ईंट-कंक्रीट का जंगल… गाड़ियों का शोर। पेट्रोल-डीजल के धुएं की गंध। एक दूसरे को धकियाते हुए बढ़ते लोग और दमघोंटू प्रदूषण। मेट्रो शहरों की अब यही पहचान है। ऐसी जगहों पर भला कौन रहना चाहता है… वो भी ऐसे लोग जिन्हें खुले आसमान के नीचे, साफ हवा-पानी और कुदरत के दिलकश नजारों में रहने की आदत हो। मगर, बशीर बद्र एक शेर मजबूरियों की ओर इशारा करता है…
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी…
यूं कोई बेवजह घर छोड़कर नहीं जाता।
बात जब भी पहाड़ और यहां के लोगों की होती है तो पलायन सबसे बड़ा मुद्दा होता है। पलायन का दंश सबने झेला है। ये दर्द किसे नहीं सालता है। कौन होगा जो अपने घर-गांवों को यूं ही वीरान छोड़कर चला जाना चाहता है…। मगर, क्या हर तरफ ऐसी ही मायूसी है। क्या कहीं कोई खुशनुमा तस्वीर नहीं। तो जवाब है …हां इसके इतर भी कुछ खुशनुमा तस्वीरें हैं जिन्हें एकदम नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। शहरों में काम कर चुके युवा, होटल इंडस्ट्री से जुड़े लोग और पढ़े-लिखे स्थानीय परिवार अब अपने पैतृक घरों को नए नजरिये से देखने लगे हैं। यह घर अब केवल उनकी स्मृति नहीं बल्कि आजीविका का साधन भी बन रहे हैं। गांव अब पिछड़ापन नहीं बल्कि संभावनाओं की जमीन है और इस बदलाव के वाहक बने हैं…होम स्टे। इस योजना ने पहाड़ पर बने घरों को दुनिया के पर्यटन नक्शे से जोड़ने का रास्ता खोला है। इस योजना ने पहाड़ के युवाओं को यह भरोसा दिया है कि रोजगार के लिए शहर जाना ही एकमात्र विकल्प नहीं है।
यह बदलाव धीरे-धीरे, घर-घर और गांव-गांव उतर रहा है। यह बदलाव पूरी अर्थव्यवस्था की दिशा मोड़ रहा है। आज उत्तराखंड में छह हजार से अधिक होम स्टे पंजीकृत हैं। पर्यटन विभाग के मुताबिक, नैनीताल में 909 होमस्टे रजिस्टर्ड हैं, जो पूरे उत्तराखंड में सबसे अधिक हैं। इसके अलावा जिले में 995 होटल, रिसॉर्ट और टैंट कॉलोनियां भी संचालित हो रही हैं। बीते 5 साल में कुल 660 नई इकाइयां स्थापित हुई हैं। ये आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि पर्यटन उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है और युवाओं के लिए कमाई के नए रास्ते खोल रहा है। खास यह है कि सीमांत जिले पिथौरागढ़ में 700 से ज्यादा होम स्टे पंजीकृत हो चुके हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि योजना के प्रति लोगों में उत्साह कैसा है। हालांकि, इसका नकारात्मक पहलू भी सामने आया। होम स्टे का लाभ कुछ बाहरी राज्यों से आए लोग भी उठाने लगे है। यही कारण है कि प्रदेश सरकार ने होम स्टे नियमावली में बदलाव किया है। अब स्थानीय निवासियों को ही इस योजना का लाभ मिलेगा।
स्थानीय जीवन का हिस्सा बन रहे पर्यटक
अब पर्यटक गांवों में केवल रुक ही नहीं रहा, वह स्थानीय जीवन का हिस्सा भी बन रहा है। सुबह की चाय खेत की मेड़ पर होती है तो दोपहर का खाना स्थानीय अनाज से बनता है। शाम की बातचीत में गांव की कहानियां शामिल होती हैं। यही अनुभव उत्तराखंड पर्यटन की नई पहचान बन रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं आया। यह उन योजनाओं का नतीजा है, जिन्होंने धीरे-धीरे पहाड़ के आत्मविश्वास को लौटाया। दीन दयाल उपाध्याय गृह आवास योजना ने घरों को होटल बनने का साहस दिया तो वीरचंद्र सिंह गढ़वाली पर्यटन स्वरोजगार योजना ने युवाओं के हाथ में स्टीयरिंग थमाई। अतिथि उत्तराखंड होम स्टे योजना ने मेहमानवाजी को पहचान दी और ट्रैकिंग ट्रैक्शन योजना ने पगडंडियों को रोजगार से जोड़ा।
पहाड़ का युवा सिर्फ नौकरी ढूंढने वाला नहीं है। वह होस्ट है, गाइड है, ड्राइवर है, उद्यमी है और अपने इलाके की पहचान का संरक्षक भी है। उसके लिए पर्यटन अब बाहर से आने वाला कारोबार नहीं बल्कि अपने जीवन, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को दुनिया से जोड़ने का माध्यम भी है। एक दशक पहले तक पहाड़ से शहर की ओर जाने वाला रास्ता एकतरफा लगता था। आज उसी रास्ते पर कुछ कदम उलटे भी दिखने लगे हैं। शहरों में काम कर चुके युवा, रिटायरमेंट के करीब पहुंचे और पढ़े-लिखे स्थानीय लोग अब अपने पैतृक घरों को होम-स्टे में बदल रहे हैं। कोई अपने गांव के ट्रैकिंग रूट को पहचान दिला रहा है तो कोई साहसिक पर्यटन में वाहन और उपकरण लगा रहा है। यह बदलाव किसी एक योजना या एक साल का नतीजा नहीं है। उत्तराखंड में लागू और संचालित पर्यटन स्वरोजगार योजनाओं ने मिलकर एक ऐसा ढांचा खड़ा किया है जिसमें पहाड़ का स्थानीय व्यक्ति केवल मजदूर नहीं बल्कि उद्यमी बन रहा है।
दूरस्थ गांव में बने होम स्टे का हो प्रचार

आंकड़ों के बारे में यह भी कहा जाता है कि वह गुमराह करते हैं। अधिकारी लोग उसे अपने हिसाब से गढ़ लेते हैं। अगर किसी योजना की हकीकत देखनी हो तो बिना जमीन पर उतरे उसे नहीं परखा जा सकता है। होम स्टे की योजना को जानने के लिए भी गांवों में जाना होगा। पहाड़ चढ़ना होगा। ‘अतुल्य उत्तराखंड’ की टीम ने कई होम स्टे संचालकों से संपर्क साधा। सबका यही कहना था कि योजना धरातल पर काम कर रही है। मगर, एक बात और सामने आई। वह यह है कि संचालक चाहते हैं कि योजना का प्रसार प्रचार सरकार करे, क्योंकि पर्यटकों को होम स्टे के बारे में पता चलेगा तभी तो वह पहुंचेगा। जो सड़क किनारे हैं वहां तो ठीक है। मगर, दूरस्थ गांव व पहाड़ के होम स्टे तक पर्यटक पहुंचे इसके लिए सरकार को कुछ कदम उठाने होंगे। चंपावत के अनुज अग्रवाल कहते हैं, कोई ऐसी वेबसाइट डेवलप करानी चाहिए, जहां पर प्रदेश के सभी होम स्टे की जानकारी हो। वहां सिर्फ होम स्टे और आसपास की घूमने की जगहों के बारे में जानकारी हो। अभी लोग अपने स्तर पर प्रमोशन करते हैं, जिन्हें जानकारी है वह तो कर ले जाते हैं। मगर अधिकांश लोग इससे अनभिज्ञ हैं।

सूरत बदलने में मददगार योजनाएं
दीन दयाल उपाध्याय गृह आवास योजना : घर ही होटल

दीन दयाल उपाध्याय गृह आवास योजना उत्तराखंड की उन योजनाओं में है जिसने पर्यटन को गांव के दरवाज़े तक पहुंचाया। इसका मूल विचार है कि स्थानीय लोगों के घरों को ही पर्यटन इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा बनाना। 2022 से 2025 के बीच इस योजना के अंतर्गत 915 लक्ष्यों के मुकाबले 780 परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई। लगभग 44.09 प्रतिशत की स्वीकृति दर के साथ कुल 18,857.58 लाख रुपये का वित्त पोषण हुआ। मैदानी क्षेत्रों में प्रति इकाई 25 प्रतिशत या अधिकतम 7.5 लाख रुपये और पर्वतीय क्षेत्रों में 50 प्रतिशत या अधिकतम 15 लाख रुपये तक का अनुदान तय किया गया। इन प्रावधानों ने यह सुनिश्चित किया कि केवल बड़े होटल या रिसॉर्ट ही नहीं बल्कि छोटे पहाड़ी मकान भी पर्यटन मानचित्र पर आ सकें। दो-तीन कमरों वाले घर, जिनमें कभी रिश्तेदार ठहरते थे अब पर्यटकों के लिए स्थानीय संस्कृति का अनुभव बन गए हैं। इस योजना का प्रभाव केवल आय तक सीमित नहीं है। हर इकाई से 1–2 लोगों को रोजगार की संभावना और कुल मिलाकर 1500 से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार सृजन का लक्ष्य रखा गया। इसके साथ महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी है। किचन, हाउसकीपिंग, स्थानीय व्यंजन और अतिथि सत्कार में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय होती जा रही है।
वीरचंद्र सिंह गढ़वाली पर्यटन स्वरोजगार योजना : पहियों पर चलता भविष्य
यदि गृह आवास योजना ने घरों को रोजगार से जोड़ा तो वीरचंद्र सिंह गढ़वाली पर्यटन स्वरोजगार योजना ने पहाड़ के युवाओं को पर्यटन की गतिशील धुरी से जोड़ा। यह योजना परिवहन, साहसिक पर्यटन और उससे जुड़ी सेवाओं को केंद्र में रखती है। 2022 से 2025 के बीच 1000 के लक्ष्य के मुकाबले 1008 परियोजनाएं स्वीकृत की गईं। लगभग 47.76 प्रतिशत की स्वीकृति दर के साथ 10,534.58 लाख रुपये का वित्त पोषण किया गया। पर्वतीय क्षेत्रों में गैर वाहन मद पर 33 प्रतिशत या अधिकतम 33 लाख रुपये, मैदानी क्षेत्रों में 25 प्रतिशत या अधिकतम 25 लाख रुपये, वाहन मद में 25 प्रतिशत या अधिकतम 10 लाख रुपये और इलेक्ट्रिक बसों पर 50 प्रतिशत या अधिकतम 20 लाख रुपये तक के अनुदान ने इस क्षेत्र में निवेश को व्यवहारिक बनाया। इस योजना ने टैक्सी ऑपरेटर, राफ्टिंग यूनिट, पैराग्लाइडिंग, ट्रेकिंग सपोर्ट सिस्टम और अन्य साहसिक गतिविधियों में स्थानीय भागीदारी को बढ़ाया। प्रत्येक इकाई से 2–3 लोगों को रोजगार और कुल 3000 से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार सृजन की परिकल्पना इस योजना को केवल स्वरोजगार नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था का इंजन बनाती है।

…पहले जहां कहा, गांव का माहौल खराब होगा, आज वहां 37 होम स्टे
28 सितंबर 2018 को टिहरी गढ़वाल के तिवाड़ गांव में पहला होम स्टे शुरू हुआ। तब गांव में ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं थी। आज उसी तिवाड़ गांव में 37 होम स्टे संचालित हो रहे हैं। गांव में पहला होम स्टे खोलने वाले कुलदीप पंवार बताते हैं कि 2016 के आसपास टिहरी झील पर पर्यटकों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी थी। पर्यटक आते थे लेकिन रुकने का कोई साधन नहीं था। लोग हमसे ही पूछते थे कि कहां ठहरें। होटल का विचार तो था लेकिन पूंजी नहीं थी। कुलदीप जिला पर्यटन अधिकारी के पास पहुंचे। वहीं उन्हें होम स्टे योजना के बारे में जानकारी मिली। अधिकारी ने बताया कि कैसे शुरुआत करनी है और सब्सिडी कैसे मिलेगी। यह विचार उन्हें तुरंत पसंद आ गया। हालांकि, आगे का रास्ता आसान नहीं था। जब कुलदीप ने होम स्टे शुरू किया तो गांव में तरह-तरह की बातें होने लगीं। लोगों को डर था कि बाहर के लोगों के आने से गांव का माहौल खराब होगा। लेकिन उन्होंने काम बंद नहीं किया। चार कमरों के अपने घर में से तीन कमरे पर्यटकों के लिए तैयार किए। जैसे ही आमदनी शुरू हुई लोगों की सोच भी बदलने लगी। कुलदीप बताते हैं, इसके बाद धीरे-धीरे गांव के अन्य लोग भी इस काम से जुड़ते चले गए। आज तिवाड़ गांव की खास पहचान यह है कि यहां के अधिकांश होम स्टे महिलाएं संचालित कर रही हैं। जिससे गांव की आर्थिक स्थिति के साथ-साथ महिलाओं की भूमिका भी मजबूत हुई है।

पर्यटकों से सीखे हॉस्पिटैलिटी के गुर : कुलदीप बताते हैं कि शुरुआत में कई व्यावहारिक दिक्कतें आईं। कुछ पर्यटकों ने ही हमें बताया कि कमरा कैसे सजा होना चाहिए। कपड़े कैसे होने चाहिए और सबसे जरूरी हाइजिन यानी साफ-सफाई कितनी अहम होती है। समय के साथ अनुभव बढ़ता गया। अब पर्यटन विभाग की ओर से भी होम स्टे संचालकों को नियमित प्रशिक्षण दिया जा रहा है। गांव की इस पहल को पहचान तब मिली, जब पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज तिवाड़ गांव आए और हमारे होम स्टे में ठहरे। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से बात की। इसके बाद सीएम धामी ने सब्सिडी की राशि बढ़ा दी। इससे न केवल गांव का आत्मविश्वास बढ़ा बल्कि तिवाड़ गांव राज्य में ग्रामीण पर्यटन के एक सफल मॉडल के रूप में उभरकर सामने आया। हमारे गांव को देखते हुए आसपास के गांवों में भी खूब होम स्टे खुले। 637 होम स्टे पूरे टिहरी जिले में चल रहे हैं।
खेती भी करते हैं पर्यटक : तिवाड़ गांव के होम स्टे केवल ठहरने की जगह नहीं हैं बल्कि यहां आने वाले पर्यटकों को ग्रामीण जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव भी मिलता है। कुलदीप पंवार बताते हैं कि कुछ पर्यटक ऐसे होते हैं जिन्हें खेतों में काम करना पसंद आता है। वे कई दिन तक गांव में रुकते हैं और फावड़ा लेकर खेतों में उतर जाते हैं। हम उन्हें खेती के पारंपरिक तरीके बताते हैं। किस तरह जुताई होती है, बीज कैसे डाले जाते हैं और फसल की देखभाल कैसे की जाती है। कुलदीप के अनुसार, यही अनुभव शहर से आए पर्यटकों को दोबारा गांव तक खींच लाता है। मार्केटिंग को लेकर कुलदीप मानते हैं कि पर्यटन विभाग को अभी और बहुत कुछ करने की जरूरत है। तिवाड़ गांव टिहरी झील से करीब 12 किलोमीटर दूर है। यहां नियमित रूप से पर्यटक पहुंचते हैं। इसके साथ ही गांव के लोगों ने कई ट्रैवल और होम स्टे वेबसाइटों पर अपने होम स्टे का पंजीकरण भी करा रखा है।








