजा। जब हमने घर बनाया तो वह जेल के बिल्कुल पास बना। तब मेरे मन में विचार आया कि जो लोग अंदर बंद हैं उनकी मानसिक स्थिति कैसी होगी? मैं बचपन से ही संवेदनशील रही हूं। किसी का दुख देखती हूं तो लगता है कि कुछ करना चाहिए। मेरी एक मित्र मीना कैंथोला जी के साथ मैं जेल प्रशासन से मिलने गई। पहले महिलाओं के लिए अनुमति मिली फिर किशोर बच्चों के लिए और बाद में पुरुष बंदियों के लिए भी। धीरे-धीरे काम का दायरा बढ़ता गया।
जब आपने शुरुआत की थी तब आपका उद्देश्य क्या था? आपको लगता है कि वह पूरा हो रहा है?
शुरुआत में मेरा एक ही उद्देश्य था- इनके दुख को थोड़ा हल्का करना। उस समय फोन कॉलिंग या वीडियो कॉलिंग जैसी सुविधाएं नहीं थीं। लोग महीनों तक अपने घर वालों को संदेश नहीं दे पाते थे। कई बंदी मुझसे या किसी सिपाही से कहते थे- मैडम, बस मेरा एक मैसेज घर भिजवा दीजिए। मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात का होता था कि एक इंसान अपनी बात तक बाहर नहीं पहुंचा पा रहा है। वह अंदर ही अंदर टूट जाता था, डिप्रेशन में चला जाता था। आज स्थिति बेहतर है। अब वे खुलकर अपना दुख-सुख बताते हैं। अगर कोई जरूरत है, कोई मानसिक परेशानी है तो वह सीधे कह देते हैं। मुझे लगता है कि मेरा जो उद्देश्य था उन्हें संवाद और आत्मबल देना वह काफी हद तक पूरा हो रहा है।
क्या इन वर्षों में कोई ऐसा बंदी रहा जिसने आपको चौंका दिया हो, सकारात्मक या नकारात्मक रूप से?
ऐसे कई उदाहरण हैं। एक लड़का था जो ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था। उसने बाद में मुझे एक पत्र लिखा। उस पत्र में उसने लिखा कि मैडम मैं कभी गलती नहीं करूंगा। जब कोई व्यक्ति, जो पहले बिल्कुल नकारात्मक सोच में था जब वह अपने अंदर झांकना शुरू करता है तो बड़ा बदलाव होता है। मैंने देखा है कि हीलिंग और काउंसलिंग सिर्फ व्यवहार नहीं बदलती, सोच बदलती है। जिसका मन थोड़ा भी ग्रहणशील है उसमें अद्भुत परिवर्तन आता है। कई लोग बाहर जाकर भी संपर्क में रहते हैं और बताते हैं कि वे अब नई जिंदगी जी रहे हैं। कई बंदियों के व्यवहार में परिवर्तन दिखा। झगड़े कम हुए। कुछ ने पढ़ाई फिर शुरू की तो कुछ ने परिवार से रिश्ते जोड़े। कुल मिलाकर मुझे लगता है कि जिस उद्देश्य से मैंने यह काम शुरू किया था वह पूरा हो रहा है।
जेल में काम करने का विचार आखिर आया कहां से?
जैसा मैंने कहा कि यह कोई पूर्व-नियोजित योजना नहीं थी। ईश्वर ने मुझे यहां भेजा। पति मेरे रिटायर्ड हुए तो हमें यहां जेल के पास जमीन मिली। हमने यहां घर बनाया। घर से जेल की दीवारों को देखते हुए मन में अजीब कौतुहल होता था। सोचती थी कि दीवार के उस पार लोग कैसे रहते होंगे। वह क्या सोचते होंगे। तब लगा कि शायद यही मेरा अगला कार्यक्षेत्र है। अगर व्यक्ति संवेदनशील होगा तो समझेगा कि कोई भी अपनी इच्छा से जेल नहीं आता। बहुत लोग आवेश में, दुर्घटनावश या परिस्थितियों में फंसकर आते हैं। शुरुआत में एक जेलर साहब ने मुझसे पूछा था, आपको डर नहीं लगता। उस समय मैंने उनसे कहा था कि अब मुझे ये अपने बच्चों जैसे लगते हैं। जेल में डॉक्टर हैं, बैंक अधिकारी हैं, पढ़े-लिखे लोग हैं और बिल्कुल अनपढ़ भी। लेकिन जब हम हीलिंग के जरिये उनका सेंस जगाते हैं और वह अपने भीतर झांकते हैं तो उन्हें लगता है कि उनके अंदर अपार क्षमता है।
एक महिला होकर पुरुष कैदियों के बीच काम करना, क्या कभी कठिन लगा?
बाहर के लोगों ने जरूर कहा कि जेल का माहौल महिलाओं के लिए ठीक नहीं। लेकिन मुझे अंदर कभी असुरक्षा महसूस नहीं हुई। मुझे लगता है कि मेरी उम्र का भी फैक्टर हो सकता है। शुरुआत में हल्की हिचक महसूस हुई थी। तब मैं अपने पति को लेकर जाती थी। वह पीछे बैठे रहते थे। बाद में सब सामान्य हो गया। अब कोई हिचक, कोई परेशानी नहीं होती। दूसरी बात, जेल में इतने वर्षों से काम कर रही हूं कि सब मुझे जानने लगे हैं। वहां से भरपूर सहयोग मिलता है। मैं अनुशासन में भी रहती हूं। हर जगह आप अपनी मर्जी से नहीं जा सकते। लेकिन नियमों का पालन करते हुए भी बहुत काम किया जा सकता है।
क्या कभी ऐसा लगा कि आप टूट गई हैं या कुछ ठीक नहीं हो रहा?
नहीं, टूटने जैसा कभी नहीं लगा। थकान आती है लेकिन जब प्रशासन भी सराहना करता है और बंदियों में बदलाव दिखता है, तो ऊर्जा मिलती है। कभी-कभी पुलिसकर्मियों का मूड अलग हो सकता है। नियमों की सीमाएं होती हैं लेकिन यह सब सिस्टम का हिस्सा है। मैं पहले अनुमति लेती हूं, फिर काम करती हूं। हमने जेल में आर्ट क्लास भी शुरू की। एक जगह को खुद पेंट करके तैयार किया। 2–3 महीने की काउंसलिंग और हीलिंग के बाद जब किसी का थॉट प्रोसेस बदलता दिखता है तो वही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।
अगर आपको राज्य की सभी जेलों में ऐसा मॉडल लागू करने का अवसर मिले तो आप क्या करेंगी?
मेरा मानना है कि जेल के साथ एक अलग काउंसलिंग सेंटर होना चाहिए। खासकर उन युवाओं के लिए जो छोटे या पहली बार के अपराध में आए हैं। उन्हें समय दिया जाए, समझा जाए। सिर्फ सजा देना पर्याप्त नहीं है। अगर हम उनके विचार और प्रवृत्ति को बदल दें तो वे समाज के लिए बेहतर इंसान बन सकते हैं। समाज को सिर्फ बोलकर नहीं बदला जा सकता। काम करके उदाहरण देना होगा। आप खुद देखिए, कभी कभार ऐसा इंसान भी जेल भेज दिया जाता है जिससे अनजाने में अपराध हुए हैं। उसका मन निर्मल होता है। ऐसे लोग जब जेल भेज दिए जाते हैं और वहां आदतन अपराधियों के साथ उन्हें रहना होता है तो उनको कितना कष्ट होता होगा। इसके अलावा हत्या के लिए जो प्रक्रिया होती है वही किसी प्रेमी के लिए भी होती है, जो परिवार वालों के दबाव में प्रेमिका के मुकरने पर जेल में होता है। इसलिए सबसे पहले मामलों को कैटेगरी वाइज बांटने की जरूरत है। एक ही तराजू में सबको तौलने से नुकसान होगा। जो कैदी सुधर सकते हैं वह भी बिगड़ जाते हैं।

इस पूरे सफर को आप कैसे देखती हैं?
हीलिंग सिर्फ बीमारी ठीक करना नहीं है यह चरित्र को निखारना है। यह नकारात्मक विचारों को हटाने में मदद करती है। मुझे लगता है कि अगर हम एक भी व्यक्ति की सोच बदल पाए तो समाज बदलने की दिशा में एक कदम है।
अनकहे पछतावे की बीच…
जेल की ऊंची दीवारों के पीछे सिर्फ अपराध की कहानियां नहीं होतीं। वहां अधूरे सपने। बिखरे रिश्ते और अनकहे पछतावे भी कैद होते हैं। मैं बचपन से संवेदनशील रही हूं। किसी का दुख देखती हूं तो लगता है कि कुछ करना चाहिए। सबसे ज्यादा दुख इस बात का होता था कि इंसान अपनी बात तक बाहर नहीं पहुंचा पा रहा है। वह अंदर ही अंदर घुटता था डिप्रेशन में चला जाता था। काउंसलिंग का पहला कदम था उन्हें बोलने देना। सुनना। बस सुनना। अपराधी भी एक इंसान होता है। हीलिंग व्यवहार नहीं, सोच बदलती है। अगर सोच बदल गई तो जीवन बदल सकता है। सिर्फ सजा देना पर्याप्त नहीं है। अगर हम उनके विचार बदल दें, तो वे समाज के लिए बेहतर इंसान बन सकते हैं।
एक पत्र जिसने दिल छू लिया
इतने वर्षों में कई चीजें हुईं जो रह-रहकर याद आती हैं। कई चेहरे याद हैं। लेकिन, एक पत्र ने दिल छू लिया है। एक युवा बंदी था। वह ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था। वह किसी छोट अपराध में बंद था। उसकी सजा पूरी हुई तो वह उन्हें एक पत्र लिखता है। टूटी-फूटी हिंदी में। उसमें लिखा था-मैडम मैं अब कभी गलती नहीं करूंगा। सच बताऊं तो उस दिन मेरी आंखों में आंसू आ गए। जेल के अधिकारी भी उस पत्र को पढ़कर भावुक हो गए थे। उस दिन लगा कि जो मैं कर रही हूं वह सफल हुआ। अगर मेरी वजह से किसी का भी मन साफ होता है। उसके जीवन में कुछ सकारात्मक बदलाव होते हैं तो इससे बढ़कर मेरे लिए कोई काम नहीं है।
प्राणिक हीलिंग स्कूलों में अनिवार्य किया जाए
आजकल बच्चों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है। यह हर घर की कहानी हो गई है। आप किसी भी अभिभावक से बात करिए, सबकी यही समस्या है। मेरा सुझाव है कि सरकार को स्कूल में प्राणिक हीलिंग अनिवार्य कर देना चाहिए। साथ ही हर इलाके में प्राणिक हीलिंग सेंटर खुलवाने चाहिए। जिन किशोरों के व्यवहार अग्रसिव दिखे उन्हें जरूरी इसकी ट्रेनिंग दिलानी चाहिए। जरूरी नहीं अपराध होने के बाद भी हम सक्रिय हों। प्राणिक हीलिंग के इस्तेमाल से भविष्य के अपराध पर लगाम भी लगाया जा सकता है।

परिवार से मिला संस्कार
माता गृहिणी लेकिन वह आध्यात्मिक थीं। कोटद्वार में पिता राम कुमार कोटनाला (कौटिल्य) बीएसए के पद से सेवानिवृत्त हुए। वह बहुत प्रोग्रेसिव थे। उन्होंने बहुत सी किताबें लिखी हैं। मेरे पिता हमेशा हम लोगों को ऐसे संस्कार दिए जिससे हम समाज में सिर उठाकर जी सकें। मेरे पति डॉ. गोपाल कृष्ण जुयाल की भी परवरिश मेरे जैसे माहौल में ही हुई। इसलिए मुझे ससुराल और मायके में बहुत अंतर नहीं लगा। गिरिबाला जुयाल कहती हैं, प्राणिक हीलिंग का सिद्धांत है कि अपनी कमाई का 10 प्रतिशत हिस्सा समाज में लगाएं। मेरे तीन बच्चे हैं। सभी सेटेल हैं। अच्छी पोस्ट पर हैं। पति की भी पेंशन आती है। इसलिए रुपयों की कभी दिक्कत नहीं हुई। कैदियों के लिए कई चीजें मैं अपने पैसों से करती हूं। साथ ही कुछ कैदियों की आर्थिक मदद भी कर पाती हूं।
जानिए, प्राणिक हीलिंग क्या है
प्राणिक हीलिंग एक ऊर्जा-आधारित उपचार पद्धति है। इसका मूल विचार यह है कि शरीर केवल भौतिक अंगों से नहीं बना बल्कि उसके चारों ओर और भीतर एक सूक्ष्म ऊर्जा-तंत्र भी काम करता है। जब व्यक्ति तनाव, क्रोध, भय, अपराधबोध या बीमारी से गुजरता है तो यह ऊर्जा-तंत्र असंतुलित हो जाता है। प्राणिक हीलिंग का उद्देश्य इसी असंतुलन को ठीक करना है। यह दवाओं या स्पर्श पर आधारित नहीं होती। इसमें शरीर को छुए बिना ऊर्जा को साफ और संतुलित करने का अभ्यास किया जाता है।









