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    कवर स्टोरी

    महामारी से घातक Obesity

    एक समय मोटापा संपन्नता की निशानी मानी जाती थी। लेकिन, अब यह बीमारी का रूप ले लिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया का हर दसवां बच्चा मोटापे की समस्या से ग्रस्त है। भारत में समस्या इस कदर गंभीर है कि 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देशवासियों से अपील करने पड़ी कि वह हर महीने घर में तेल का इस्तेमाल दस प्रतिशत कम करें।
    teerandajBy teerandajOctober 7, 2025Updated:October 9, 2025No Comments
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    Obesity : हाल ही में यूनिसेफ द्वारा आयोजित स्वस्थ आहार पर राष्ट्रीय मीडिया गोलमेज बैठक में यह तथ्य सामने आया कि भारत में कुल रोग-भार में सबसे बड़ा योगदान अस्वास्थ्यकर आहार का है, लगभग 56 प्रतिशत। इसका मतलब हुआ कि खानपान में गड़बड़ी के कारण 56 प्रतिशत लोग बीमार पड़ते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि कुकिंग ऑयल इसका सबसे बड़ा कारण है। भारत उन देशों में शामिल हो चुका है जहां देश को आर्थिक स्वास्थ्य के साथ शारीरिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना पड़ रहा है। विशेषज्ञ बताते हैं कि कुकिंग ऑयल सबसे बड़ा कारण है मोटापे का। भारत में सुबह से लेकर रात तक लोगों को तेल में तला हुआ पदार्थ खाने की आदत बन चुकी है। सब्जी से लेकर समोसे, ब्रेड पकौड़े तक सब कुछ तेल में तला भुना। देश में अधिकांश जगह दिन के खाने की शुरुआत पूरी-कचौरी से की जाती है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट बताती है कि मानव इतिहास में पहली बार है जब मोटे बच्चों की संख्या कम वजन वाले बच्चे से ज्यादा हो गई है। रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में बच्चों की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ कुपोषण नहीं रह गई। मोटापा (Obesity) उससे बड़ी समस्या बनकर उभरी है।

     

    इसका सबसे बड़ा कारण है जंक फूड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड। यह कुपोषण का नया चेहरा है। यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर समय रहते कदम न उठाए गए तो हमारे बच्चे आने वाले वर्षों में मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार बन सकते हैं। यूनिसेफ की वर्ल्ड न्यूट्रिशन रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में अब हर दसवां बच्चा मोटापे से जूझ रहा है। यह आकड़ा लगभग 18.8 करोड़ बच्चों का है। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब मोटापे से पीड़ित बच्चों की संख्या कम वजन वाले बच्चों से ज्यादा हो गई है। 2000 से अब तक पांच से 19 वर्ष की आयु के कम वजन वाले बच्चों की संख्या 13% से घटकर 9.2% रह गई, लेकिन मोटापे से जूझ रहे बच्चों का अनुपात तीन गुना बढ़कर 9.4% हो गया। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि टीवी, सोशल मीडिया पर विज्ञापनों की भरमार इस समस्या के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। अध्ययन में सामने आया है कि बच्चों में विज्ञापन देखकर ज्यादा खाने की इच्छा जागृत होती है। यह सर्वे 170 देशों में किया गया। सर्वे में शामिल 75 प्रतिशत युवाओं का कहना है कि विज्ञापन देखने से उनकी खाने की इच्छा तीव्र होती है। खास बात यह है कि युद्धग्रस्त देशों में भी ऐसे विज्ञापनों की भरमार है।

     

    बच्चों की डाइट पर विज्ञापनों का दबाव
    यूनिसेफ के एक रिपोर्ट के अनुसार बच्चों की डाइट पर अब बाजार की ताकतें हावी हैं। चीनी, नमक और अस्वास्थ्यकर वसा से भरे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड व कोल्ड ड्रिंक उनके खानपान पर कब्जा कर चुके हैं। 170 देशों के सर्वे में 75% युवाओं ने बताया कि उन्होंने पिछले हफ्ते जंक फूड व सॉफ्ट ड्रिंक के विज्ञापन देखे। 60% बुवाओं ने स्वीकार किया कि इन विज्ञापनों से उनकी खाने की इच्छा और बढ़ गई। यही नहीं, संघर्ष या युद्ध-प्रभावित देशों के 68% युवाओं तक भी जंक फूड के विज्ञापन पहुंच रहे हैं। अध्ययन में अभिभावकों को सलाह दी गई है कि वह अपने बच्चे को अधिक से अधिक खेलने के लिए प्रेरित करें। इससे उनका शारीरिक ओर मानसिक विकास तो होगा ही साथ ही वजन बढ़ने की समस्या पर भी लगाम लगेगी। डिजिटल क्रांति के दौर में बच्चों ने मोबाइल व अन्य इलेक्ट्रानिक गैजेट्स से दोस्ती कर ली है। इसलिए अधिकतर बच्चे बाहर खेलने की बजाय घरपर बैठक मोबाइल, टीवी या अन्य चीजों पर समय अधिक बिता रहे हैं। यह समस्या कोरोना के बाद ज्यादा देखी गई।

    मिलेनियल्स जनरेशन जरा याद करें अपना बचपन
    90 के दशक में जब कोई मेहमान घर आता था या कोई विशेष मौका हो तभी पूरी बनती थी। फास्ट फूड जेसी चीज का नाम गांवों के लोग जानते भी नहीं थे। कहीं भोज-न्योता होता था तो लोग बड़े चाव से कई किलोमीटर पैदल चलकर जाते थे। क्योंकि वहां पूरी-सब्जी मिलती थी। अब तो हर घर में रोज बनने वाली चीज हो गई है। सूखी रोटी कोई खाना ही नहीं चाहता। यहां सूखी रोटी का आशय बिना घी और बटर से है। चाट-नमकीन की खपत हर घर में बढ़ गई है। यह सब चीजें तेल में भुनी जाती हैं। शहर की छोड़िए, गांवों के बाजारों में भी चाय समोसे के बगैर बैठकी नहीं होती है। अब तो गांव-कस्बों में भी तमाम प्रकार के फास्ट फूड की दुकानें मिल जाएंगी। जहां लोगों की भीड़ दिखाई देगी। अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल की टिफिन में पराठा-पूरी देते हैं। ऐसे कहने वाले लोग भी मिल जाएंगे जो शान में कहते हैं, जब तक रोटी से घी चूने न लगे तब तक खाने का मजा ही नहीं आता। यह सब आदतें बीमार बना रही हैं। जेन-जी जेनरेशन को तो यह सब बातें पता ही नहीं होंगी। अब तो ऐसे एप आ गए हैं जो दस मिनट में कोई भी सामान डिलिवरी कर देते हैं। चाहे समोसे हो या जलेबी। लेकिन, अगर हमें स्वास्थ्य रहना है तो खानपान पर विशेष ध्यान देना होगा।

    क्या है मोटापा
    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, मोटापे को असामान्य या अत्याधिक वसा संचय के रूप में परिभाषित किया जाता है जो स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करता है। मोटापे को वर्गीकृत करने के लिए आमतौर पर बॉडी मास इंडेक्स (BMI) का पैमाना इस्तेमाल किया जाता है। जहां 25 या उससे अधिक BMI को अधिक वजन माना जाता है। 30 या उससे अधिक BMI को मोटापे की श्रेणी में रखा जाता है। अपने देश में यदि किसी व्यक्ति का बॉडी मास इंडेक्स (BMI) 23.0 और 24.9 किग्रा/वर्ग मीटर के बीच है तो उसे अधिक वजन वाला माना जाता है। यदि उसका BMI 25 किग्रा/वर्ग मीटर या उससे अधिक है, तो उसे मोटा माना जाता है। गंभीर मोटापा तब माना जाता है जब किसी व्यक्ति का BMI 35 या उससे अधिक होता है।

     

     

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