Prof. A P Dimri को वर्ष 2022 में भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान का निदेशक नियुक्त किया गया। भारतीय उपमहाद्वीप क्षेत्र में भू-चुंबकत्व के ज्ञान का प्रचार-प्रसार करने में यह संस्थान 1971 से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के अंतर्गत काम करता है। प्रोफेसर डिमरी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इनवॉयरमेंटल साइंसेज में प्रोफेसर रहेके हैं। प्रारंभिक शिक्षा गोपेश्वर, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी से हुई। इसके बाद उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से 1989 में बीएससी (फिजिक्स) से की। उन्होंने बीएचयू से ही 1992 में एमएससी जियोफिजिक्स (मौसम विज्ञान) की शिक्षा प्राप्त की। 1994 में उन्होंने जेएनयू से एनवायरमेंटल साइंस में एमफिल किया। डिमरी ने आईआईटी दिल्ली से अपनी पीएचडी एटमोस्फेरिक साइंसेज में की। वह अप्रैल 1994 से 2008 के बीच रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) में स्नो एंड एक्लांच साइंटिस्ट भी रहे। जापान के नगोया स्थित हाइड्रो फेरिक एटमॉस्फेरिक रिसर्च सेंटर में सितंबर 2010 से अगस्त 2012 तक अनुसंधानकर्ता रहे हैं। उनके शोध के विषयों में क्षेत्रीय जलवायु गतिशीलता, बदलाव एवं परिवर्तनशीलता, जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन का विज्ञान, भारत का शीतकालीन मानसून एवं पश्चिमी विक्षोभ है। उन्होंने पहाड़ों पर अलग-अलग जगहों के तापमान का अध्ययन करने के लिए एक नई विधि सामने रखी है। वह कहते हैं, वैज्ञानिक किसी चुनौती का सॉल्यूशन बता सकते हैं। उन पर अमल करना सरकार का काम है।
सवाल : अपने बारे में क्या कहेंगे? वैज्ञानिक बनने की प्रेरणा कहां से मिली?
देखिए, मैं इंट्रोवर्ट (अंतर्मुखी) हूं। खुद के बारे में बात करने पर असहज हो जाता हूं। रिसर्च के विषय में बात करनी हो तो कर लूंगा। मेरे पिता शिक्षक थे। मैं पहाड़ों पर ही पला बढ़ा हूं। लोग पूछते हैं कि साइंटिस्ट बनने की प्रेरणा कहां से मिली? यह सवाल मुझे बहुत कठिन लगता है। क्योंकि, बचपन में हर चीज आकर्षित करती है। तरह-तरह के लोग तरह-तरह की बातें बताते हैं। ऐसे में किसी बात ने मुझे प्रभावित किया, यह बताना मुश्किल है। हां, मेरे पिता शिक्षक थे। माता गृहिणी। लेकिन, वह पढ़ती थी, हमें पढ़ाती भी थीं। परिवार में शिक्षा का माहौल था। किताबों के बीच पला बढ़ा हूं। प्रभु की कृपा से मुझे अच्छे संस्थान मिलते चले गए। बस पढ़ते गया। पहाड़ी हूं, ज्यादा ऊंचाई पर पेड़ नहीं होता है, इसलिए मैंने बचपन में सोच लिया था कि इसपर रिसर्च करूंगा, यह कहना गलत होगा। इन दिनों हिमालयी क्षेत्र पर काम कर रहा है। विश्व की प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका में हाल ही में हिमालय की वर्तमान स्थिति पर रिसर्च पेपर पब्लिश हुआ है। इसमें मेरा विश्लेषण छपा है। जलवायु परिवर्तन के कारण बहुत सी चीजें बदल रही हैं। हम भी इस बदलाव से अछूते नहीं हैं। हमारा प्रयास है कि हम कारणों की तलाश करें। कुछ समाधान सुझाएं। अमल करना सरकारों का काम है। इसपर हम कुछ नहीं कर सकते हैं।
सवाल : एक शोधार्थी के लिए क्या जरूरी होता है?
जैसे, आप लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में कभी-कभार गूढ़ सवाल पूछ लेते हैं। वैसे ही हमारा क्षेत्र है। कभी-कभी कोई ऐसा प्रश्न मन में आ जाता है। जिसपर कई दिन मन आकर्षित होता रहता है। फिर उस पर मनन की प्रक्रिया शुरू होती है। फिर थ्योरी तैयार करते हैं। रिसर्च की प्रक्रिया शुरू होती है। इसके बाद सिद्धी पर आते हैं। यह प्रक्रिया हर क्षेत्र में होती है। प्रश्न अलग हो सकते हैं। टेढ़े-मेढ़े हो सकते हैं। लेकिन, प्रश्न उठने से ही हल निकलते हैं। इसलिए प्रश्न मन में आते रहने चाहिए। जितने भी शोध हुए हैं। जो भी विज्ञान की देन है, उसके मूल में मन में प्रश्न उठना ही है। यह ऐसी प्रक्रिया है जो स्वत: होती है। शोधार्थी के लिए सबसे जरूरी बात उसे जिज्ञासु होना चाहिए। इसके बाद बात आती है संसाधन की। स्कूलों में विज्ञान को समझने के लिए बेसिक उपकरण होने ही चाहिए।

सवाल : उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाएं क्यों बार-बार हो रही हैं?
देखिए, बादल का फटना कोई नई घटना नहीं है। पहले भी होता आया है। जहां इंसानी बस्ती नहीं होनी चाहिए वहां भी लोग बसने लगे हैं। इसलिए बादल फटने पर जानमाल का नुकसान होने लगा है इसलिए हमें लगता है कि यह घटनाएं बढ़ गई हैं। हां, बादल फटने की कुछ असामान्य घटनाएं हुई हैं। वह जलवायु परिवर्तन के कारण है। पूरी दुनिया इससे प्रभावित हो रही है। अकेले उत्तराखंड में ही ऐसा हो रहा है, ऐसा नहीं है। बादल का फटना एक प्रक्रिया है। गर्म हवाएं नमी के साथ सीधे पहाड़ी इलाकों की ओर बढ़ती हैं फिर यह वही ऊपर जाने का प्रोसेस शुरू करती हैं। लेकिन यहां पर हवाओं के रुकने का एक सीधा कारण पहाड़ है। जो कि हवाओं को आगे बढ़ने से रोकते हैं। यहां पर कई सारे बादल एक साथ एकत्र हो जाते हैं। जिससे यह बादल फटने की घटनाएं होती है। पिछले कई वर्षों से उत्तराखंड और हिमाचल बादल फटने की घटनाओं को लेकर काफी संवेदनशील हैं। कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी ऐसी घटनाएं देखने को मिली हैं। जलवायु परिवर्तन एक बड़ा कारण है। जो कि अधिक वाहनों के आने, जंगलों की आग और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई का कारण है। इसपर भी रिसर्च हो रहा है।
सवाल : जलवायु परिवर्तन की मार कब तक पड़ती रहेगी?
जलवायु परिवर्तन ऐसा विषय है जो सबको छूता है। हर सर्दियों में दिल्ली की एक्यूआई देश के अखबारों में सुर्खियां बटोरती है। उसके समाधान पर विचार करना चाहिए। दुर्भाग्य से पूरी दुनिया में किसी भी देश ने जलवायु परिवर्तन को प्राथमिकता पर नहीं रखा है। वैज्ञानिक सॉल्यूशन बता सकते हैं। सैकड़ों तरीके सुझाए भी गए हैं। अमल करना सरकार का काम है। अब आम लोग ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। इसपर गंभीरता काम होना चाहिए। नीतियां बनाएं। लेकिन, इसपर कुछ नहीं हो रहा है। हम सुनते थे कि देहरादून में सात नदियां होती थी। अब तो हमें कोई नदी नहीं दिखाई देती है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। सरकार इसको पिघलने से नहीं रोक सकती। लेकिन, वह ऐसी नीतियां जरूर बना सकती है जो क्षति कम कर सके। ग्लेशियर पिघलने से पानी की उपलब्धता बढ़ जाएगी। कहीं-कहीं बाढ़ की स्थिति भी उत्पन्न होगी। लेकिन बाद में क्या होगा। पानी ही नहीं बचेगा।
सवाल : क्या आधुनिक जलवायु मॉडल ऐसी घटनाओं का सटीक अनुमान दे सकते हैं?
बिल्कुल, इस दिशा में दुनिया भर में तेजी से काम हो रहा है। हमारे देश में भी हो रहा है। उम्मीद है कि आने वाले कुछ वर्षों में अपने देश में भी आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल होने लगेगा। अभी अनुमान के लिए इस्तेमाल हो रहे मॉडल अपेक्षाकृत मोटे या कम-रिजॉल्यूशन वाले हैं। जिनमें वातावरण को बड़ी-बड़ी ग्रिडों में विभाजित करके अध्ययन किया जाता है। इस कारण कई अहम सूक्ष्म मौसम प्रक्रियाएं मॉडल में ठीक से दिखाई नहीं देतीं। कुछ देशों ने अधिक सटीक, उच्च-रिज़ॉल्यूशन मॉडल विकसित किया है, जो भारी बारिश को प्रभावित करने वाली छोटी-छोटी मौसम प्रणालियों को बेहतर तरीके से पकड़ सकता है। दुनिया भर में इस तरह की घटनाएं बढ़ी हैं। इसलिए सभी देश इस दिशा में काम कर रहे हैं।
मसूरी में बन रही वेधशाला से क्या लाभ होगा?
यह दीर्घकालिक शोध के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा। सर्वे ऑफ इंडिया कैंपस में भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान यह बहुआयामी भूभौतिकीय वेधशाला बना रहा है। इससे हिमालयी क्षेत्र की भूगर्भीय गतिविधियों को समझने और पहाड़ी इलाकों में आपदा प्रबंधन पर सटीक काम हो सकेगा। यह वेधशाला मल्टी–पैरामीट्रिक सिस्टम से लैस होगी। जिसमें भूकंपीय कंपन, भू–चुंबकीय परिवर्तन, वायुमंडलीय दबाव, भूमि के झुकाव व तनाव और विद्युत–चुंबकीय संकेतों का डाटा एक साथ मिलेगा। वेधशाला के माध्यम से भूमिगत हलचलों की रियल टाइम निगरानी, भूकंपीय तरंगों का सटीक रिकॉर्ड और फॉल्ट लाइनों की गतिविधियों का अध्ययन पहले से अधिक वैज्ञानिक ढंग से संभव हो सकेगा। वेधशाला सूक्ष्म भू–गतिविधियों, चट्टानों में तनाव परिवर्तन और भू–चुंबकीय गड़बड़ियों का पता लगाकर वैज्ञानिकों को महत्वपूर्ण संकेत देगी। इससे भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली पर चल रहे अनुसंधान को मजबूती मिलेगी। भूस्खलन, बादल फटना और पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता जैसे जोखिमों का सटीक आकलन करने में यह वेधशाला अहम भूमिका निभाएगी। इससे जोखिम मानचित्रण, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, अलर्ट सिस्टम और राहत–बचाव रणनीतियां और मजबूत होंगी। यह वेधशाला आईआईजी, इसरो, भारतीय मौसम विभाग, वाडिया इंस्टीट्यूट, एरिस, डीआरडीओ सहित कई भारतीय और विदेशी संस्थानों को एक मंच पर लाएगी। यहां प्राप्त डेटा अंतरिक्ष–पृथ्वी संबंधी शोध, जीपीएस सिग्नलों पर प्रभाव और अंतरिक्ष मौसम जैसे क्षेत्रों में नए आयाम खोलेंगे।
सवाल : उत्तराखंड में धार्मिक पर्यटन बढ़ रहा है। क्या पहाड़ों की धारण क्षमता इतनी है?
धर्म-विज्ञान के बीच तालमेल बनाकर बीच एक रास्ता खोजना चाहिए। प्रयागराज में महाकुंभ में करोड़ों लोग पहुंचे। ओडिशा के जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा के साथ लाखों लोग पहुंचते हैं। लेकिन, हर स्थान की अलग-अलग धारण क्षमता होती है। उसी के अनुरूप योजनाएं बनानी चाहिए। केदारनाथ का कपाट जिस दिन खुलता है आप जाइए, वहां आपको होटल नहीं मिलेंगे। लोग सड़कों पर बैठे मिलेंगे। हमें पहले व्यवस्था बनाने पर काम करना चाहिए। हेली सेवा शुरू तो कर दी गई लेकिन क्या वहां जरूरी मानक का पालन किया जा रहा है। इसपर ध्यान देना चाहिए। इसलिए कह रहा हूं। धर्म और विज्ञान के बीच तालमेल बिठाते हुए रास्ता निकालें।
हमने कुछ नहीं मांगा
दुखी मन से कहना पड़ रहा है कि हमारी लीडरशिप बहुत उदासीन है। विचार शून्यता है। हर प्रांत ने केंद्र से कुछ न कुछ मांगा, किसी ने केंद्रीय यूनिवर्सिटी मांगी, किसी ने आईआईटी मांगी, किसी ने एम्स मांगा, हमने कुछ नहीं मांगा। आईआईटी जम्मू, जोधपुर, मंडी, पटना कितना अच्छा काम कर रहे हैं। हमने क्या किया। गढ़वाल विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय को दर्जा दिला दिया। रुड़की विश्वविद्यालय को आईआईटी का दर्जा दिला दिया। इससे वह गुणवत्ता नहीं आ पाएगी जो केंद्रीय संस्थान में होती है। केंद्रीय संस्थान के वाइस चांसलर यहां के नेताओं की सुनेंगे नहीं, इसलिए इस ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
डिजास्टर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट क्यों नहीं?
उत्तराखंड में कितनी आपदाएं आती हैं, राज्य सरकार देहरादून में विश्व स्तरीय डिजास्टर मैनेजमेंट संस्थान की मांग क्यों नहीं करती? हमारे यहां के युवा सेना में जाते हैं, इनको कुछ और सैनिक स्कूल ही मांग लेना चाहिए। कब से हमारे यहां एक सैनिक स्कूल घोड़ाखाल चला आ रहा है। विक्टोरिया क्रॉस विजेता दरबान सिंह नेगी ने अंग्रेजी हुकूमत से कर्णप्रयाग में हाईस्कूल मांगा था। वह आज भी है। कितना बड़ा विजन था उनका। लीडरशिप को ऐसा होना चाहिए। सोच दूरगामी होनी चाहिए।
यह भी पढ़ें : जयमित्र सिंह बिष्ट … हिमालय की 30 साल की साधना









