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    Home»एडीटर स्पेशल»मानव-वन्यजीव संघर्ष … ये दहशत कब थमेगी?
    एडीटर स्पेशल

    मानव-वन्यजीव संघर्ष … ये दहशत कब थमेगी?

    ...क्योंकि जंगली जानवरों के हमलों में मरने वाले पहाड़ों में रहते हैं। उसकी जान की कोई कीमत नहीं है। शायद इसीलिए उसकी चीखें देहरादून तक नहीं पहुंच रहीं। उसके लिए कभी बड़े शहरों में कैंडल मार्च नहीं निकालेगा, लोगों का खून नहीं खौलेगा। कल्पना कीजिए, देहरादून में अगर गुलदार, बाघ या भालू ने इतनी जानें लीं होती तो क्या लोग ऐसे ही बैठे होते। करोड़ों रुपये खर्च कर कुछ न कुछ बंदोबस्त हो चुका होता। पहाड़ों में रहने वालों की फिक्र किसे है? उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष में पिछले 25 वर्षां में 1262 लोगों की मौत हो चुकी है। साढ़े छह हजार से ज्यादा लोग घायल हुए हैं, लेकिन ये संघर्ष कैसे थमे, ये जानें कैसे बचें, इसका कोई ठोस समाधान नहीं दिखता...। हमें दोनों चाहिए...हमारे लोग भी, वन्यजीव भी...लेकिन किस कीमत पर, किसकी कीमत पर...सवाल बड़ा है।
    Arjun Singh RawatBy Arjun Singh RawatDecember 16, 2025Updated:December 18, 2025No Comments
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    वैसे तो मानव-वन्यजीव संघर्ष का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। दुखद यह है कि दिनों-दिन यह संघर्ष बढ़ता ही जा रहा है। आधुनिक समय में भी मनुष्य ऐसी व्यवस्था नहीं खोज पाया है जिससे यह संघर्ष खत्म हो सके। मनुष्य होने के नाते संघर्ष खत्म करने की जिम्मेदारी हमारी ही है। उत्तराखंड की बात की जाए तो आंकड़े अब डराने लगे हैं। वन्यजीव से संघर्ष में लोगों का जीवन असमय काल का शिकार हो रहा है। उत्तराखंड को वनसंपदा और वन्यजीवों के लिहाज से बेहद समृद्ध माना जाता है। बाघ, गुलदार, हाथी से लेकर अन्य वन्यजीवों का यहां सुरक्षित वासस्थल है लेकिन इंसानों पर हो रहे हमलों को लेकर हालात लगातार चिंताजनक हो रहे हैं। बाघ या गुलदार का प्राकृतिक भोजन जंगल में है। इंसान उसके लिए नई चीज है। उसके बावजूद गुलदारों का आबादी में आकर हमले करना उनके बदलते व्यवहार को दर्शाता है। पूर्व पीसीसीएफ (प्रधान मुख्य वन संरक्षक ) श्रीकांत चंदोला कहते हैं, यह मुद्दा सरकार की प्राथमिकता में है ही नहीं। नहीं तो तकनीक के इस दौर में क्या मुमकिन नहीं है? धीमी आवाज में वह कहते हैं, मरने वाले अधिकांश बेहद गरीब होते हैं। जो पहाड़, गांवों में किसी तरह जीवनयापन करते हैं। शायद इसलिए यह मुद्दा कभी बड़ा नहीं बना। बच्चे, मां-बाप, बेटा-बेटी खोने का गम अखबारों-पत्रिकाओं में खबर पढ़कर नहीं महसूस किया जा सकता।

    भारतीय वन सेवा से सेवानिवृत्त एसएस रसाइली कहते हैं, हमें जानवरों के नजरिये से भी सोचना होगा। पहाड़ों-जंगलों के बीच कितनी सुरंग-पुल बन गए हैं। आप कभी जंगलों के ऊपर से गुजरे पुल के नीचे खड़े होकर देखें। अजीब घनघनाहट होती है। ऐसा लगता है कि जैसे पुल नीचे आ जाएगा। आप-हम जानते हैं कि वह नहीं गिरेगा। लेकिन, बेजुबान जानवर क्या समझेंगे। यह मुद्दा ऐसा है, दोनों पक्ष यानी मानव और वन्यजीव पीड़ित हैं। दोनों के नजरिये से सोचते हुए हल निकालने पर सोचना होगा।

    विशेषज्ञ कहते हैं, वन विभाग को कागजी नहीं, जमीनी शोध करना होगा। ये काम जंगल के किसी एक हिस्से में नहीं बल्कि बड़े स्तर पर हो। तब जाकर मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने की दिशा में ठोस पहले हो सकती है। मैदानी क्षेत्र में बाघों की संख्या में काफी बढ़ोतरी होने की वजह से भी गुलदार दूसरे जंगलों में पहुंच रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्र में तो गुलदार सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं। इसलिए कभी आंगन में खेल रहे बच्चे, खेत में काम कर महिला और घास लेकर घर को लौट रही बुजुर्ग इनका निवाला बन रही है। राज्य के हर जिले में घटनाएं हुई। गुलदारों के हमले के मामले में कुमाऊं के अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्वर के अलावा गढ़वाल के पर्वतीय जिले संवेदनशील श्रेणी में है। उसके बावजूद उत्तराखंड वन विभाग के पास मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए कोई प्रभावी योजना नहीं है। कुछ डिवीजनों को छोड़ अन्य में वनकर्मियों के पास सुरक्षा संसाधन तक नहीं है।

    अब विडंबना की बात करते हैं। सरकार, विशेषज्ञ से लेकर आम लोग तक… सभी इस बात को मानते हैं कि हम लोग ही वन्यजीवों की क्षेत्रों में अतिक्रमण कर रहे हैं। इस कारण यह संघर्ष बढ़ रहा है। लेकिन, कोई ऐसी व्यवस्था नहीं विकसित की जा सकी है जिससे यह संघर्ष रुके। अब भी वन्यजीवों का जो घर है इसका दायरा कम होता जा रहा है। इंसान अपनी मानव बस्ती बढ़ाते जा रहे हैं। विकास के नाम पर तो कभी खेती के नाम पर या फिर कभी मानव बस्तियां बसाने के नाम पर जंगलों पर अंधाधुंध कटान हो रहा है। संसाधनों के लिए हमेशा मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष होता है। विशेष रूप से जल स्रोतों के लिए, जो मानव समाज और वन्यजीवों दोनों को प्रभावित करती है।

    ———————————————————————————————————————————

    केस- 1
    पौड़ी जिले के बगड़ीगाड़ गांव में 13 नवंबर 2025 को रानी देवी (65) पर गुलदार ने हमला कर दिया। हमले में उनकी मौत हो गई। घटना दोपहर करीब एक बजे की है। रानी देवी अन्य दिनों की तरह गांव से कुछ दूर अपनी बहू सपना के साथ मवेशियों के लिए चारापत्ती लेने गई थी। दोपहर करीब एक बजे सपना खाना बनाने घर आ गई, जबकि रानी देवी गांव से करीब 50 मीटर दूर खेत में ही मौजूद थी। इसी दौरान गुलदार ने हमला कर दिया। गुलदार रानी देवी को घसीटते हुए करीब पचास मीटर दूर झाड़ियों में ले गया। काफी इंतजार के बाद भी जब रानी देवी घर नहीं लौटी तो सपना अपने पुत्र कार्तिक के साथ उनकी तलाश में खेत की तरफ आई। जहां गुलदार ने कार्तिक पर भी हमला का प्रयास किया। सपना और आसपास मौजूद लोगों के शोर मचाने पर गुलदार भाग गया। बाद में अन्य ग्रामीण मौके पर आए और रानी देवी की तलाश शुरू कर दी। दोपहर करीब ढाई बजे झाड़ियों में रानी देवी का अधखाया शव मिल गया। ग्रामसभा बगड़ीगाड़ के तोक गांव अलखेतू में नौ नवंबर को भी गुलदार ने सावित्री देवी पर हमला किया था। सावित्री देवी घायल हो गईं थीं।

    केस – 2
    पौड़ी गढ़वाल के पोखड़ा ब्लाक में घंड़ियाल गांव में 15 नवंबर 2025 की दोपहर प्रभा देवी (42) गांव से करीब 500 मीटर दूर खेत में घास काटने गई थीं। तभी अचानक झाड़ियों से गुलदार निकला और प्रभा देवी पर हमला कर दिया। आसपास और भी महिलाएं थीं। गुलदार प्रभा देवी को खींचकर झाड़ियों की ओर जाने लगा। हिम्मती प्रभा देवी के हाथ में दरांती थी। वह दरांती से गुलदार पर वार करने लगीं। तब तक वहां मौजूद अन्य महिलाएं भी शोर करते हुए गुलदार पर पत्थर मारने लगीं। खुशकिस्मती रही कि गुलदार प्रभा देवी को छोड़कर भाग गया। प्रभा देवी बुरी तरह घायल हो गईं। प्रभा देवी को उपचार के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पोखड़ा में भर्ती कराया गया। उनकी गर्दन, सिर और कान के नीचे गुलदार के पंजों के घाव हैं।

    केस – 3
    20 नवंबर को चमोली जिले के विकासखंड पोखरी क्षेत्र में घास लेने गई पाव गांव की 42 वर्षीय रामेश्वरी पर भालू ने हमला कर दिया। देर शाम तक घर नहीं लौटने पर परिजनों और ग्रामीणों ने उसकी तलाश शुरू की। देर रात तक सर्च अभियान चलाया गया, लेकिन अंधेरा बढ़ने और जंगल में खतरा होने के चलते खोज रोकनी पड़ी। 21 नवबंर को फिर तलाश शुरू की गई। कुछ दूरी पर घने जंगल में एक पेड़ के सहारे लेटी हुई रामेश्वरी गंभीर घायल अवस्था में मिली। उनका चेहरा लहूलुहान था। मुंह पर भालू के हमले के गहरे निशान दिखाई थे। भालू ने अचानक उन पर हमला कर दिया, जिससे वह बुरी तरह घायल हो गईं। हमले के दौरान रामेश्वरी किसी तरह भालू के चंगुल से बचकर पास के एक पेड़ के नीचे छिप गई और पूरी रात वहीं पड़ी रही। गंभीर हालत में मिलने के बाद ग्रामीणों ने तुरंत उन्हें अस्पताल पहुंचाया। बाद में उन्हें हेलीसेवा के माध्यम से ऋषिकेस एम्स भी भर्ती कराया गया।

    केस – 4
    आठ जनवरी 2025 को राजेंद्र पंवार (70) और उनकी पत्नी सुशीला पंवार (65) सुबह करीब दस बजे घर के समीप ही देहरादून वनप्रभाग के थानो वन रेंज के अंतर्गत जौलीग्रांट क्षेत्र के जंगल में चारापत्ती लेने के लिए गए थे। दोपहर दो बजे तक वापस नहीं लौटे तो उनके स्वजनों को चिंता होने लगी। इस बीच कोठारी मोहल्ले की एक महिला जो कि जंगल में ही चारापत्ती लेने के लिए गई हुई थी उसने एक व्यक्ति का शव जंगल में पड़े देखा और वह घबराकर गांव में आ गई और उसने आसपड़ोस के लोगों को इसकी सूचना दी। ग्रामीणों ने बताया कि सुबह से ही जंगल से हाथी के चिंघाड़ने की आवाज आ रही थी। एक व्यक्ति ने बताया कि एक मादा हथिनी अपने बच्चे के साथ आबादी क्षेत्र से सटे क्षेत्र में सोलर फेंसिंग के किनारे-किनारे ही घूमती देखी गई। ग्रामीणों को शंका हुई कि इसी हथिनी ने करीब 12 से 1 बजे के मध्य बुजुर्ग दंपति पर हमला कर इन्हें मौत के घाट उतारा। दोनों बुजुर्ग दंपत्ति का शव जंगल में करीब आधा किलोमीटर से अधिक दूरी पर बरामद हुआ था।


     

    देशभर में वन्यजीवों के हमले बढ़े

    वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने जुलाई 2022 में लोकसभा में बताया था, हाथियों ने 2019 से लेकर 2022 तक देश में 1,579 लोगों को मार डाला। इनमें से सबसे अधिक 322 मौतें ओडिशा में हुईं, इसके बाद झारखंड में 291, पश्चिम बंगाल में 240, असम में 229, छत्तीसगढ़ में 183 और तमिलनाडु में 152 मौतें हुईं। सन् 2019 और 2021 के बीच बाघों ने अभयारण्यों में 125 मनुष्यों को मार डाला। इनमें से लगभग आधी मौतें महाराष्ट्र में हुईं।
    तमिलनाडु कैसे घटा रहा मानव-वन्यजीव संघर्ष?
    दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के पश्चिमी घाट की तलहटी में मदुक्करै, बोलुवमपट्टी, मेट्टुपलायम, करमादई और सिरुमुगई वन हैं। इस घने जंगल में जंगली हाथी, जंगली गाय, हिरण, बाघ, तेंदुआ, भालू और अन्य जंगली जानवरों की आवाजाही है। यहां अक्सर जंगली जानवर मानव बस्ती में घुस आते थे। मानव-पशु संघर्ष होता है और जानमाल की हानि होती थी। इसके बाद यहां पर हाथियों को भगाने के लिए एआई तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष में उल्लेखनीय कमी आई है। शहर में हाथियों के प्रवेश बिंदु का पता लगाने के लिए निगरानी कैमरे के साथ एक लाउडस्पीकर भी लगाया जाता है। जिस जगह पर कैमरा लगा है, उसके 500 मीटर के दायरे में अगर कोई जंगली जानवरों की हरकत दिखाई देती है तो लाउडस्पीकर के जरिए उचित आवाज निकालेगा। जिससे आसपास के लोग सतर्क हो जाते हैं। वनकर्मी भी रेस्क्यू ऑपरेशन पर लग जाते हैं। महाराष्ट्र में भी यही प्रयोग किए जा रहे हैं।

    हाथियों की जान पर भी आफत
    वन विभाग के मुताबिक उत्तराखंड में पिछले 25 वर्षों में कुल 573 हाथी विभिन्न कारणों से मारे गए हैं। साल 2025 में अब तक 22 हाथियों की मौत दर्ज की गई है यानी हर महीने लगभग दो हाथी अपनी जान गंवा रहे हैं। एक आंकड़ा वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करता है। किसानों द्वारा खेतों की सुरक्षा के लिए लगाए गए करंटयुक्त तार हाथियों के लिए मौत का जाल साबित हो रहे हैं। 25 वर्षों में 52 हाथी करंट की चपेट में आकर मारे गए, जिनमें से तीन मौतें केवल 2025 में हुई हैं। दूसरी वजह सड़क और रेल मार्गों का विस्तार भी है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 69 हाथी सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए। 29 हाथी ट्रेन की चपेट में आकर जान गंवा चुके हैं। ये हादसे विशेष रूप से रामनगर, हरिद्वार और तराई क्षेत्र में सबसे ज्यादा दर्ज किए गए हैं। राजाजी और कार्बेट पार्क से गुजरने वाले मार्गों पर रात के समय वाहनों की रफ्तार और अंधेरा इन घटनाओं को और बढ़ाता है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि पिछले 25 वर्षों में 80 हाथियों की मौत का कारण अज्ञात है। साल 2025 में ही ऐसे 9 मामले सामने आए हैं, जिनमें मौत की वजह अब तक स्पष्ट नहीं हो सकी। यह स्थिति वन विभाग की जांच और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है।

    मुआवजा राशि 10 लाख रुपये की गई  25 नवंबर 2025 को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वन्यजीव सप्ताह के दौरान मानव वन्यजीव संघर्ष में मुआवजा राशि को 6 लाख से बढ़ाकर 10 लाख कर दी। कैबिनेट ने प्रस्ताव को भी पास कर दिया है। साथ ही घायलों के इलाज का पूरा खर्च भी अब सरकार उठाएगी। यह घोषणा ऐसे परिवारों को राहत देने वाली है, जो इस तरह की दुर्घटनाओं का सामना करते हैं। जानकार मानते हैं कि इन घटनाओं में मानसिक रूप से परेशानी झेल रहे लोगों के लिए साइकाइट्रिक यानी मानसिक रोग चिकित्सक के जरिए इलाज जैसी बातों पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

    जानलेवा हो रहा भालू
    उत्तराखंड में गुलदार के हमले में भले ही सबसे ज्यादा मौतें हुई हों लेकिन, भालू का हिंसक होना चिंता का बड़ा कारण बनता जा रहा है। वर्ष 2000 से अब तक राज्य में भालू के हमले में 71 लोगों की मौत हो चुकी है। जबकि, दो हजार से अधिक लोग घायल हुए हैं। जीव विज्ञानी कहते हैं कि भालू इसलिए हमला अधिक कर रहे हैं, क्योंकि हो सकता है उन्हें जंगल में पर्याप्त भोजन न मिल रहा हो। लगातार बारिश, भूस्खलन, बाढ़ की वजह से न केवल पहाड़ों को नुकसान हुआ है, बल्कि वनस्पतियों को भी नुकसान पहुंचा है। भालू अनुमानत: 3000 मीटर की ऊंचाई पर रहते हैं। लेकिन हाल के दिनों में देखा है कि पौड़ी, कोटद्वार और पछुवादून में भी उसने लोगों पर हमले किए हैं। ये घटनाएं न केवल पहाड़ों पर रहने वाले लोगों के लिए, बल्कि भालुओं के लिए भी चिंताजनक है। भालू अपने शिकार पर पंजे से प्रहार करता है। अगर भालू अपने शिकार को जिंदा छोड़ भी देता है तो उसके घाव इतने गहरे होते हैं कि उसको भरने में वर्षों लग जाते हैं।
    घट रहा हाइबरनेशन
    वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के मुताबिक, एशियाटिक ब्लैक बीयर कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, नेपाल से लेकर अरुणाचल तक में पाया जाता है। अब हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी कम हो रही है, जिससे ठंड भी कम पड़ रही है। जिस कारण ठंडे इलाकों में रहने वाले भालू का हाइबरनेशन (शीत निद्रा) का समय कम हो गया है। भालू को खाना भी आसानी से मिल रहा है। यह खाना जंगलों में नहीं, बल्कि इंसानी आबादी के आसपास मिल रहा है। उत्तराखंड में गोपेश्वर, अल्मोड़ा और जोशीमठ के चार से पांच किलोमीटर के दायरे में, जहां कचरा फेंका जाता है, वहां रात में भालू कचरा खाते हुए आसानी से दिख जाते हैं।

     

     

     

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    Arjun Singh Rawat
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    पत्रकारिता का लंबा करियर। एजेंसी,टीवी, अखबार, मैग्जीन, रेडियो और डिजिटल मीडिया का अनुभव। राष्ट्रीय मीडिया में 15 साल काम करने के बाद पहाड़ों का रुख। पहाड़ के मुद्दों पर खुलकर बोलने का दम। जमीन पर काम करने का जज़्बा और जुनून आज भी वैसा ही, जैसा पहले दिन था।

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