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    कालेश्वर … संगठन से खुली सफलता की राह

    चमोली की इन महिलाओं की यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि सशक्तिकरण केवल नारे से नहीं, अवसर और संगठन से आता है। जब महिलाएं संगठित होती हैं तो पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियां भी उनके हौसले के आगे छोटी पड़ जाती हैं। यह कहानी बताती है कि आत्मनिर्भर भारत की राह गांव की उन महिलाओं से होकर गुजरती है जिन्होंने अपने श्रम, साहस और सामूहिक शक्ति से पहाड़ की खुशबू को बाजार तक पहुंचा दिया है।
    teerandajBy teerandajMarch 16, 2026Updated:March 16, 2026No Comments
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    सुबह की हल्की धूप में चमोली के पहाड़ी गांवों की महिलाएं खेतों की ओर बढ़ती हैं। किसी के हाथ में तुलसी की नर्सरी है, कोई भंगजीरा के बीज सहेज रही हैं तो कोई आंवले और माल्टे को छांटकर प्रसंस्करण इकाई तक पहुंचा रही हैं। कभी ये महिलाएं केवल परंपरागत खेती और घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित थीं लेकिन आज वे उत्पादन से लेकर पैकेजिंग और बाजार तक की पूरी शृंखला की भागीदार हैं। इसे मुमकिन बनाया है हार्क अलकनंदा कृषि व्यवसाय स्वायत सहकारिता, कालेखर (चमोली) ने। इस संस्था ने महिलाओं को केवल आत्मनिर्भर ही नहीं बनाया बल्कि उन्हें स्थानीय अर्थव्यवस्था की धुरी बना दिया। सहकारिता का आधार स्वयं सहायता समूह हैं। जिनमें अधिकांश सदस्य महिलाएं हैं। 210 स्थायी सदस्य हैं। इसमें 95 फीसदी महिलाएं हैं। क्योंकि इस सहकारिता का मॉडल मूलतः महिला-केंद्रित आजीविका के उद्देश्य से ही गठित किया गया है और अधिकांश सक्रिय श्रमिक महिलाएं ही हैं। अप्रत्यक्ष रूप से भी करीब 4000 महिलाएं जुड़ी हैं।

    महिलाओं के समूहों ने मिलकर खेती को व्यवसाय का रूप दिया। जंगली जानवरों से फसल नुकसान की समस्या को देखते हुए महिलाओं ने ऐसी फसलों की ओर रुख किया जिनकी बाजार में मांग अधिक है और जोखिम अपेक्षाकृत कम। जैसे तुलसी, तेजपत्ता, भंगजीरा और कैमामाइल। इस इलाके की महिलाएं केवल खेत तक सीमित नहीं है। वह प्रसंस्करण इकाई में जैम, जेली, चटनी, अचार, हर्बल टी और स्क्वैश जैसे उत्पाद तैयार कर रही हैं। पैकेजिंग, लेबलिंग और गुणवत्ता नियंत्रण की जिम्मेदारी भी वे स्वयं संभाल रही हैं।

    आय में बढ़ोतरी, आत्मविश्वास में इजाफा
    वर्ष 2024–25 में सहकारिता ने 880 सदस्यों से 70.044 मीट्रिक टन कच्चे उत्पादों की खरीद की, जिससे सदस्यों को 22 लाख से अधिक की आय प्राप्त हुई। 139.687 मीट्रिक टन उत्पादों का प्रसंस्करण कर लगभग 97.5 लाख रुपये का मूल्य सृजित किया गया। वहीं 9.6 मीट्रिक टन उत्पादों के विपणन से 2.66 करोड़ रुपये से अधिक का व्यवसाय हुआ। इन आंकड़ों के पीछे असल ताकत उन महिलाओं की है जिन्होंने अपने श्रम को संगठित कर उसे आय में बदला। अब वे परिवार की आर्थिक निर्णय प्रक्रिया में भी भागीदार बन रही हैं।

    कौशल विकास से सशक्तिकरण
    सहकारिता द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में महिलाओं को फल प्रसंस्करण, मशीन संचालन, पैकेजिंग और गुणवत्ता मानकों की जानकारी दी गई। वर्ष 2024 में आयोजित तीन प्रमुख प्रशिक्षण कार्यक्रमों में 90 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इन प्रशिक्षणों ने महिलाओं को तकनीकी दक्षता दी जिससे वे आत्मविश्वास के साथ बाजार की मांग को समझने और उत्पादों को उसी अनुसार तैयार करने लगीं। आंवला और तेजपत्ता उत्पादन कार्यक्रम के तहत सात गांवों में 1000 पौधों का रोपण किया गया, जिसमें 100 किसानों अधिकांशतः महिलाओं की भागीदारी रही। यह पहल भविष्य में स्थायी आय का स्रोत बनेगी।

    बाजार तक सीधी पहुंच
    सहकारिता के उत्पादों का 70 प्रतिशत विपणन फैक्ट्री आउटलेट से हो रहा है जबकि शेष देहरादून और दिल्ली जैसे शहरों तक पहुंच रहा है। ऑनलाइन विपणन की दिशा में भी प्रयास जारी है। यह केवल आर्थिक विकास की कहानी नहीं है बल्कि सामाजिक परिवर्तन की भी कहानी है। जो महिलाएं कभी परदे के पीछे रहती थीं आज वे उत्पादन इकाई की अग्रिम पंक्ति में खड़ी हैं।

    महीने में 10 से 15 हजार रुपये की आय
    सुबह की धूप अभी पूरी तरह पहाड़ों पर नहीं उतरी होती तब तक उतरांव गांव की भानुदेवी अपने आंगन में काम में जुट चुकी होती हैं। कभी टोकरी में माल्टा सजाती हैं कभी अचार के लिए कटे फलों को धूप दिखाती हैं। पंद्रह साल पहले तक उनकी दुनिया सिर्फ खेत तक सीमित थी। आज वही खेत और वही आंगन उनकी कमाई और आत्मसम्मान की कहानी कह रहे हैं। भानुदेवी पिछले 15 वर्षों से हार्क अलकनंदा कृषि व्यवसाय स्वायत सहकारिता से जुड़ी हैं। अब वह हर महीने 10 से 15 हजार रुपये तक कमा लेती हैं। उनके लिए यह सिर्फ आय नहीं, भरोसे की पूंजी है।

    वह हल्की मुस्कान के साथ कहती हैं, यह रकम कम नहीं है। जो लोग बाहर रहकर नौकरी करते हैं वे भी शायद इतने ही पैसे बचा पाते होंगे। मैं घर पर रहकर ही ये पैसे बचा लेती हूं। साथ में खेती भी कर लेती हूं। एक समय था जब उनका परिवार पूरी तरह खेती पर निर्भर था। लेकिन जंगली भालू रातों-रात महीनों की मेहनत उजाड़ देते थे। खेतों में उगी फसल अक्सर बाजार तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो जाती थी। भानुदेवी उस दौर को याद करती हैं। पहले सिर्फ खेती थी और भालू से सब बर्बाद हो जाता था। अब हम माल्टा लेकर आते हैं। अचार और दूसरे सामान बनाने का काम भी करते हैं। इससे माल का पैसा तो मिलता ही है काम करने का भी पैसा मिल जाता है। और सबसे बड़ी बात पैसे समय पर मिल जाते हैं। हर सीजन में माल्टा की खुशबू, अचार की महक और पैक होते उत्पादों की कतार उन्हें यह भरोसा देती है कि मेहनत अब सुरक्षित है। घर की चौखट पार किए बिना, अपने गांव में रहकर, अपने खेत के साथ भानुदेवी ने साबित कर दिया है कि आत्मनिर्भरता दूर शहरों में नहीं, कभी-कभी अपने ही आंगन में उगती है।

    भवानी देवी।
    दमयंती देवी
    भानुमति देवी

    इसी तरह चमोली की भवानी देवी हर सुबह अपने घर सेमा से सहकारिता समिति तक ढाई किलोमीटर का रास्ता तय करती हैं। पहाड़ी पगडंडी पर यह दूरी भले ही छोटी न हो, लेकिन उनके हौसले उससे कहीं बड़े हैं। भवानी देवी तुलसी की खेती करती हैं। मौसम के अनुसार वह तुलसी उगाती हैं, उसे काटकर समिति तक लाती हैं और वहीं प्रसंस्करण कार्य में भी हाथ बंटाती हैं। खेती से होने वाली आय के अलावा उन्हें काम करने का अलग से पारिश्रमिक भी मिलता है। वह बताती हैं कि तुलसी बेचकर वह हर महीने लगभग 10 से 15 हजार रुपये तक कमा लेती हैं। इस आय ने उनके परिवार की तस्वीर बदल दी है। उन्होंने अपने बेटे को बीटेक तक पढ़ाया और बेटी को बीएड कराया। पहाड़ के छोटे से गांव से निकलकर बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना उनके लिए गर्व की बात है। भवानी देवी के लिए यह सिर्फ कमाई नहीं, बल्कि अपने बच्चों के भविष्य में किया गया निवेश है। खेत की मेड़ से लेकर सहकारिता की इकाई तक उनका हर कदम इस विश्वास को मजबूत करता है कि अगर अवसर मिले, तो पहाड़ की महिलाएं अपने सपनों को सच कर सकती हैं।

    नियमित काम से बनी भरोसे की कमाई

    दमयंती देवी का घर सहकारिता से करीब दो से तीन किलोमीटर दूर थिरपाक में है। वह रोज पैदल वहां काम करने आती हैं। सहकारिता में वह फल छांटने, अचार बनाने और पैकिंग जैसे काम करती हैं। वह बताती हैं कि उन्हें महीने में लगभग 8 से 10 हजार रुपये तक मिल जाते हैं। वह कहती हैं, पहाड़ में जहां काम अक्सर मौसम पर निर्भर करता है, वहां नियमित काम मिलना उनके लिए बड़ी बात है। घर लौटकर वह खेती-बाड़ी भी संभालती हैं। यानी खेत का काम भी और सहकारिता का काम भी। दमयंती देवी के लिए यह सिर्फ कमाई नहीं, बल्कि घर खर्च चलाने और परिवार को सहारा देने का भरोसा है।

     

    ग्रीन टी से खुल रही आत्मनिर्भरता की राह

    हार्क अलकनंदा कृषि व्यवसाय स्वायत सहकारिता, कालेखर (चमोली) द्वारा वर्ष 2024–25 में जिन नए उत्पादों पर विशेष काम किया गया उनमें तुलसी ग्रीन टी और कैमामाइल टी प्रमुख रहे। बाजार की मांग को देखते हुए इन उत्पादों की रिसर्च, ट्रायल और उत्पादन शुरू किया गया, जिसका सकारात्मक असर सहकारिता के टर्नओवर पर भी दिखाई दिया। सहकारिता के गणेश उनियाल ने बताया कि इस वर्ष सहकारिता ने कुल 139.687 मीट्रिक टन उत्पादों का प्रसंस्करण किया जिसकी वैल्यू 97,50,030 रुपये रही। वहीं 9.6 मीट्रिक टन प्रसंस्कृत उत्पादों के विपणन से 2,66,74,879 रुपये का व्यवसाय दर्ज किया गया। इन प्रसंस्कृत उत्पादों में हर्बल श्रेणी के उत्पाद विशेष रूप से ग्रीन टी भी शामिल हैं। सात चयनित गांवों में तुलसी, भंगजीरा और कैमामाइल उत्पादन कार्यक्रम के तहत 150 उत्पादकों का चयन किया गया। इन गांवों में तुलसी, भंगजीरा और कैमामाइल के लिए बीज वितरण तथा प्रदर्शन क्षेत्र निर्धारित किया गया जिससे कच्चे माल की स्थानीय उपलब्धता सुनिश्चित हुई। ग्रीन टी की विशेषता यह रही कि यह जंगली जानवरों से अपेक्षाकृत सुरक्षित फसल है और कम लागत में तैयार हो जाती है। महिलाओं ने तुड़ाई, सुखाने, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और लेबलिंग तक की पूरी प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाई। गणेश उनियाल के अनुसार, नए उत्पादों (जिनमें तुलसी ग्रीन टी भी शामिल है) से टर्नओवर में लगभग 15 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। यह केवल एक उत्पाद की सफलता नहीं बल्कि इस बात का प्रमाण है कि संगठित महिला समूह यदि बाजार की मांग को समझकर उत्पादन करें तो पहाड़ की हर्बल फसलें भी आय का मजबूत स्रोत बन सकती हैं।

     

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